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आरएसएस नहीं चाहता था कि मंदिर बने, यह सत्ता पाने का रास्ता था! पत्रकार शीतला सिंह की किताब में दावा

आज से लगभग 31 साल पहले जब आंदोलन की वजह से ऐसा वातावरण बना कि लगने लगा कि अब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो जायेगा, अब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो जायेगा, तब खुद आंदोलन की अगुवाई कर रहे विश्व हिन्दू परिषद  को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने कदम पीछे खींच लेने को कहा था

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NewDelhi : आरएसएस नहीं चाहता था कि मंदिर निर्माण हो.  संघ ने आज से 31 साल पहले मंदिर आंदोलन शुरु करने पर विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन महामंत्री अशोक सिंघल को डांट भी लगाई थी कि वे मंदिर निर्माण पर कैसे तैयार हो गये. वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह ने अपनी किताब रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद का सच में विस्तार से उन घटनाक्रमों को लिखा है, जो मंदिर निर्माण के शुरुआती आंदोलन के दौर में हो रहे थे. आज से लगभग 31 साल पहले जब आंदोलन की वजह से ऐसा वातावरण बना कि लगने लगा कि अब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो जायेगा, अब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो जायेगा, तब खुद आंदोलन की अगुवाई कर रहे विश्व हिन्दू परिषद  को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने कदम पीछे खींच लेने को कहा था.  यह जानकारी वरिष्ठ पत्रकार और अयोध्या विकास ट्रस्ट के संयोजक शीतला सिंह की किताब अयोध्या-रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का सच के हवाले से सामने आयी है.

बता दें कि वेबसाइट सत्य हिन्दी ने इस बारे में एक लेख प्रकाशित किया है जो सोशल साइट पर शेयर किया जा रहा है. शीतला सिंह ने विहिप नेता विष्णुहरि डालमिया के करीबी तत्कालीन केएम शुगर मिल्स के मालिक लक्ष्मीकांत झुनझुनवाला से बातचीत के आधार पर अपनी किताब के पेज नंबर 110 पर लिखा है कि झुनझुनवाला फ़ैजााबाद लौटे, तो मैंने पूछा कि क्या हुआ.उन्होंने जवाब दिया कि पांचजन्य व आर्गनाइजर के 27 दिसंबर 1987 के अंक में खबर छपी है कि रामभक्तों की विजय हो गयी. कांग्रेस सरकार मंदिर बनाने के लिए विवश हो गयी है. इसके लिए ट्रस्ट बन गया है. इसे राम मंदिर आंदोलन की सफलता बताया गया था. पांचजन्य के मुखपृष्ठ पर विहिप महामंत्री अशोक सिंहल की फोटो छपी थी.

तुम  पुराने स्वयंसेवक हो, तुमने योजना का समर्थन कैसे कर दिया

झुनझुनवाला ने बताया कि उस दिन दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय केशव सदन: झंडेवालान में  बैठक हुई थी जिसमें संघ प्रमुख बाला साहेब देवरस भी उपस्थित थे.  उन्होंने सबसे पहले अशोक सिंहल को तलब कर पूछा कि तुम इतने पुराने स्वयंसेवक हो, तुमने योजना का समर्थन कैसे कर दिया. सिंघल ने कहा, हमारा आंदोलन तो राम मंदिर के लिए ही था.  यदि वह स्वीकार होता है तो उसका स्वागत करना चाहिए.  इस पर देवरस उन पर बिफर गये और कहा, तुम्हारी अक्ल क्या घास चरने चली गयी है? इस देश में 800 राम मंदिर विद्यमान हैं, एक और बन जाये, तो 801वां होगा.  लेकिन यह आंदोलन जनता के बीच लोकप्रिय हो रहा था, उसका समर्थन बढ़ रहा था जिसके बल पर हम राजनीतिक रूप से दिल्ली में सरकार बनाने की स्थिति तक पहुंचते.  तुमने इसका स्वागत करके वास्तव में आंदोलन की पीठ पर छूरा भोंका है.

यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं होगा. किताब के अनुसार जब सिंहल ने बताया कि इसमें तो मंदिर आंदोलन के अवेद्यनाथ, जस्टिस देवकीनंदन अग्रवाल सहित स्थानीय तथा बाहर के कई नेता शामिल हैं. तो उन्होंने कहा कि इससे बाहर निकलो क्योंकि यह हमारे उद्देश्यों की पूर्ति में बाधक होगा.

बच्चा मंदिर बनवाय देव, इन सरवन को तो केवल वोट और नोट चाही

सिंह ने अपनी किताब में लिखा है कि सरकार द्वारा बनाये गये ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास थे और राम जन्मभूमि न्यास के अगुआ परमहंस रामचंद्र दास इसके सदस्य थे.  ये दोनों विहिप के राम मंदिर आंदोलन के बड़े नेता थे.  ट्रस्ट बाबरी मस्जिद को बिना नुकसान पहुंचाये आधुनिक तकनीक के सहारे दूसरी जगह स्थानांतिरत कराना चाहता था.  शुरू-शुरू में मुस्लिम नेता इसे संघ की एक चाल समझते थे लेकिन जब उन्हें समझाया गया तो वो राजी हो गये थे.  सिंह ने लिखा है, महंत अवैद्यनाथ ने कहा कि हां, हमें स्वीकार्य है, बच्चा मंदिर बनवाय देव, इन सरवन (यानी विहिप में आरएसएस नेताओं के बारे में) को तो केवल वोट और नोट चाही.

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