Opinion

आरएसएस सचमुच बदल रहा है, बदलना चाहता है!

( संदर्भ : मोहन भागवत के हालिया कथन)

Shrinivas

सरसंघचालक मोहन भागवत ने कुछ दिन पहले आरएसएस के ही एक अनुषंगी संगठन ‘राष्ट्रीय मुसलिम मंच’ के समारोह में जो कुछ कहा, उसे कल तक संघ केआलोचक रहे लोग भी स्वागतयोग्य और संघ के नजरिये में आ रहे सकारात्मक बदलाव का द्योतक बता रहे हैं. संघ यदि सचमुच संकीर्णता का त्याग कर दे, तो बेशक इसका स्वागत किया जाना चाहिए. इतना बड़ा संगठन यदि वास्तव में ‘राष्ट्रीय’ हो जाये और समस्त भारतीयों के हित में काम करने लगे, इससे अच्छा क्या होगा? लेकिन श्री भागवत यदि ईमानदार होते या हैं तो ऐसा कुछ कहने से पहले संघ की नफरत पर टिकी सर्वज्ञात मान्यताओं और उसी अनुरूप उसके विभेदकारी कृत्यों को स्वीकार करते, उसके लिए पश्चाताप या कम से कम खेद व्यक्त करते. इसके बजाय जब वे कहते हैं कि संघ तो हमेशा से मानता रहा है कि मुसलमान इस देश के बराबर के नागरिक हैं, कि दोनों का डीएनए एक है, कि भारत में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति हिंदू ही है, कि जो कहता है कि मुसलमान भारत में नहीं रह सकते, वह हिंदू नहीं है, कि संघ को तो उसके विरोधियों ने नाहक बदनाम कर दिया है..आदि आदि, तब उनकी मंशा पर संदेह होता है.

यह संदेह क्यों, इसे समझने के लिए संघ का आधिकारिक इतिहास लिखनेवाले डीआर गोयल ने संघ की मान्यता का ‘हिंदुत्व’ और उसका मूल विश्वास क्या है, इसे कैसे व्यक्त किया है, इसे देखें :

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”..भारत में हिंदू अनंत काल से रहते आये हैं. हिंदू अपने आप में एक राष्ट्र है, क्योंकि इस देश में सभी संस्कृतियां, सभ्यताएं और जीवन के सभी पक्ष हिंदुओं के योगदान से ही बने हैं. इस देश में गैर-हिंदू या तो हमलावर रहे हैं या फिर अतिथि; और उनके साथ तब तक एक समान व्यवहार नहीं किया जा सकता, जब तक कि वे हिंदू संस्कृति और हिंदू परंपरा आदि को अपना न लें. गैर-हिंदू, खास कर मुसलमान और ईसाई, उन सभी चीजों के दुश्मन हैं, जो हिंदू संस्कृति में रची बसी हैं और इसीलिए उनके साथ एक खतरे की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए. इस देश की स्वतंत्रता और तरक्की, हिंदुओं की स्वतंत्रता और तरक्की है. भारत का इतिहास विदेशियों के हमले से अपने धर्म और संस्कृति की सुरक्षा और संरक्षण के लिए अनवरत संघर्ष का इतिहास है और वह खतरा अभी भी मौजूद है, क्योंकि सत्ता उन लोगों के हाथों में है, जो यह नहीं मानते कि यह एक हिंदू देश है और जो राष्ट्रीय एकता की बात उन सभी के लिए करते हैं, जो इस देष में रहते हैं और ऐसा करके वे अल्पसंख्यक मतों को प्राप्त करना चाहते हैं. इसलिए वे गद्दार हैं…’’

(‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ : डीआर गोयल, दूसरा संस्करण; राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2000)

क्या श्री भागवत या संघ/भाजपा का कोई बड़ा स्थापित नेता/प्रवक्ता सार्वजनिक रूप से यह कहेगा कि उक्त उद्धरण और यह किताब फर्जी है, कि डीआर गोयल कोई वामपंथी सेकुलर था, जिसने संघ को बदनाम करने के लिए यह सब लिख दिया? तब भी सवाल उठेगा कि सन 2000 में छपी इस पुस्तक (पहला संस्करण तो और पहले छपा होगा) पर संघ ने कभी रोष जताया, गोयल को वामपंथी कहा? नहीं.

इसलिए कि श्री गोयल ने जो भी लिखा है, वही संघ की धारणा रही है. आज भी है. यदि अब संघ बदल गया है या बदलना चाहता है, तब भी उसे स्वीकार करना होगा कि अब तक की हमारी धारणा गलत थी, जिसे हम सुधारना चाहते हैं.

अन्य अनेक कारण और आधार हैं, श्री भागवत को जिनका स्पष्टीकरण देना चाहिए. अन्यथा उनकी और संघ की मंशा पर संदेह बना रहेगा.

