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नक्सल प्रभावित इलाकों में पानी पहुंचाने का सारंडा मॉडल फेल

2,019
  • चार साल पहले बनी थी योजना, 30.50 करोड़ रुपये किये जाने थे खर्च
  • पांचों प्रमंडलों के आयुक्तों को सौंपी गयी थी जिम्मेवारी
  • न योजनाओं के लिए स्थल का हुआ चयन, न पहुंचा पानी और न ही हुई बोरिंग

Ranchi:  नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पीने का पानी पहुंचाने के लिए बना सारंडा मॉडल फेल हो गया है. इस मॉडल पर एक इंच भी काम नहीं हो पाया. इस योजना के लिए पांचों प्रमंडलों के आयुक्तों को 30.50 करोड़ रुपये दिये जाने का भी प्रावधान किया गया था. इसमें प्रमंडलीय आयुक्त नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थल का चयन करते और योजना के कार्यान्वयन की मॉनिटिरिंग भी करते.

कहां-कहां सारंडा मॉडल को उतारा जाना था

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सारंडा मॉडल के तहत लातेहार के सरयू, पलामू के मनातू और पिपराटांड़, गिरिडीह के तिसरी, देवरी, निमियाघाट और डुमरी, कोडरमा के सतगांवा व डोमचांच, बोकारो के झुमरा,  चतरा के कुंदा व लावालौंग, लोहरदगा के पेशरार, खूंटी के अड़की, गुमला के बनाहात, जोरी व विशुनपुर, दुमका के काठीटांड़ व गोपीकांदर, गोड्डा के सुंदर पहाड़ी,  पश्चिम सिंहभूम के बंदगांव व कराईकेला, सरायकेला-खरसांवा के कुचई, पूर्वी सिंहभूम के गुड़ाबांधा, डुमरिया व मुसाबनी में पानी पहुंचाया जाना था.

सौर ऊर्जा के जरीये पहुंचाया जाना था पानी

योजना के तहत दुर्गम ईलाकों में सौर ऊर्जा के जरीये पानी पहुंचाया जाता. इसमें  वैसे गांवों को शामिल किया जाना था जहां बिजली व्यवस्था नहीं है. वहां बोरिंग कराकर सौर ऊर्जा के जरीय मोटर से पानी उपलब्ध कराया जाता. इस योजना में राष्ट्रीय ग्रामीण जलापूर्ति मिशन से भी अनुदान मिलने की बात कही गयी थी.

1844 लघु जलापूर्ति योजनाओं के निर्माण का था लक्ष्य

सारंडा मॉडल के तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 1844 सौर आधारित लघु जलापूर्ति योजनाओं के निर्माण के लक्ष्य रखा गया था. इस मॉडल के तहत पूर्वी सिंहभूम, दुमका, गढ़वा, खूंटी, पलामू, सरायकेला को जोड़ने का भी लक्ष्य रखा गया था. साथ ही ग्रामीण जलापूर्ति योजना का दायरा बढ़ाकर 23 फीसदी तक करने का लक्ष्य था. लेकिन योजना पर काम नहीं होने के कारण स्थिति जस की तस बनी हुई है.

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