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आक्रामक और जुझारू तेवर के लिए जाने जाते थे साधु चरण महतो, विस्थापितों के हक की लड़ाई से मिली थी पहचान

झामुमो से की थी राजनीतिक जीवन की शुरुआत, 2014 में भाजपा के टिकट पर ईचागढ़ में लहराया था जीत का परचम

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Jamshedpur :  ईचागढ़ के पूर्व विधायक साधु चरण महतो के असामयिक निधन से सरायकेला-खरसावां जिले के आम लोगों के साथ पूरा राजनीतिक जगत स्तब्ध है. हर तरफ उनके राजनीतिक जीवन की चर्चा हो रही है. साधु चरण महतो जिले में ही नहीं, बल्कि पूरे कोल्हान में अपने आक्रामक और जुझारू तेवर के लिए जाने जाते थे. उन्होंने ईचागढ़ के विस्थापितों की हक की लड़ाई जोरशोर से लड़ी थी. यही वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर ईचागढ़ से उनकी चुनावी जीत का मुख्य कारण बना. उन्होंने चुनाव में अपने निकटतम प्रतिद्वंदी और झारखंड के पूर्व उप मुख्यमंत्री स्वर्गीय सुधीर महतो की पत्नी सविता महतो को 42 हजार 250 वोटों से हराया था. इसके अलावा साधु चरण महतो वर्ष 2019 में भी ईचागढ़ से भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में उतरे थे. इस बार उन्हें झामुमो प्रत्याशी सविता महतो के हाथों हार का सामना करना पड़ा था.

झामुमो के प्रखंड सचिव से कांग्रेस जिलाध्यक्ष तक रहे 

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साधु चरण महतो के राजनीतिक जीवन की शुरुआत झामुमो से हुई थी. वे शुरू से ही जमशेदपुर के वर्तमान सांसद विद्युत वरण महतो के करीबी माने जाते थे. साथ ही जमशेदपुर के पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो भी उनके राजनीतिक गुरुओं में शामिल थे. झामुमो में रहते वर्ष 1994 में साधु चरण महतो को गम्हरिया प्रखंड सचिव पद की कमान मिली थी. यह वह दौर था, जब कोल्हान झामुमो में पूर्व सांसद कृष्णा मार्डी की तूती बोलती थी, जबकि कांग्रेस के पूर्व सांसद स्वर्गीय विजय सिंह सोय का आतंक ऐसा था कि कोई उनके मुकाबले चुनाव लड़ने से पहले सौ बार सोचता था. लेकिन 1996 के लोकसभा चुनाव के समय परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि कांग्रेस पार्टी ने विजय सिंह सोय को लोकसभा का टिकट नहीं दिया. तब विजय सिंह सोय को निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा था. उसी दौरान साधु चरण महतो  विजय सिंह सोय के नजदीक आ गए थे. उस परिस्थिति में विजय सिंह सोय की सीधी टक्कर झामुमो के कृष्णा मार्डी से मानी जा रही थी, लेकिन चुनाव में जीत हासिल की थी भाजपा प्रत्याशी चित्रसेन सिंह सिंकू ने. बावजूद इसके साधु चरण महतो की विजय सिंह सोय से नजदीकियों में कोई फर्क नहीं पड़ा. बाद में जब विजय सिंह सोय की कांग्रेस में फिर से वापसी हुई तो साधु चरण महतो ने भी उनके साथ कांग्रेस का दामन थाम लिया. उसके बाद उनका राजनीतिक ग्राफ कुछ इस कदर बढ़ा कि वर्ष 2001 के आस-पास पहले वे कांग्रेस के प्रभारी जिला अध्यक्ष और फिर उसके बाद कांग्रेस के पूर्णकालीन जिला अध्यक्ष बने. इस बीच विजय सिंह सोय की चक्रधरपुर में हत्या हो गयी, लेकिन तब तक कांग्रेस में साधु चरण महतो की एक जुझारू और संघर्षशील नेता की पहचान बन चुकी थी. हालांकि पार्टी संगठन के वरीय नेताओं से भी इस दौरान साधु चरण महतो का विवाद शुरु हो गया था.

भाजपा में आने के बाद अर्जुन मुंडा के करीबी रहे साधु

फिर सरायकेला के टेंटोपोशी के विस्थापितों की लड़ाई का साधु चरण महतो नेतृत्व करने लगे. उस बीच राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा के वे करीब आए. तब से श्री मुंडा उनके राजनीतिक रहनुमा बन गये. लंबे समय से किडनी की बीमारी से ग्रसित होने के बाद कोलकाता के अस्पताल में भर्ती साधु चरण महतो की सोमवार को जब अचानक तबीयत बिगड़ी तो 22 नवंबर की रात श्री मुंडा उनका हाल जानने अस्पताल पहुंचे. ऐसे में समझा जा सकता है कि श्री मुंडा का साधु चरण महतो के प्रति कितना स्नेह था. बता दें कि बीते 23 अक्टूबर को अस्पताल में साधु चरण महतो का किडनी ट्रांसप्लांटेशन हो चुका था. बावजूद कई बीमारियों से ग्रसित होने के कारण उनकी तबीयत बिगड़ी गई और कोल्हान ने एक आक्रामक, जुझारु और संघर्षशील नेता खो दिया. इसे लेकर देखते ही देखते पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है.

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