LITERATURE

कविवर कन्हैया को याद करते हुए:  हल्के नश्तर से काम नहीं चलेगा…

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 Prem Prakash      

जब कभी भी कविवर कन्हैया जी की याद आती है उनकी दो पंक्तियां निश्चित रूप से याद आती है:

” भूखे भजन न हो ही गोपाला

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   ले लो अपनी कंठी माला……”

कविवर कन्हैया जी का जन्म 17 सितंबर सन 1923 में हुआ था. कविवर कन्हैया एकीकृत बिहार इप्टा के महासचिव रहे और एकीकृत बिहार के कलाकारों, रचनाकारों और सृजन से जुड़े अन्य लोगों को एकजुट करते रहे. साथ ही अपनी कविताओं की रसधारा से सृजनकर्ताओं को एक नई ऊर्जा प्रदान करते रहे. उनके द्वारा लिखित कविताओं में ” नये संघर्ष का न्यौता ” आज भी सृजन से जुड़े हर एक समुदाय को एक नई ऊर्जा प्रदान करता है. इस कविता में उन्होंने लिखा है कि-

 

” फिर नये संघर्ष का न्योता मिला है

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    है भरा प्याला अभी पहला

    कि प्याला दूसरा भी आ गया है

    वाह यह कैसा अनोखा सिलसिला है

    फिर नये संघर्ष का न्योता मिला है

 

    चैन की बंसी बजायें हम भला क्या

    तनिक रूक कर गुनगुनायें हम भला क्या

    घिर गया तुफ़ान में फिर काफिला है

    फिर नये संघर्ष का न्योता मिला है

 

    हम जहाँ पे थे बस वहां से

    एक डग आगे बढ़ें हैं

    हो न खुशफहमी हिमालय के शिखर पर हम                                  

    चढ़े हैं

   आंधियां सुन लो न पत्ता एक भी वन का     

    हिला है

    फिर नये संघर्ष का न्योता मिला है “

 

कविवर कन्हैया द्वारा लिखित उक्त कविता आज भी प्रासंगिक है. और संघर्ष के लिए एकजुटता का आह्वान करती है. इतना ही नहीं उक्त कविता भूत और वर्तमान की याद दिलाती है और अपने जीवन के अस्तित्व के लिए संघर्ष के  न्योता को स्वीकार करने को तैयार रहने जरूरत को महसूस कराते हैं.

अपने रचना कर्म के दौर में कविवर कन्हैया ने संघर्ष में लगे लोगों से कहते हैं –

” इस हल्के नश्तर से काम नहीं चलेगा

     जख्म बहुत गहरा है

     केवल चिल्लाने से काम नहीं चलेगा

     आसमान बहरा है “

 

कविवर कन्हैया जी उक्त पंक्ति जिस गंभीरता को महसूस कराना चाहती है उसे आज के दिन महसूस करना ही होगा. अपनी इसी कविता की  अगली पंक्ति में वर्तमान राजनीति के साथ संघर्ष करने वाले लोगों की भी आलोचना करते हैं और कहते हैं-

 

” मुट्ठी भर रेत लिए चले दूर सफर में

     टूट गए रिश्ते सब पहुंचे किस शहर में

     सपने थे बड़े बड़े मन में बदलाव के

     लेकिन सब काम हुए निरघिन अलगाव के

     पता नहीं दिल है किस के असर में

     उलझ गए सब सवाल अगर मगर में

     फंदे कुछ नए-नए जनमे भटकाव के

     प्रकट हुए सब कृत्रिम लक्षण टकराव के “

 

अलगाव, भटकाव और टकराव के कारण हम किस प्रकार बड़े बड़े बदलाव के सपनों को भूल चुके हैं उस बात की याद दिलाती है उक्त पंक्तियां. इन बातों को याद दिलाते हुए कविता के अंत में कविवर कन्हैया जी सोचने का आग्रह करते हुए कहते हैं-

 

” किस प्रकार दुश्मन का विकट दुर्ग हिलेगा

     प्रेतों का पहरा है

     इस हल्के नश्तर से काम नहीं चलेगा

     जख्म बहुत गहरा है “

 

वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था ने एक नए संघर्ष का न्योता दिया है. संघर्ष में सफलता के कई गुर सिखाते हैं कविवर कन्हैया जी की कविताएं. नए संघर्ष के न्योता को स्वीकार करते हुए कविवर कन्हैया जी की 97 वीं वर्षगांठ पर झारखंड इप्टा लाल सलाम के साथ विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती है.

सौजन्य : फिरोज.

 

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