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सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय ’ : क्रांतिकारी, साहित्यकार, अध्यापक और संपादक यानि All In One

  • पुण्यतिथि पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय ’ का जितना बड़ा नाम है कहीं उससे ज्यादा उनका योगदान रहा है. अज्ञेय के हमें कई रूप देखने को मिलते हैं इन्होंने क्रांतिकारी, साहित्यकार, सैनिक औप संपादक सहित कई भूमिकाओं को बहुत ही लाजवाब ढंग से निभाया है. इन्हें हम All In One कह सकते हैं.

अज्ञेय आधुनिक हिंदी साहित्य के उन चंद लोगों में शुमार हैं जिन्होंने गद्य और पद्य दोनों विधाओं में लिखा है और कमाल का लिखा है. अज्ञेय ने भाषा और शिल्प के दृष्टिकोण से भी हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है. इन्होंने तार सप्तक का संपादन कर आधुनिक हिंदी कविता के एक महत्वपूर्ण दौर की कविताओं को लोगों के सामने रखा.

क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़े, करीब छह वर्ष तक जेल में बिताया

अंग्रेजी में एम.ए. करते समय अज्ञेय अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़े. ये शहीद भगत सिंह के साथी रहे. अज्ञेय 1930 में गिरफ़्तार हो गए. आजादी के पहले करीब छह वर्ष तक जेल में बिताया.

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मेरठ के किसान आंदोलन में सक्रिय रहे

अज्ञेय ने सैनिक समाचार-पत्र, आगरा में संपादक के पद पर काम किया. फिर संपादन को छोड़कर मेरठ के किसान आंदोलन में कूद पड़े. मेरठ के बागपत कस्बे में किसान सम्मेलन का आयोजन हुआ था अज्ञेय ने लगातार कई दिनों और रात गांवों में घूम-घूमकर किसान मार्च का आयोजन करने की तैयारियों में अपने को लगा दिया था. वे लगातार भाषण देते और किसान एकजुटता के लिए कई दिनों तक पैदल चलते रहे.

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दिनमान से दिखाया कैसी होती है गंभीर पत्रकारिता

सन 1965 में आरंभ हुई ‘दिनमान’ अज्ञेय के संपादन में निकली. यह हिंदी की ऐसी पत्रिका बनी जिसने पत्रकारिता को साहित्य6 सी संवेदनशीलता और सरोकार से जुड़ाव का प्राण तत्व दे दिया. ‘दिनमान’ ने हिंदी पत्रकारिता को नई भाषा और शैली दी. नवाचार और नए प्रयोगों के कारण ‘दिनमान’ हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठत बन गई. संपादक के रूप में बिहार के सूखाग्रस्त इलाकों की यात्राएं की. अज्ञेय ने अपने समय के सारे बड़े लेखकों को ‘दिनमान’ से जोड़ा. कवि रघुवीर सहाय तो उनके बाद दिनमान के संपादक हुए. जब गोवा के आज़ाद होने पर ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने गोवा में महा सम्मेलन किया तो इसके कवरेज के लिए वे खुद गए.

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पत्रकार नैतिक आधार पर भी अग्रणी रहे

अज्ञेय का यह कहना बेहद महत्वपपूर्ण है कि पत्रकार अथवा संपादक को केवल विचार क्षेत्र में ही बल्कि कर्म के नैतिक आधार के मामले में भी अग्रणी रहना चाहिए. भारत में वे ही लोग पूजे गए जिन्होंने जैसा कहा वैसा ही किया. उनका यह कहना पत्रकारिता के लिए ही नहीं बल्कि समूचे समाज के लिए अहम् है कि मेरा सहज विवेक मुझे आश्वस्त करता है कि पत्रकारिता के मूल्यी पूरे समाज के जीवन को अधिक गहरा, समर्थ और अर्थवान बना सकते हैं. अज्ञेय ने दिनमान के माध्यकम से पत्रकारिता के जो प्रतिमान स्थापित किए थे वे इतने सालों बाद भी पाठकों की स्मृति में ताजा हैं. दिनमान के बाद ने अज्ञेय नवभारत टाइम्स का संपादन किया.

