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आदरणीय प्रधानमंत्री जी की रांची यात्रा, रांची शहर की साफ़-सफ़ाई की मौजूदा हालत और सिविल सोसायटी के कुछ सुझाव

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Rajesh Kumar Das

रांची शहर से एस्सेल इंफ्रा कंपनी को हटाकर फिर किसी कंपनी या संस्था या निगम को ही इस शहर के सफ़ाई के काम को सुपुर्द करना फिर से एक ग़लत निर्णय होगा. बजाय इसके की बार-बार जनता को पीड़ा हो, यह एक अच्छा मौक़ा है कि इस बार नए तरीक़े से प्रयास किए जाएं.

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रांची नगर निगम क्या कर सकता है-

पहली कड़ी-

  1. जनता और स्थानीय मीडिया के सहयोग से वार्डवार विस्तृत सफ़ाई योजना बनायी जा सकती है.

  2. प्रत्येक वार्ड के 200-300 घरों पर जन भागीदारी हेतु एक समिति बनायी जा सकती है, (जिसमें महिलाओं और वृद्धजनों की महती भूमिका हो) और सफ़ाई कर्मियों समेत उस क्षेत्र में होने वाले ख़र्चों को सीधे उन्हें सुपुर्द किया जा सकता है, यह संविधान के 74वें संशोधन की मूल भावना के अनूकूल भी रहेगा.

  3. प्रत्येक वार्ड में सभी समितियों के ऊपर एक वार्ड समिति गठित की जा सकती है जो निगम के साथ समन्वय का काम कर सकती है.

  4. सबसे साफ़ वार्ड पुरस्कार दिए जा सकते हैं, साफ़ मुहल्लों को रेटिंग के अनुसार उनके होल्डिंग टैक्स में रियायत भी दी जा सकती है.

  5. उस वार्ड क्षेत्र में निगम के किसी भी कार्य के लिए वार्ड समिति के संयोजन में जन भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है.

दूसरी कड़ी-

  1. वार्डवार कूड़े के छंटाई के लिए सौर्टिंग सेंटर खोले जा सकते हैं, जहां गीले और सूखे कूड़े को अलग-अलग करके उन्हें निस्तारित करने की अवधारणा को पूरा किया जा सकता है, इससे स्थानीय रोज़गार भी सृजित होगा.

2.होटेल, व्यवसायिक क्षेत्र, मुख्य सड़क, बैंक्वेट हॉल आदि स्थानों से कूड़े के उठान और सड़कों की सफ़ाई की ज़िम्मेदारी निगम के कर्मियों और स्थानीय एजेंसियों/ सामाजिक संस्थाओं के मार्फ़त पूरी की जा सकती है.

  1. रीसाइक्लिंग और कूड़े के अंतिम निस्तारण के कार्य बिजनेस मॉडल के आधार पर किए जाने चाहिए, जिसमें स्थानीय बिज़नेस कम्यूनिटी को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए.

  2. रांची में वर्तमान में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के अनुश्रवण के लिए जो तकनीकें इस्तेमाल की जा रही हैं, वे बेहद परंपरागत और कमजोर है. यदि हमारे पास वित्तीय संसाधन कम है तो उसका इस्तेमाल भी अच्छे से होना चाहिए.

अगर मजदूर से पूरा और सही काम नहीं लिया जायेगा, तो सफाई कैसे हो पाएगी. यदि मजदूरों की संख्या कम है, तो सिर्फ़ VIP स्थलों पर उन्हें भेज भर देने से क्या पूरा शहर साफ दिख पाएगा. अतः सारे मजदूरों को RFID और CHIP आधारित ID कार्ड्स दिए जाएं. ताकि सेंट्रल कंट्रोल रूम से ही उनके कार्यों का सही अनुश्रवण और पर्यवेक्षण किया जा सके.

साथ ही प्रत्येक घरों को बारकोड्स भी दिए जाएं ताकि कूड़े को उनके दरवाजे से संग्रहित करते ही उसकी जानकारी सिस्टम में चली जाए. सिर्फ़ कूड़ा-गाड़ियों में GPS लगा देने भर से शहर साफ नहीं हो जाएगा.

हमें बिन्स, ढलाव और कूड़े के परिवहन की भी समय आधारित निगरानी तकनीक के मदद से करनी होगी.

  1. वर्तमान में रांची में डम्प कूड़े के ढेर से होकर रिसने वाले लीचेट के नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं है. कचरे के ढेर से होकर रिसने वाला लीचेट पूरे भूगर्भीय जल के स्रोत और मानव सेवन के लिए ख़तरनाक है.

इस तरह के कूड़े डंपिंग केंद्रों के नज़दीक खेती-बारी भी मानव स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है. हमारे पर्यावरण, वानिकी एवं जलवायु परिवर्तन विभाग एवं राज्य के प्रदूषण नियंत्रण परिषद को इस बाबत पहल करनी चाहिए कि कूड़े का वैज्ञानिक पद्धति से निस्तारण हो और किसी भी प्रकार के प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य का ख़तरा भी ना फैले.

नगर निग़म के कर्मी भी बिना किसी जानकारी के कूड़े के ढेरों पर हानिकारक रसायनों का छिड़काव कर रहे हैं, जो वास्तव में बहुत ही ख़तरनाक है.

  1. इन डंपिंग केंद्रों का सिविल डिज़ाइन ऐसा बनना चाहिए कि लीचेट को RCC Yards और फिर नालियों के ज़रिये एकत्रित किया जा सके, जहां उसका ट्रीटमेंट हो और फिर उसी पानी को वापस कचरे के ढेर में डाला जा सके.

कृषक आबादी को खाद सुलभ कराने के उद्देश्य से इन डंपिंग केंद्रों को सरकारी रियायतें भी दी जानी चाहिए, जहां कूड़े से खाद बनाई जा सके और उसे किसानों को मुफ़्त में दिया जा सके.

(राजेश कुमार दास के फेसबुक वॉल से साभार)

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