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#RSS प्रचारक ने कड़िया मुंडा को लिखा #letter, जतायी आशंका-‘आंतरिक अलगाववाद के नये केंद्र हो सकते हैं जनजातीय क्षेत्र’

Ranchi : खूंटी के पूर्व सांसद और वरिष्ठ भाजपा नेता कड़िया मुंडा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक प्रचारक ने एक पत्र लिखा है. पत्र में आशंका जतायी गयी है कि आने वाले समय में आदिवासी इलाके आंतरिक अलगाववाद के केंद्र बन सकते हैं.

पत्र में वर्तमान सरकार की कार्यशैली को लेकर टिप्पणी भी की गयी है और चिंता जतायी गयी है कि क्या जनजातीय क्षेत्रों में राष्ट्रवादी नेतृत्व वह कॉन्ट्रैक्ट- टेंडर तक ही सीमित रहेगा. इसके अलावा आदिवासी इलाकों में पत्थलगड़ी, भूमि सुधार के विफल प्रयास, मसीही संगठनों के दुष्प्रचार, सांस्कृतिक समरसता के सेतु के अभाव के कारण संघ को मिल रही चुनौतियों का भी जिक्र है.

लोकसभा के पूर्व उपाध्यक्ष को भेजे गये पत्र में प्रचारक ने आने वाले चुनाव में बीजेपी के संकट की ओर भी इशारा किया है.

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हम उस पत्र को हू-ब-हू प्रकाशित कर रहे हैं :

श्री मन्त कड़िया मुंडा जी

नमस्ते!

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आशा है आप कुशल होंगे और राजनैतिक दायित्व से अवकाश का आनंद ले रहे होंगे. खूंटी का मौसम भी बरसात में सुखद होगा. झारखण्ड का विचार आते ही खूंटी और श्री कड़िया मुंडा दिमाग में कौंध जाते हैं. आपके राजनैतिक अवकाश के बाद से इस स्मरण की पुनरावृत्ति कुछ अधिक ही हो रही है. इसके मूल में जाने का प्रयास किया तो यही पाया कि क्या आने वाला भविष्य कोई आप सरीखा  सहज-सरल-सौम्य प्रगल्भ आदिवासी संस्कृति का नेतृत्व देगा? आने वाले समय में जनजातीय क्षेत्रों में राष्ट्रवादी नेतृत्व क्या बिलकुल सतही होगा-वही कॉन्ट्रैक्ट, टेंडर तक सीमित. सांस्कृतिक परिमाण पर कस कर चमकने वाले कितने नये नेता तैयार हो रहे हैं? या फिर जो भी उपलब्ध नेतृत्व हैं, उन्हें हम कैसे संस्कृति के विशाल वट-वृक्ष की महत्ता बता पा रहे हैं. जनजातीय समाज आज एक अनोखे दो राहे पर है. विदेशी सोच, विदेशी साहित्य और विदेशी संस्कृति के अहर्निश प्रहार के बाद अब जनजातीय क्षेत्रों में राष्ट्र की मुख्य धारा से कटना, या कटने का स्वांग करना सहज हो चला है. केंद्र सरकार नीतिगत तौर पर इस पर अंकुश लगाने के सारे प्रयास कर रही है. फिर भी सिर्फ नीतियों से समाज कितना चलता है, यह आप जानते हैं. हम जमीनी विमर्श में कहां हैं? जनजातीय क्षेत्रों के विमर्श में राष्ट्र कहाँ है? राष्ट्र का चिंतन कहाँ है? इस बदली परिस्थिति में भी हमें क्या प्रयास करने चाहिए, क्या इस पर सक्षम लोग कोई मंथन कर रहे हैं?

यदि हम राजनैतिक मीमांसा करते हैं तो भी जनजातीय क्षेत्र किसी खतरे की घंटी बजा रहे हैं. झारखण्ड के परिप्रेक्ष्य में लोकसभा चुनाव 2019 की विजय के कुछ आयाम :

