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प्रतिरोध का सिनेमा एक नये विकल्प की तलाश का सिनेमा है : अरुण कमल

Patna : ‘‘सिनेमा ने शुरू से ही गरीबों और संघर्ष करने वालों का साथ दिया. चाहे चार्ली चैप्लिन हों, बाइसिकिल थीफ हो, कुरोसावा की फिल्में हों या सत्यजीत राय, विमल राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन और श्याम बेनेगल हों, इन सबने उन दृश्यों को हमारे सामने लाया जो अब तक बाहर थे. लेकिन आज हम अपनी सिनेमा की दुनिया को देखते हैं तो एक सेंसर बोर्ड भी है.

जो सबकुछ को सेंसर करता है, लेकिन हिंसा, झूठ और लोगों को दिमागी गुलामी में ले जाने वाले फंदे को सेंसर नहीं करता. सारा मारधाड़ का कारोबार सिनेमा के नाम पर चलता है.

ग्लैमर, मारधाड़, हिंसा और अश्लीलता पूंजीवाद के हक में जाते हैं इसीलिए पूंजीवाद इन सबको अपने खेलों और सिनेमा के जरिये बरकरार रखता है.

जब कभी सत्ताधारियों पर संकट आता है तो वे तुरत क्रिकेट खेलने वालों और सिनेमा में काम करने वालों को बुलाते हैं और अपने पक्ष में बयान दिलवाते हैं.’’ 12वें पटना फिल्मोत्सव: प्रतिरोध का सिनेमा का उद्घाटन करते हुए वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने यह कहा.

किसान आंदोलनों की पृष्ठभूमि में हो रहे इस फिल्मोत्सव को संबोधित करते हुए अरुण कमल ने कहा कि ‘‘हमारे किसान भीषण ठंढ में डेरा डाले हुए हैं और अब तो शायद भयानक गर्मी में भी डेरा डाले रहेंगे. यह एक ऐसी लड़ाई है, जिसके अंत का कुछ पता नहीं.

जब इकबाल ने कहा था- जिस खेत से दहकां को मयस्सर नहीं रोजी, उस खेत के हर खोशा-ए-गंदुम को जला दो, तब कोई यह नहीं सोचता था कि एक दिन ऐसा आएगा जब अनाज पैदा करने वाले इस बात के लिए लड़ेंगे कि उनको अनाज पैदा करने दिया जाए.

जब निराला किसानों, सभी मजलूमों और दलितों का आह्वान कर रहे थे कि आओ, आओ, जल्दी जल्दी पैर बढ़ाओ…और एक टाट बिछाओ… और सब एक पाठ पढ़ेंगे और तब अंधेरे का ताला खोलेंगे, तब कोई यह नहीं सोचता था कि सचमुच एक ऐसा दिन आएगा.

अंधेरे का चाभी खोलने के लिए हमें चाभी भी अंधेरे में ही मिलेगी. जो सत्ताधारी हैं वे तालें लगाते हैं या ताले तोड़ते हैं ताकि लूटा जा सके. और हमलोग, किसान, मजदूर, दलित- निराला के शब्दों में, अंधेरे के ताले को खोलते हैं.’’

उन्होंने कहा कि ‘‘आज हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं, जहां बोलने, अपनी बात कहने और करोड़ों लोगों तक एक साथ पहुंचने की सुविधा उपलब्ध है. लेकिन साथ ही यह भी सही है कि जितनी पाबंदी अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने पर आज है उतनी पहले कभी नहीं थी.

दुनिया की सारी दीवारें हवा की इन दीवारों के सामने तुच्छ हो गई हैं. अब पलक झपकते हमारी बात को रोका जा सकता है, पलक झपकते किसी भी बोलने वाले को खींचकर जेल में डाला जा सकता है.

ये हालत पूरी दुनिया मंे है. ऐसे में प्रतिरोध का सिनेमा जैसे समारोह ऐसे अवसरों को ढूंढ निकालने का एक क्षण है, जहां हम इकट्ठा होकर उन दृश्यों और फिल्मों को देख सकें जो आम तौर पर उपलब्ध नहीं होतीं.’’

उन्होंने कहा कि ‘‘प्रतिरोध का सिनेमा का एक विशेष अर्थ है. यह सत्ताधारियों के प्रतिरोध का, दमन और शोषण के प्रतिरोध का सिनेमा है. और केवल प्रतिरोध का भी नहीं, यह एक नए विकल्प की तलाश का सिनेमा है.

जो हालीवुड की या बंबइया फिल्में हैं, वे हमारे सोचने और सवाल उठाने की ताकत को कुंद करती हैं. प्रतिरोध का सिनेमा के अंतर्गत जो फिल्में हमने देखी है, उससे हम अपने लोगों के साथ, सताए हुए लोगों के साथ और प्रकृति के साथ एक गहरे प्रेम का अनुभव करते हैं.

अपनी बीमारी के कारण समारोह में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित न होने की चर्चा करते हुए उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि उन्हें लगता है कि जो लोग नजरबंद होते हैं उनको कैसा लगता होगा. यह भी लगता है कि क्या हमारा पूरा देश एक दिन नजरबंद हो जाएगा? लेकिन उन्होंने उम्मीद जाहिर की, कि प्रतिरोध का सिनेमा तब भी होगा. अंधेरा होगा, पर अंधेरे के गीत भी होंगे. प्रतिरोध का सिनेमा भी अंधेरे का वह गीत ही है.

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फिल्मोत्सव की स्मारिका का लोकार्पण भी हुआ

उद्घाटन वक्तव्य के पूर्व हिरावल के कलाकारों द्वारा मशहूर शायर फैज अहमद फैज की नज्म ‘इंतेसाब’ का गायन किया जिसकी पंक्ति ‘बादशाह-ए-जहां…दहकां के नाम’ को 12वें फिल्मोत्सव का थीम बनाया गया है. सामाजिक कार्यकर्ता गालिब खान ने फिल्मोत्सव स्वागत समिति के अध्यक्ष के बतौर उपस्थित दर्शकों का स्वागत किया.

उन्होंने शायर इकबाल के हवाले से कहा कि उठो मेरे दुनिया के गरीबों को जगा दो/ काख-ए-उमरा के दर ओ दीवार को हिला दो/ जिस खेत से दहकां को मयस्सर नहीं रोजी/ उस खेत के हर खोशा-ए-गंदुम को जला दो. उन्होंने फिल्मोत्सव को एक वैकल्पिक हस्तक्षेप बताया.

12 वें पटना फिल्मोत्सव के उद्घाटन सत्र का संचालन करते हुए जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने कहा कि कोविड महामारी और उसकी आड़ में सत्ता जिस तरह सामूहिकता को नष्ट कर रही है, उसके प्रतिवाद की एक कोशिश है पटना फिल्मोत्सव.

पिछले ग्यारह वर्षों में पटना फिल्मोत्सव में कारपोरेट पूंजी और भारत की सरकारों के गठजोड़ द्वारा आदिवासियों और किसानों को जल, जंगल, जमीन पर उनके अधिकार से वंचित किए जाने के खिलाफ लगातार फिल्में दिखाई है.

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स्मारिका का लोकार्पण

उद्घाटन सत्र में ही गालिब खान, कथाकार अवधेश प्रीत, प्रो. भारती एस. कुमार, प्रो. संतोष कुमार, मधुबाला, रंजीव, सुमंत शरण और फिल्मोत्सव की संयोजक प्रीति प्रभा ने फिल्मोत्सव की स्मारिका का लोकार्पण किया. इस अवसर पर कालिदास रंगालय के प्रांगण में एक बुक स्टॉल भी लगाया गया है.

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