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जज्बे को सलाम : खुद नेत्रहीन होकर नेत्रहीन बच्चों के जीवन में शिक्षा का प्रकाश फैला रहे हैं किंतु महतो

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Dhanbad : बचपन से ही नेत्र दिव्यांगता झेल रहे मुरलीनगर स्थित धनबाद नेत्रहीन आवासीय विद्यालय के शिक्षक किंतु महतो आज नेत्रहीन बच्चों को न सिर्फ शिक्षित कर रहे हैं, साथ ही म्यूजिकल स्टूमेंट जैसे हारमोनियम, ऑर्गन, ढोलक आदि बजाने एवं गायन का भी प्रशिक्षण दे रहे हैं.यहां पढ़ने वाले सभी बच्चे नेत्रहीन हैं. यहां पढ़ाई कर रहे आठवीं का छात्र सोनू किंतु महतो से संगीत की बारीकियों को सिख रहा है, वह बड़ा होकर गायक बनना चाहता है. वैसे ढोलक पर इसके हाथ पड़ते ही संगीत निकल पड़ती है. सभी  बच्चे किंतु महतो की पढ़ाने की शैली के कायल हैं.

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भंवर से लड़ो तुंद लहरों से उलझो, कहां तक चलोगे किनारे किनारे

रज़ा हमदानी की इन पंक्तियों को अपनी बेनूर जिंदगी का किंतु महतो ने मकसद बना लिया है. वे कहते हैं कि भगवान ने आंखों को रोशनी न दी तो क्या, ज्ञान का प्रकाश ही काफी है, जीवन में उजाले के लिए. आंखें तो माध्यम होती हैं, देखता हमेशा दिमाग है. किंतु ने इंटर तक पढ़ाई की है. उनकी अंग्रेजी भाषा पर मजबूत पकड़ है, वे धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते हैं. पश्चिम बंगाल के पुरुलिया के रहने वाले किंतु ने भी सातवीं तक की शिक्षा इसी आवासीय विद्यालय से ली थी. दसवीं की शिक्षा व‌र्द्धमान और 12 वीं की पढ़ाई झारखंड बोर्ड से की. 2008 से 2011 तक व‌र्द्धमान के निजी स्कूल में शिक्षण किया. अगस्त 2016 में वे नेत्रहीन आवासीय विद्यालय से जुड़े. ब्रेल लिपि से बच्चों को शिक्षित करने लगे. यह विद्यालय धनबाद ब्लाइंड रिलीफ सोसाइटी के तहत संचालित होता है.

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नेत्रहीनता बोझ नहीं, इसी सोंच के साथ आगे बढ़ें

आज समय बदल रहा है, खुद से कुछ करेंगे नहीं तो एक समय बाद परिवार भी आपको बोझ मानने लगता है. बस यही सोंच अपने जैसे ही बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया. किंतु का मानना है कि समाज या परिवार से कुछ पाने की इच्छा रखने के बजाए समाज को कुछ देंगे, तभी आपकी अहमियत  समझ में आएगी. नेत्रहीन बच्चों को अपनत्व और प्रशिक्षण दिया जाए, तो वे नाक, कान और स्पर्श की मदद से रोजमर्रा के काम कर सकते हैं. जीवनयापन के लिए पैसे भी कमा सकते हैं. यहां ऐसे ही बच्चों का जीवन संवारा जा रहा है.

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