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बिना चीरफाड़ के और कम समय में हो जाती है रोबोटिक सर्जरी

2,012

Ranchi: चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं में आधुनिक तकनीक के चलते आज इलाज के तरीके पूरी तरह बदल चुके हैं. आज सर्जरी के परिणामों को बेहतर बनाने के लिए रोबोट्स का इस्तेमाल भी बढ़ गया है. रोबोटिक सर्जरी देश में चिकित्सा सेवा का भविष्य है. इससे बिना चीरफाड़ किये और कम समय में बड़ी से बड़ी सर्जरी भी आसान तरीके से की जाती है. यह जानकारी इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल की सीनियर कंसलटेंट एंड रोबोटिक सर्जन डॉ कल्पना नागपाल ने दी. वो रोबोटिक सर्जरी पर व्याख्यान देने नयी दिल्ली से रांची, प्रेस क्लब आयी हुई थीं. उन्होंने बताया कि रोबोटिक सर्जरी में ब्लड की भी आवश्यकता नहीं पड़ती. क्योंकि ऑपरेशन के दौरान ज्यादा ब्लीडींग नहीं होता. रोबोटिक सर्जरी में थ्री डी के माध्यम से सबकुछ साफ-साफ देखकर ऑपरेशन किया जाता है.

कम रिस्क के साथ होती है सर और गले की सर्जरी

डॉ नागपाल ने कहा कि रोबोट के माध्यम से कई हेड और नेक सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी की गयी है.  रोबोटिक्स का इस्तेमाल र और गर्दन की कई तरह की बीमारियों के इलाज के लिए किया जा सकता है. जैसे खर्राटे,  ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एप्निया,  थॉयराइड सर्जरी, पैराथॉयरॉइड सर्जरी, नेक ट्यूमर आदि की सर्जरी में रोबोटिक सर्जरी किया जा सकता है.

रोबोट सर्जरी नहीं, सिर्फ कमांड करता है

डॉ नागपाल ने कहा कि कई बार लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि रोबोटिक सर्जरी रोबोट के द्वारा होती है. लेकिन ऐसा नहीं है रोबोट सिर्फ कमांड करता है, सर्जरी सर्जन करते है. सर्जरी के पारंपरिक तरीके अब आउटडेटेड हो चुके हैं. रोबोटिक सर्जरी कई मामलों में ओपन और लेप्रोस्कोपिक प्रक्रियाओं की जगह ले सकती है. रोबोटिक सर्जरी में चीरा बहुत छोटा या न के बराबर लगाया जाता है. यह जल्दी ठीक भी हो जाता है. इसके ईलाज में लगभग 2 से 3 लाख रुपये का खर्च आता है. डॉ नागपाल ने कहा कि भारत में अभी यह धीमी गति से बढ़ रहा है. बीते दो सालों में अपोलो, नयी दिल्ली में कई ऑपरेशन सफलता पूर्वक किए गये हैं.

 रांची में 2019 में शुरू होगा अपोलो क्लिनिक

पब्लिक आउटरीच के कन्वेनर बिंदु भुषण दूबे ने कहा कि 2019 में झारखंड  की राजधानी रांची में अपोलो क्लिीनीक का शुभारंभ किया जायेगा. मरीजों को अपोलो में इलाज कराने की सुविधा मिलने लगेगी. साथ ही सरकार द्वारा आयुष्मान भारत योजना की भी सुविधा मरीजों को दी जायेगी.

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