  1. राज्य की अधिकांश जनता ने राष्ट्रवाद, सांकेतिक राष्ट्रवाद, सीमा सुरक्षा, निर्णायक नेतृत्व, संवेदनशील शासन, व्यवस्थित संगठन, कुशल दृष्टिकोण प्रबंधन और समावेशी संघ कार्य के पक्ष में अभूतपूर्व मतदान किया है. साथ ही जनता ने छद्म धर्मनिरपेक्षता, परिवारवाद, कोरी जातिवादिता एवं ओछे अधिनायकवाद को सिरे से नकारा है.
  2. झारखण्ड में 12 (11 + 1) लोकसभा सीटों पर विजय प्राप्त हुई है जिनमें 3 अनुसूचित जनजाति की सीटें हैं, जिसमे विजय का अंतर अन्य सीटों की तुलना में काफी कम है. 2 सीटें जिन पर हमें पराजय देखनी पड़ी, वह भी अनुसूचित जनजाति की सीटें हैं.
  3. एक ओर जहां मुख्य धारा के हिन्दू जन मानस ने जातिवाद के बंधन को लांघ कर भाजपा नेतृत्व के प्रति अदम्य समर्थन दिखाया, वहीं दूसरी ओर जनजातीय लोकसभा क्षेत्रों में हमने कड़ा संघर्ष देखा है. जनजातीय क्षेत्रों में विशेष प्रकल्पों के बाद भी हम गैर मसीही आदिवासी समाज को अपने साथ रख पाने में कहीं कहीं अक्षम दिखें. इस बिंदु पर गहन चिंतन की आवश्यकता प्रतीत होती है.
  4. खूंटी लोकसभा क्षेत्र, जो झारखण्ड के मसीही धर्म नाद का केंद्र बिंदु है, वहां हमारे प्रत्याशी को मात्र 1445 मतों से विजय मिली. चाईबासा लोकसभा सीट पर हमारे निवर्तमान सांसद की करारी हार हुई. पत्थलगड़ी, भूमि सुधार के विफल प्रयास, मसीही संगठनों के दुष्प्रचार, सांस्कृतिक समरसता के सेतु के अभाव, मसीही समाज के संगठित मायावी प्रयासों के समक्ष इन जनजातीय सीटों पर हमारे प्रयास लहूलुहान रहे.
  5. जनजातीय क्षेत्रों में अलगाव की पृष्ठभूमि में चर्च, चर्च पोषित स्थापित सामाजिक शिक्षण संस्थान, विपक्षी दल, वामपंथी संगठन अब लगभग एक जुट हो चुके हैं. पथलगड़ी विमर्श एवं प्रयोग द्वारा अलगाववाद को संवैधानिक कथानक का नया स्वरूप दिया जा रहा है. अंतत: प्रतीत यह होता है कि गैर ईसाई आदिवासी समाज, परिस्थिति और षड्यंत्रवश राष्ट्रविरोधी समूहों के हाथों का खिलौना बन रहा है. हमने राज तो जीत लिया है, परन्तु यदि समाज को जोड़ने में विफल रहे तो आतंरिक अलगाववाद के नये केंद्र अब जनजातीय क्षेत्र होंगे.

ऐसे में आप सदृश यशस्वी, कर्मयोगी और बुद्धिजीवी की ओर मन-मष्तिष्क सहसा जाता है, ” क: पन्था:”, कि रास्ता क्या है? इस सामाजिक-राजनैतिक तिमिर में राष्ट्र चेतना का आशा दीप कौन होगा? किस में इतना साहस है, समझ है, सूझ-बूझ है जो आगम को समझ कर जनजातीय क्षेत्रों को एकात्म करे.आशा है निम्नलिखित कुछ बिंदुओं पर आप जनजातीय एवं गैर जनजातीय समाज के व्यापक समरसता एवं राष्ट्र चेतना के साथ समुद्भव का कोई मार्ग निकालेंगे और समाज को अपना नेतृत्व देंगे.

  1. क्या यह संभव है कि वनवासी क्षेत्र, भारत के भविष्य की मुख्यधारा का केंद्र बनेंगे?
  2. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जमीनी प्रसार हेतु जनजातीय क्षेत्र में क्या विशेष सामाजिक प्रयास किये जायें.
  3. चुनाव 2019 के परिप्रेक्ष्य में जनजातीय क्षेत्र में जमीनी मजबूती सुनिश्चित करने के उपाय.
  4. क्या वनवासी क्षेत्रों में भी सामाजिक-राजनैतिक आकांक्षा के नये आशादीप तैयार हो सकते हैं.
  5. क्या वनवासी क्षेत्रों में सहज, सरल, सत्यशील एवं तेजस्वी व्यक्तित्व को शक्तिशाली नेतृत्व में परिणत किया जा सकता है.

आशा है, उपरोक्त सन्दर्भों पर, भारत के व्यापक सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकात्म एवं उन्नयन की दृष्टि से आप के नेतृत्व में सम्यक मंथन होगा और देश को नया दृष्टि-निर्देशन मिलेगा.

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