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 ग्रामीण बंद और #Trade_Unions_Strike से राज्य को लगभग सौ करोड़ का नुकसान, बंद रहे कई कोल ब्लॉक

Ranchi : किसानों और ट्रेड यूनियनों की हड़ताल का राज्य के अलग-अलग हिस्सों में असर देखा गया. एक ओर राष्ट्रीय स्तर पर अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने ग्रामीण बंद का एलान किया था, वहीं ट्रेड यूनियनों की ओर से आठ जनवरी को हड़ताल की घोषणा की गयी थी.

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हड़ताल का व्यापक असर राज्य के अलग अलग सेक्टरों में देखा गया.  राज्य में ग्रामीण बंद का नेतृत्व झारखंड राज्य किसान सभा ने किया. वहीं ट्रेड यूनियनों की  हड़ताल का नेतृत्व एआइसीयूटी, एआइसीसीटीयू और सीआइटीयू ने किया.

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सीआइटीयू के सचिव प्रकाश विप्लव ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में बंद के साथ ट्रेड यूनियनों की हड़ताल से राज्य में लगभग एक सौ करोड़ का कारोबार प्रभावित हुआ. बंद में कहीं किसी तरह की कोई अप्रिय घेटना नहीं हुई.  शांतिपूर्ण बंद सफल रहा. राज्य के अलग अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन किया गया. साथ ही दुकानें भी बंद रही.

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कहां कितना काम हुआ प्रभावित

सीसीएल और बीसीसीएल जैसी कोल कंपनियों में 50 प्रतिशत तक काम बंद रहा.  ईसीएल में शत प्रतिशत काम बंद रहा. एआइटीयूसी के पीके गांगुली ने बताया कि बोकारो, रांची, आदित्यपूर, गम्हारिया जैसे इंडस्ट्रीयल एरिया में व्यापक असर रहा. वहीं बैंक, एलआइसी समेत इंस्योरेंस वाली कंपनियां ने भी हड़ताल के समर्थन में कामकाज ठप रखा. हालांकि कुछ एसबीई की शाखाएं इस दौरान खुली रही.

केंद्र और राज्य सरकार के कार्यालयों में भी हड़ताल का असर

बीड़ी और स्टोन क्रसिंगपाकुड़, साहेबगंज और चतरा पूरी तरह बंद रहे. लौह खनन क्षेत्र में किरीबुरू, मेघाहातुबुरू, भवनाथपुर में हड़ताल असरदार रही. लोहरदगा में बाक्साइट खनन भी ठप रहा. गांगुली ने कहा कि कॉपर समेत अन्य खनन क्षेत्र  में भी इसका असर देखा गया. हड़ताल का एचईसी में थोड़ा कम असर देखा गया.

लेकिन परियोजना कर्मी जैसे आंगनबाड़ी कर्मी, सहिया, मीड डे मील वर्कस समेत अन्य ने भी भारी संख्या में हड़ताल मे सहयोग किया. फार्मास्यूटिकल, ट्रासंपोर्ट और ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्रीज से लेकर केंद्र और राज्य सरकार के कार्यालयों में भी हड़ताल का असर देखा गया.

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ट्रेड यूनियनों की  दस सूत्री मांग

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने 22 सूत्री मांग के लिए ग्रामीण बंद बुलाया,  जबकि ट्रेड यूनियनों की ओर से दस सूत्री मांगों के लिए हड़ताल की गयी. इनकी प्रमुख मांग किसानों और मजदूरों के लिए न्यूनतम 21 हजार वेतन निर्धारण, न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने, किसानों के कर्ज, भूमि अधिकारों की रक्षा, वन अधिकार कानून 2006 को लागू करने, मनरेगा के तहत ग्रामीण स्तर पर काम बढ़ाने, बैंकों का निजीकरण समाप्त करने, कोयला से एफडीआइ समाप्त करने, एचईसी, मेकॉन जैसी कंपनियों के निजीकरण पर रोक, श्रम कोड का मालिक पक्षीय बनाये जाने का विरोध समेत अन्य मांगें हैं.

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