Opinion

सजल ‘बॉस’ तुम्हें यूं भुला न पायेंगे..

स्मृति शेष
Madhukar

सजल चक्रवर्ती के निधन की खबर सुनते ही शॉक लगा. पत्रकारिता से आइएएस तक की सीढ़ी खेल-खेल में चढ़ गये. दोस्तों के दोस्त. कभी किसी का बुरा नहीं चाहा. पब्लिक के प्रति कमिटमेंट. य़ह भाव उन्हें विरासत में मिला था. डर शब्द उनके शब्दकोष में नहीं था. रांची में पले-बढ़े यहीं पढ़ाई-लिखाई हुई. पढ़ाई के दौरान ही न्यू रिपब्लिक अखबार में लिखने लगे. तेज-तर्रार सजल चक्रवर्ती को उनके क्लासमेट्स ने कहा- यार तुम तो इतने जहीन हो यूपीएससी में क्यों नहीं बैठते. और सजल यूपीएससी की परीक्षा में बैठे तो यहां भी कामयाबी का झंडा गाड़ दिया.

संयोग से 1984 में जब मैंने पत्रकारिता आरंभ की उस समय सजल चक्रवर्ती को पढ़ानेवालों के साथ पढ़नेवाले औऱ न्यू रिपब्लिक में काम करनेवालों से गाहे-ब-गाहे मुलाकात होती थी. उनकी जिंदादिली के चर्चे होते थे. वह रियाडा (रांची औद्योगिक विकास प्राधिकार) में प्रबंध निदेशक बन कर आये. तब रिपोर्टिंग के सिलसिले में उनसे मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ.

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गेलतसूद में कप प्लेट बनाने की एक फैक्ट्री थी. जो संचालक औऱ श्रमिक यूनियन के टकराव में बंद हो गयी थी. सजल चक्रवर्ती ने रियाडा के एमडी बनने के कुछ ही महीनों के बाद उस फैक्ट्री में उत्पादन आरंभ करा दिया. इसके उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर के होते थे.
1986 में बीके सिन्हा रांची के उपायुक्त होकर आये, जो कालक्रम में मेरे बहुत घनिष्ठ मित्र बन गये थे.

बीके सिन्हा ने खूंटी के हुटार में स्टोन ब्रिक्स का उत्पादन और को-ऑपरेटिव आरंभ किया. तब के मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद उसे देखने आये. उनके इस को-ऑपरेटिव से बीके सिन्हा इतने प्रभावित हुए कि उन्हें तत्कालीन बिहार को-ऑपरेटिव सोसाइटी का एमडी बना कर पटना ले गये.

पटना में एमडी और रांची में डीसी. पहली बार ऐसा हुआ था बिहार में, जब इस तरह की दोहरी जिम्मेदारी कोई अधिकारी संभाल रहा था. लेकिन बीके सिन्हा को यह उचित नहीं लगा तो उन्हीं की सलाह पर सीएम ने सजल चक्रवर्ती को रांची का डीसी बना दिया. पूरी रांची गदगद.

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सबको लगता था कि घर का आदमी ही डीसी बन गया. उस समय रांची के कई गांवों में हाथियों का जबरदस्त आतंक था. हाथियों को भगाने में वन विभाग की लापरवाही औऱ नाकामी से परेशान होकर डीसी सजल चक्रवर्ती एक दिन खुद पत्रकारों की टीम लेकर होरहाप के जंगल पहुंच गये.

पत्रकार तो लौट आये, पर सजल दिन तो दिन रात भी जंगल में काट देते थे. और आखिरकार हाथियों को इलाके से खदेड़े जाने के बाद ही वे रांची लौटे. उनके साथ गये पत्रकार उनका साहस, ज्ञान और जनता के प्रति समर्पण देख कर दंग रह गये. रांची के लोग उनके कामकाज के फैन हो गये.

राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनने के बाद रांची आये थे. तब सजल चक्रवर्ती ही रांची के डीसी थे. उन्होंने प्रधानमंत्री को वह सब कुछ दिखाया बताया और पत्रकारों से रू-ब-रू कराया. जबकि पत्रकारों से मिलने का उका कोई कार्यक्रम नहीं था. रांची में ही पत्रकारों से पहली दफा राजीव गांधी ने कहा था कि गांव के लोगों के लिए केंद्र से निकले एक रुपये में से 85 पैसे बीच में ही लोग खा जाते हैं.

मैंने उस प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री से पूछा था कि 85 पैसे खानेवाले कौन हैं, सरकार क्यों नहीं पकड़ती उनको. प्रधानमंत्री ने कहा कि वे गुमला जा रहे हैं औऱ वहां से लौट कर इस सवाल का जवाब देंगे. प्रधानमंत्री जब गुमला से लौटे तो बगैर प्रेस से मिले दिल्ली प्रस्थान कर गये.

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सजल चक्रवर्ती ने तब मुझसे कहा था कि ‘बॉस इसी तरह की पत्रकारिता से लोगों के सवाल हल होंगे सीधा औऱ दो टूक सवाल होना चाहिए’. बाद में सजल मेरे अच्छे मित्र बन गये. सजल जी सबको बॉस ही बोलते थे. चाहे वह अधीनस्थ हो या फिर आम आदमी. पत्रकारों के लिए 24 घंटे हाजिर रहते. जनता जब चाहे मिल ले.

हर समस्या को तुरंत निपटाने को तत्पर रहते. उन पर भ्रष्टाचार के आरोप तो लगे लेकिन कभी किसी ने इन आरोपों पर यकीन नहीं किया. सजल कहते थे जिम्मेदारियां निभाते हुए कुछ गलती संभव है लेकिन बेईमानी मेरे खून में नहीं. खुद पर इतना विश्वास था कि वे तब के सीबीआइ के डीआइजी यूएन विश्वास से भी टकरा गये थे. नतीजतन यूएन विश्वास का कोप भाजन बनना पड़ा औऱ चारा घोटाला में जेल की सजा काटनी पड़ी.

झारखंड के मुख्य सचिव बने तब मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री के साथ ही टकरा गये. पद का अहम उन्हें कभी छू भी नहीं पाया. जीवन भर सादगी औऱ ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करते रहे. रांची में ग्लाइडर की ट्रेनिंग आरंभ करानेवाले ‘बॉस’ सजल चक्रवर्ती बहुत याद आयेंगे. हमारी श्रद्धांजलि स्वीकार करना ‘बॉस’. अलविदा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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