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#ChineseVirus19 : महाभारत की बात तो ठीक, पर IMA कह रहा कि लड़ने के लिए सुरक्षा किट है ही नहीं, कैसे लड़ेंगे कोरोना से

Girish Malviya

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना से लड़ाई में महाभारत को याद कर रहे हैं. लेकिन महाभारत में जो योद्धा लड़ने गये थे, उनके पास कम से कम अपनी सुरक्षा के लिए ढाल और कवच तो थे. यहां तो कोरोना से लड़ाई लड़ने वाले डॉक्टरों के पास PPE किट तक अवेलेबल नहीं है. WHO की गाइड लाइंस के मुताबिक, पीपीई यानी पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट में ग्लव्स,  मेडिकल मास्क,  गाउन और एन 95,  रेस्पिरेटर्स शामिल होते हैं.

देश के अस्पतालों में PPE  किट की कमी बहुत महसूस की जा रही है. ऐसी संक्रामक बीमारी के वक्त स्वास्थ्यकर्मी आम लोगों के मुक़ाबले चार गुना ज़्यादा खतरे का सामना कर रहे है.

25 मार्च को इंडियन मेडिकल काउंसिल IMA के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य डॉ. शांतनु सेन ने बहुत बड़ी बात कही. उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस के खिलाफ भारत सामूहिक रूप से असफल होगा. यदि हमने डॉक्टरों, नर्सों और इलाज कर रहे अन्य कर्मियों के लिए पर्याप्त व्यक्तिगत रक्षा उपकरण (पीपीई) की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं करायी!

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देश में PPE किट की अनुपलब्धता के पीछे की असली कहानी क्या है?

WHO ने कोरोना के खतरे को देखते हुए बहुत पहले ही सभी देशों को आगाह कर दिया था कि PPE  किट की निर्माण सामग्री के उत्पादन को 40% तक बढाया जाये और उसकी पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाये. भारत उन 30 देशों में है, जहां घातक कोरोना वायरस के फैलने का उच्च खतरा बताया गया था.

ऐसा भी नहीं है कि मोदी सरकार ने कोई प्रयास नहीं किये. आने वाली परिस्थितियों को देखते हुए फरवरी के पहले हफ्ते में स्वास्थ्य मंत्रालय ने डॉक्टरों और मरीजों का इलाज करने वाले अन्य मेडिकल स्टाफ के लिए 50,000 सुरक्षा उपकरण (पीपीई) किटों का भंडारण करने का फैसला किया था. हालांकि यह बहुत कम था.

दरअसल देश में जितने भी सरकारी अस्पताल हैं या स्वास्थ्य सेवा संगठन है, उनकी खरीद के लिए जिस एजेंसी को अधिकृत किया गया है, उसका नाम है HLL लाइफकेयर लिमिटेड. यह सिंगल विंडो सिस्टम है. नियम है कि जो भी खरीद होगी, इसी एजेंसी के माध्यम से की जाएगी.

आने वाले खतरे को देखते हुए फरवरी के पहले हफ्ते में नोडल एजेंसी HLL लाइफकेयर के माध्यम से PPE किट निर्माताओं से निविदा मंगवायी गयी.

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एक बात स्पष्ट कर देना यहां जरूरी है कि पर्सनल प्रोटेक्टिव सूट यहां नहीं बनाये गये जाते. लेकिन देश में उसके कच्चे माल यानी कपड़े आदि का प्रोडक्शन होता है.

वैश्विक स्वास्थ्य मापदंडों के अनुसार, इतने संक्रामक रोग में पर्सनल प्रोटेक्टिव सूट में 4 लेयर 4 की गुणवत्ता चाहिए होती है. इतनी गुणवत्ता विश्व की सिर्फ तीन बड़ी कंपनियों के पास है वो है 3M, हनीवेल और ड्यूपॉन्ट.