प्रसंगवश, प्रख्यात लेखक-पत्रकार खुशवंत सिंह ने अपनी एक पुस्तिका में विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक विश्लेषण किया है. उसमें उन्होंने लिखा है कि किसी भी धर्म के पवित्र ग्रंथ में क्या और कितनी अच्छी बातें लिखी हुई हैं, उसके बजाय उस धर्म के आम अनुयायी का दैनंदिन आचरण कैसा है, यही उस धर्म के आकलन का पैमाना हो सकता है. इसी आधार पर किसी धर्म को श्रेष्ठ या कम अच्छा कहा जा सकता है.

कोई भी विवेकशील और रैशनल इंसान इस सिद्धांत से असहमत नहीं होगा. और यही पैमाना राजनीतिक, सामाजिक या सांस्कृतिक. संगठनों पर भी लागू होता है. होना चाहिए. किसी दल का नीति वक्तव्य कैसा है या उसके घोषणापत्र में क्या लिखा है, उसके नेता मंच से क्या कहते हैं, संबद्ध दल या संगठन को महज इस आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए. उसका आम कार्यकर्ता और अनुयायी क्या सोचता है, उसका आचरण कैसा है, इसी आधार पर किसी संगठन को अच्छा-बुरा, जातिवादी- सांप्रदायिक, उदार- संकीर्ण, लोकतांत्रिक या अधिनायकवादी आदि कहा जा सकता है.

इस लिहाज से संघ और उसके अनुषंगी संगठनों के साधारण कार्यकर्ताओं का आचरण बीते दशकों में, संघ के स्थापना काल से, कैसा रहा है, उसे जानते हुए भी श्री भागवत के वर्तमान उदारवादी कथनों को सकारात्मक माना जा सकता है?

क्या मान लिया जाये कि श्री भागवत बजरंग दल, विहिप, भाजपा और सैकड़ों हिंदू नामधारी संगठनों के कार्यकर्ताओं की उद्दंड हरकतों और उनके छोटे-बड़े नेताओं के जहरीले बयानों से सचमुच अनभिज्ञ हैं?

श्री भागवत का यह कथन और दावा भी असत्य है कि संघ को राजनीति से कोई लेना देना नहीं रहा है, कि भाजपा से उसका सिर्फ वैचारिक रिश्ता है. सच यह है कि भाजपा संघ की राजनीतिक बांह है. भाजपा के संगठनात्मक फैसलों में भी संघ की परोक्ष- अपरोक्ष भूमिका रहती है. यहां तक कि भाजपा में संगठन मंत्री पद पर संघ अपना एक भरोसेमंद व्यक्ति नियुक्त करता रहा है, जो भाजपा और संघ के बीच कड़ी का काम करता है. कभी गोविंदाचार्य इस पद पर थे, जो खांटी ‘स्वयंसेवक’ हुआ करते थे, फिर भाजपा में पदाधिकारी बना दिये गये. इसी तरह संघ के प्रवक्ता रहे राम माधव अचानक भाजपा में शामिल हुए और उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाती रही. बजरंग दल या विहिप का कोई भी नेता भाजपा के टिकट पर सांसद बन सकता है. अगले चुनाव में पराजित होने पर पुन: अपने ‘मूल संगठन’ में लौट कर वहां पुराना पद पा लेता है.

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तो श्री भागवत को यह भी बताना चाहिए कि ‘हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान’, ‘जो हिंदू हित की बात करेगा, वो भारत पर राज करेगा’ जैसे नारे कौन लोग लगाया करते थे; और यदि ये नारे गलत थे, तो क्या संघ ने कभी इसका संज्ञान लिया? गो-हत्या गलत हो सकती है, हिंदू इससे आहत भी हो सकते हैं (यह और बात है कि केरल, गोवा और पूर्वोत्तर राज्यों के भाजपा नेता कहते रहे हैं कि हमारे राज्य में बीफ कोई मुद्दा नहीं है), फिर भी श्री भागवत ने कहा कि इस नाम पर किसी की मॉब लिंचिंग सही नहीं है. अच्छी बात है. लेकिन जब देश भर में बीफ और गोहत्या के नाम पर मुसलिमों की मॉब लिंचिंग हो रही थी, तब संघ ने क्या किया? उन अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की? जब मोदी सरकार के मंत्री (जयंत सिन्हा, झारखंड) उन लफंगों को माला पहना कर सम्मानित कर रहे थे, तब संघ को बुरा लगा?

जब दिल्ली विस चुनाव के समय एक ‘साध्वी’ ने खुले मंच से कहा कि इस बार मुकाबला ‘रामजादों और हरामजादों’ के बीच है, तब संघ ने उसकी निंदा की? हालांकि दिल्ली के मतदाताओं ने ‘हरामजादों’ को ही चुन लिया था.

