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आदिवासी शासकों पर हो रहा शोध, इतिहास के विस्मृत पन्नों के खुलेंगे राज

इतिहास में आदिवासी शासकों की चर्चा कम, इन पर शोध भी नहीं

Ranchi : आदिवासियों को या तो म्यूजियम की चीज समझा गया या फिर नाच-गान में डूबा एक ऐसा समुदाय जिसकी कोई और पहचान नहीं. बुद्धिजीवियों ने भी कभी इस पर बात करने की जरूरत नहीं समझी कि देश का यह सबसे पुराना समुदाय कभी बड़े इलाके में शासन करता था. ये शासक देश के तकरीबन सभी हिस्से में थे.

बिहार से लेकर झारखंड तक अलग-अलग समय में कई जनजातीय शासक रहे, जिनके वंशजों ने लंबे समय तक शासन किया. लेकिन इतिहास में इन शासकों की ज्यादा चर्चा नहीं होती. ना ही कभी इन पर कोई शोध किया गया.

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रामदयाल मुंडा संस्थान करा रहा है शोध

अब मोरहाबादी स्थित डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान इन आदिवासी शासकों पर शोध करा रहा है. शोध की अवधि एक साल की है जिसमें कई नये तथ्य सामने आने की उम्मीद है.

छोटानागपुर के नागवंशी शासकों की पृष्ठभूमि क्या थी. क्यों नागवंशी यहां के मुंडाओं को बड़े भाई का दर्जा देते हैं? महाराजा मदरा मुंडा और सुतियांबेगढ़ सिर्फ मिथक हैं या कभी उनका अस्तित्व था ? उरांव समुदाय खुद को बिहार के रोहतासगढ़ से जोड़ते हैं.

पलामू में चेरों वंश का शासन रहा. कौन थे भूमिज शासक. चईचंपा में शासन करनेवाले संताल राजा कौन थे? इस तरह के दर्जनों सवाल हैं जिनका जवाब अभी ढूंढा जाना है.

जनजातीय शोध संस्थान के निदेशक रणेंद्र बताते हैं कि इस बात के संकेत मिलते हैं कि आज का हजारीबाग जिसे एक समय में चईचंपा कहते थे. वहां संतालों का शासन था. बाद में इन्हें यहां से हटना पड़ा.

मध्य बिहार की बात करें तो वहां पर बज्जी और लिच्छवी जैसे गणराज्य थे, ये गणराज्य आदिवासी शासकों के थे. मगध साम्राज्य के विस्तार में ये आदिवासी गणराज्य सबसे बड़ी बाधा थे. इन्हें पराजित कर अलग-थलग किया गया और इन्हें कृषि कार्यों से जोड़ा गया. ताकि ये कभी मगध साम्राज्य को चुनौती नहीं दे सके.

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गौरवशाली रहा है आदिवासियों का इतिहास

झारखंड में पुराने समय में ब्राहमणों को ग्रामदान करके बसाया गया. इन्होंने यहां के आदिवासी शासकों को सूर्यवंशी और चंद्रवंशी जैसी उपाधियां दी. इसका परिणाम यह हुआ कि इन शासकों में अपने मूल समुदाय से श्रेष्ठ होने की भावना जगी.

रणेंद्र बताते हैं कि आदिवासी समुदाय का एक गौरवशाली इतिहास रहा है. शोध से उस इतिहास के पुराने और विस्मृत हो चुके पन्नों से नये राज खुलेंगे. यह भी है कि यह शोध एक बार फिर से इतिहासकारों को जनजातीय इतिहास के बारे में नये सिरे से लिखने पर मजबर करेगा.

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