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रिम्स के ऑनकोलॉजी विभाग का हालः कैंसर मरीजों की कीमोथेरेपी में लगनेवाली 16 दवाओं में 8 उपलब्ध नहीं

  • रेडिएशन देनेवाली मशीनों की संख्या भी है कम
  • सिर्फ तीन नर्सों के भरोसे ही है ऑनकोलॉजी विभाग
  • रेडिएशन की जरूरत पड़ने पर मरीजों को जाना पड़ता है बाहर

Kumar Gaurav

Ranchi : राज्य के सबसे बड़े अस्पताल के कैंसर डिपार्टमेंट, डिपार्टमेंट ऑफ ऑनकोलॉजी में प्रतिदिन 50 से 60 मरीज ओपीडी में ईलाज के लिए आते हैं. इनमें से 35 से 36 नये मरीज होते हैं. रिम्स में प्रतिदिन 60 मरीजों की कीमोथेरेपी भी की जाती है.

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लेकिन कीमोथेरेपी में लगनेवाली आधी दवाइयां ही रिम्स की ओर से मरीजों को दी जाती हैं. बाकी दवाएं मरीजों को ही उपलब्ध करानी पड़ती हैं. पिछले सात महीने से कीमोथेरेपी में लगनेवाली 16 दवाइयों में से सिर्फ 8 दवाइयां ही रिम्स के पास उपलब्ध हैं.

आयुष्मान और गंभीर बीमारी योजना के तहत आनेवाले मरीजों को दवाइयां फ्री में उपलब्ध करायी जानी हैं. पर ऐसा नहीं हो रहा है. रिम्स प्रबंधन अपने कैंसर विभाग को उनके रिक्वेस्ट इंडेन के बाद भी दवाइयां नहीं दे रहा.

इससे मरीजों की कीमोथेरेपी प्रभावित हो रही है. रिम्स में कीमोथेरेपी करानेवाले मरीजों को खुद से इंजेक्शन सिस्प्लैटिन, इंजेक्शन जेएमसीटैबलिन, इंजेक्शन साइक्लोफॉस्फेलाइट, इंजेक्शन जाईडेट्रिक एसिड, इंजेक्शन विनसिस्ट्रिन, इंजेक्शन वीमब्लास्टिंन, इंजेक्शन बलेओमयसिन और इंजेक्शन केसीएल खरीदनी पड़ रही है.

इन दवाओं के लिए प्रति कीमोथेरेपी में लगभग 3 हजार का भुगतान करना पड़ता है. जो मरीजों इन दवाओं को खरीदने में सक्षम होते हैं उनकी कीमोथेरेपी तो हो जारी है, पर जो सक्षम नहीं है उनकी स्थिति का सहज की अनुमान लगाया जा सकता है.

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रेडिएशन मशीन की संख्या कम

रिम्स में कैंसर का डिपार्टमेंट वर्षों से चल रहा है. इधर साल 2019 से राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में कैंसर सर्जरी और अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध करायी गयी हैं, ताकि राज्य के गरीब मरीजों को इलाज के लिए बाहर न जाना पड़े.

हालांकि अब भी कई ऐसी मशीन हैं, जो रिम्स में उपलब्ध नहीं हैं. जैसे ब्रेकीथेरपी मशीन, पोजीट्रोन एमिशन टोमोग्राफी (पेट) स्कैन मशीन यहां नहीं हैं. कैंसर के मरीजों के लिए रेडिएशन मशीन की भी संख्या कम है. इस वजह से कई बार समय पर मरीजों का रेडिएशन नहीं दिया जाता.

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महंगी हैं कैंसर की दवाएं

झारखंड के मरीजों को कई बार दवाइयों के लिए बाहर की दुकानों के भरोसे रहना पड़ता है, जिस वजह से गरीब मरीजों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ जाता है. रिम्स में गरीब मरीजों के लिए सभी इलाज और दवाइयां मुफ्त उपलब्ध हैं, लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण कई बार दवाइयों के नहीं मिलने से मरीजों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

रिम्स में इलाज कराने पहुंचे कैंसर से ग्रसित गरीब मरीज नागेश्वर तुरी बताते हैं कि इस बीमारी में जरूरी है कि सरकारी स्तर पर मदद मिले, क्योंकि इस बीमारी का इलाज काफी महंगा है और गरीब मरीजों के लिए इस बीमारी से बचने के लिए दवाई खरीदना काफी मुश्किल होता है.

डॉक्टर रोहित झा के अनुसार कैंसर का कारण कार्सिनोजेन होता है और इसके कई रूप होते हैं. जैसे गुटखा, शराब, सिगरेट, खान-पान, जीवन शैली में अनियमितता और कई बार अनुवांशिक कारण भी होते हैं.

झारखंड में ज्यादातर मरीज मुंह के कैंसर के पाये जाते हैं, जबकि महिला मरीजों में सर्वाइकल कैंसर की संख्या ज्यादा होती है. इन दोनों के अलावा गैस्ट्रिक और गॉल ब्लैडर कैंसर के मरीज भी झारखंड में अधिक संख्या में हैं. एक आंकड़े के अनुसार, यह भी बताया गया है कि पूरे देश में ओपीडी में आनेवाले प्रत्येक 9 मरीजों में एक मरीज कैंसर से ग्रसित होता है.

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