उनको यह भी बताना चाहिए कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर विहिप नेता अशोक सिंघल (अब दिवंगत) के इस बयान का क्या अर्थ था कि आठ सौ साल बाद पहली बार देश का शासक एक ‘हिंदू’ बना है?
सवाल यह भी है कि जब हिंदू और मुसलमान में कोई फर्क ही नहीं है; सभी भारतीय हिंदू ही हैं, तो फिर हिदू धर्म और समाज समय समय पर खतरे में क्यों आ जाता है?

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जो भी हो, यह विचारणीय जरूर है कि आखिर मोहन भागवत ने वह सब कहा क्यों होगा, इसके पीछे उनका उद्देश्य क्या रहा होगा? संघ बदल रहा है, बदलना चाहता है, यह मानने का तो कोई कारण नहीं दिखता.

मेरी समझ से भाजपा की चुनावी सफलता, जिसके पीछे संघ के सतत प्रयास का भी योगदान है, का एक प्रमुख कारण उसकी संकीर्ण हिंदूवादी छवि भी है. इसलिए भाजपा को सांप्रदायिक कहने-साबित करने से उसे कोई अंतर नहीं पड़ता, उल्टे हिंदुओं के एक बड़े हिस्से का उस पर भरोसा और बढ़ता है- एक दल तो है, जो खुल कर हिंदू- हित में बोलता है. इसी कारण भाजपा अब अल्पसंख्यक, खास कर मुसलिमों के वोट की चिंता नहीं करता. उसने मान लिया है कि वे हमें वोट नहीं देंगे. इसलिए उसकी कम्युनल छवि उसकी यूएसपी है. हिंदी पट्टी में जीत की गारंटी है.

फिर भी देश विदेश में अपनी छवि सुधारने, खुद को उदार और सहिष्णु दिखाने की कवायद भी चलती रहती है. भाजपा का भी कोई स्थापित नेता मंच से सांप्रदायिक भाषण देता नहीं मिलेगा. वह जिम्मा दूसरे और तीसरे-चौथे दर्जे के नेताओं का है. वे कुछ भी बोल सकते हैं. ज्यादा शोर होने पर ऐसे बयान को उस नेता का निजी मत/बयान कह दिया जाता है. संघ और भाजपा के कार्यकर्ता और समर्थक भी यह समझते हैं. कोई उनसे बात करके देख ले, गारंटी है कि उन पर मोहन भागवत के इस गुडी गुडी बातों का रत्ती भर असर नहीं पड़ा होगा, न पड़ेगा. यह दोतरफा अभियान है. भागवत जैसे लोग संघ की उदारता का ढोल पीटते रहेंगे; दूसरी तरफ अनुराग ठाकुरों (‘देश के गद्दारों को, गोली मारो… को’), गिरिराज सिंहों और प्रज्ञा ठाकुरों को जहरीले बयान देने की छूट भी रहेगी.

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बावजूद इस सबके यह तो मानना ही पड़ेगा कि संघ और भाजपा की रणनीति सफल होती दिख रही है. वे आम हिंदुओं में हिंदू होने का गौरव भाव भरने में सफल हो रहे हैं; साथ ही अपने विरोधियों की छवि हिंदू विरोधी की बनाने में भी. इसके लिए वे सतत और योजनाबद्ध तरीके से काम करते हैं. जनता के बीच जाते हैं. संपर्क बनाते हैं. इसके उलट संघ-भाजपा के विरोधी महज जुबानी आलोचना करते रह जाते हैं. अल्पसंख्यक मत पाने के लोभ में अल्पसंख्यक समुदायों की संकीर्णता और बेजा हरकतों पर भी बहुधा चुप्पी भी साध लेते हैं, जो उनके खिलाफ जाता है.

इसलिए मोहन भागवत के कथन का निहितार्थ जो भी हो, भाजपा और संघ की नीयत कुछ भी हो (यह कोई रहस्य भी नहीं है), महज श्री भागवत की आलोचना से कुछ हासिल नहीं होना है. जो दल जनता से कट गये हैं, यदि उनका लक्ष्य किसी प्रकार सत्ता हासिल करना ही है; और जो यह उम्मीद कर रहे हैं कि भाजपा/मोदी से निराश/नाराज वोटर उनको मौका दे देगा, तो यह शायद खुशफहमी ही साबित हो.

बहरहाल, संघ के अतीत और चरित्र को जाननेवाले भी यदि श्री भागवत के ऐसे कथनों से यह मानने लगते हैं कि संघ सचमुच बदल रहा है, तो अचरज होता है. संघ यदि संकीर्णता छोड़ दे, वह यदि हिंदू संगठन न रहे, हिंदू हित की बात न करे, अल्पसंख्यकों को शत्रु के रूप में चित्रित न करे, तो उसका वजूद ही क्या और कैसे रहेगा? उसकी जरूरत ही क्या रह जायेगी?

(श्रीनिवास जी वरिष्ठ पत्रकार हैं. अपनी मुखर प्रतिबद्धता और वैचारिक आग्रहों को लेकर देशभर में जाने जाते हैं. इस लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी है)

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