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शेखर एक जीवनी अज्ञेय का आत्मकथात्मक झलक वाला उपन्यास

हालांकि मैंने अज्ञेय के उपन्यास ही पढ़े हैं कविताएं नहीं. उनके उपन्यासों में ‘शेखर एक जीवनी मुझे सबसे पसंद है. यह उपन्यास मैंने 1995 में पढ़ा था. उन दिनों सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए दिल्ली के यमुना विहार में रह रहा था. वैकल्पिक विषय हिंदी के सिलेबस में यह उपन्यास था.

इसका नायक शेखर ईमानदार व्यक्ति है. ‘शेखर’ के ज़रिए अज्ञेय ने एक व्यक्ति के विकास की कहानी का तानाबाना बुना है जो अपनी स्वभावगत अच्छाइयों और बुराइयों के साथ देशकाल की समस्याओं पर विचार करता है. अपनी शिक्षा-दीक्षा, लेखन और आज़ादी की लड़ाई में अपनी भूमिका के क्रम में कई लोगों के संपर्क में आता है लेकिन उसके जीवन में सबसे गहरा और स्थायी प्रभाव शशि का पड़ता है जो रिश्ते में उसकी बहन लगती है, लेकिन दोनों के रिश्ते भाई-बहन के संबंधों के बने-बनाए सामाजिक ढांचे से काफी आगे निकलकर मानवीय संबंधों को एक नई परिभाषा देते हैं.

शेखर’ दरअसल एक व्यक्ति के बनने की कहानी है जिसमें उसके अंतर्मन के विभिन्न परतों की कथा क्रम के ज़रिए मनोवैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करने की कोशिश अज्ञेय ने की है.

इस उपन्यास के प्रकाशन के बाद कुछ आलोचकों ने कहा था कि ये अज्ञेय की ही अपनी कहानी है,लेकिन अज्ञेय ने इसका स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि शेखर के जीवन की कुछ घटनाएं और स्थान उनके जीवन से मिलते-जुलते हैं लेकिन जैसे-जैसे शेखर का विकास होता गया है वैसे-वैसे शेखर का व्यक्ति और रचनेवाला रचनाकार एक-दूसरे से अलग होते गए हैं.

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अपने अपने अजनबी में अस्तित्ववादी दर्शन की झलक

अज्ञेय का एक और उपन्यास अपने अपने अजनबी भी पढ़ा है. यह शेखर एक जीवनी की तुलना में बेहद छोटा है. इसमें में सेल्मा और योके दो मुख्य पात्र हैं.सेल्मा मृत्यु के निकट खड़ी कैंसर से पीड़ित एक वृद्ध महिला है और योके एक नवयुवती. दोनों को बर्फ से ढके एक घर में साथ रहने को मजबूर होना पड़ता है जहां जीवन पूरी तरह स्थगित है. इस उपन्यास में स्थिर जीवन के बीच दो इंसानों की बातचीत के ज़रिए उपन्यासकार ने ये समझाने की कोशिश की है कि व्यक्ति के पास वरण की स्वतंत्रता नहीं होती. न तो वो जीवन अपने मुताबिक चुन सकता है और न ही मृत्यु. इस उपन्यास में ज्यां पाल सात्र के अस्तित्ववादी दर्शन की झलक भी दिखाई देती है.

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‘अज्ञेय’ की प्रमुख कृतियां

निबन्धं-संग्रह- त्रिशंकु, आत्मरनेपद, सब रंग और कुछ राग, लिखि कागद कोरे, अरे यायावर रहेगा याद, एक बूँद सहसा उछली
समीक्षा-ग्रन्थ – हिन्दीा साहित्यि: एक आधुनिक परिदृश्य , तारसप्तेकों की भूमिकाऍं
कहानी-संग्रह- परम्पिरा, विपथगा, शरर्णा‍थी जयदोल, कोठरी की बात , तेरे ये प्रतिरूप, उमर वललरी
उपन्याास‍- नदी के द्वीप, शेखन: एक जीवनी, अपने-अपने अजनबी

नाटक- उत्तरप्रियदर्शी

काव्या- आंगन के पार द्वार, अरी ओ करुणा प्रभामय, हरी घास पर क्षणीार, इन्द्ररधनुष रौंदे हुए से, सुनहरे शैवाल, बाबरा अहेरी, इत्य्लम्, कितनी नावों में कितनी बार, पूर्वा.

दिल्ली में ही 4 अप्रैल 1987 को उनकी मृत्यु हुई. 1964 में आँगन के पार द्वार पर उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ और 1978 में कितनी नावों में कितनी बार पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया.

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