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स्मृति शेष: गुरु श्यामाचरण पति, जिन्होंने महिलाओं को छऊ नृत्य से जोड़ा था

Ranchi : छऊ गुरू श्यामा चरण पति नहीं रहे. उन्होंने रांची में ही अंतिम सांस ली. उनका ना होना झारखंड की कला संस्कृति, खासकर छऊ नृत्य के क्षेत्र में बड़ा आघात है.

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1940 में सरायकेला में जन्मे गुरू श्यामा चरण पति ने पचास वर्ष की उम्र में छऊ नृत्य सीखना शुरू किया. उन्होंने ना सिर्फ एक कठिन नृत्य शैली में महारत हासिल की बल्कि छऊ नृत्य को देश-विदेशों में फैलाने का काम भी किया. कला संस्कृति में इसी योगदान की वजह से उन्हें साल 2006 में पद्मश्री से सम्मानित भी किया गया. पर उनका एक और बड़ा काम था और वह था छऊ नृत्य से महिलाओं को जोड़ना.

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पहले पुरुष कलाकार निभाते थे महिलाओं के किरदार 

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के पूर्व शिक्षक डॉ गिरिधारी राम गोंझू ने श्यामा चरण पति के साथ काफी काम किया है. न्यूजविंग से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि पहले छऊ नृत्य में महिलाओं की भागीदारी नहीं होती थी. छऊ नृत्य में महिलाओं को किरदार को पुरुष कलाकार ही निभाते थे. पर श्यामा चरण पति ने महिलाओं को प्रोत्साहित किया कि वे इस कला को सीखें. उनके प्रयासों का ही परिणाम है कि आज कई महिलाएं छऊ नृत्य के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ गयी हैं.

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छऊ के प्रसार में आजीवन लगे रहे

गिरिधारी राम गोंझू ने कहा कि कई कार्यक्रमों में गुरू श्यामा चरण पति से मुलाकात हुई. वे छह फीट लंबे और मजबूत कदकाठी के व्यक्ति थे. धीर-गंभीर प्रवृति के. झारखंड की कला संस्कृति और छऊ नृत्य को बचाने और उसे बढ़ाने के लिए आजीवन प्रयत्नशील रहे. वे छऊ के नर्तक भी थे और गुरू भी. छऊ नृत्य की विभिन्न मुद्राओं को उन्होंने आत्मसात कर लिया था. छऊ नृत्य के परंपरागत स्वरूप को उन्होंने सेमी क्लासिकल में ढाल लिया था. उनके नहीं होने से झारखंड की कला को बड़ी क्षति पहुंची है.

सरायकेला के ही छऊ गुरू तपन पटनायक ने कहा कि श्यामा चरण पति के निधन से काफी दुखी हूं. वे और मैं दोनों एक ही गांव से थे. श्यामाचरण पति का काफी समय राउरकेला में बीता. इसके अलावा वे बेंगलुरू और लंदन भी आते जाते रहते थे. लंदन में उनका बेटा रहता है. छऊ नृत्य के क्षेत्र में उन्होंने काफी काम किया.

तपन पटनायक ने कहा कि श्यामा चरण पति का बेटा उनके पार्थिव शरीर को बेंगलुरू ले गया है. संभवत: अंतिम संस्कार वहीं पर हो. हालांकि हमलोग चाहते थे कि उन्हें सरायकेला लाया जाये और गांव में ही अंतिम संस्कार हो. पर परिवार की इच्छा भी मायने रखती है और हम उसका सम्मान करते हैं.

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