HLL लाइफकेयर PPE की खरीद करने में विफल रहा निविदा किसी ने भरी ही नहीं. क्योंकि विश्व भर में उसकी बेहद मांग थी. दूसरे देश चौगुनी कीमत पर इन कंपनियों से माल खरीदते रहे और सबसे आश्चर्य की बात है कि कच्चे माल की सप्लाई भारत से की जाती रही. 8 फरवरी को सरकार ने कई उत्पादों को निर्यात की छूट दे दी थी.

आप पूछ सकते हैं कि जब कपड़ा यहां से भेजा जाता रहा तो हमने ही क्यों नहीं पर्सनल प्रोटेक्टिव सूट बनाने का काम शुरू कर लिया? दरअसल जैसे कपड़ा सिला जाता है, वैसे ही इन गाउन की, दस्तानों की, मास्क की सीमिंग की जाती है. जिसमें बहुत ही खास तरह की अल्ट्रासोनिक वेल्डिंग मशीन इस्तेमाल होती है. इसके अलावा यहां रेस्पिरेटर फिल्टर भी नहीं मिलते. क्योंकि ये देश में नहीं बनते.

भारत में इस प्रकार अल्ट्रासोनिक वेल्डिंग मशीन बहुत कम है. इनकी सीमिंग की यह खासियत होती है कि वायरस जैसा सूक्ष्म जीव भी इसके आर-पार नहीं जा सकता.

बहरहाल, बड़ी कंपनियों ने भारत की निविदा में इंट्रेस्ट नहीं लिया और मोदी सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी रही. उसने भारतीय निर्माताओं से इस बारे में बात करना तक उचित नहीं समझा.

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बताया जाता है कि 5 मार्च को एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड ने देशी निर्माताओं को खरीद प्रक्रिया में भाग लेने को आमंत्रित किया. लेकिन वही सरकारी ढर्रा. जिसके लिए देश मशहूर है.  HLL की एक लैब कोयम्बटूर में है. जहां स्थानीय निर्माता को प्रोडक्ट का परीक्षण करने के लिए भेजने की शर्त लगा दी गयी. अब तक यही चलता रहा कि निर्माता अपना प्रोडक्ट भेजते रहे लैब में 2 से 3 दिन आने जाने की ऐसी ही प्रक्रिया में लगते रहे.

मोदी सरकार ने पूरे 45 दिन इन सब प्रक्रियाओं में निकाल दिये जो बेहद महत्वपूर्ण थे.

प्रिवेंटिव वियर मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन संजीव रेहान बता रहे हैं कि एसोसिएशन ने बार-बार सुरक्षात्मक गियर को स्टॉक करने की आवश्यकता को उठाया था. जिसे नजरअंदाज कर दिया गया था.

संघ द्वारा मुनाफाखोरी विरोधी उपायों का भी अनुरोध किया गया था. लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय सरकार ने उनके अनुरोधों को एकदम से अनदेखा किया. उन्होंने यह भी बताया कि दूसरे देश भारत से मंगाकर माल को स्टॉक कर रहे थे और भारत सरकार 19 मार्च तक पीपीई उत्पादों और कच्चे माल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने को लेकर नींद में थी.

बुरा लगता है यह लिखते हुए लेकिन,  देश का मेन स्ट्रीम मीडिया तो यह सब सच्चाई बताता नहीं है. बल्कि इसे छिपाकर सरकार की तारीफ करने में लगा रहता है. अंग्रेजी अखबार और कुछ न्यूज पोर्टल जरूर इस बारे में छुटपुट समाचार छाप देते हैं. उसी के आधार पर यह पोस्ट लिखा गया है.

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डिसक्लेमरः इस लेख में व्यक्त किये गये विचार लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गयी किसी भी तरह की सूचना की सटीकतासंपूर्णताव्यावहारिकता और सच्चाई के प्रति newswing.com उत्तरदायी नहीं है. लेख में उल्लेखित कोई भी सूचनातथ्य और व्यक्त किये गये विचार newswing.com के नहीं हैं. और newswing.com उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है

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