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तुम्हरे बिन हमरा कौनौ नाहीं…कहानी भाजपा-आजसू के रिश्ते की

तल्खी भूलकर पुरानी राह पर चलना दोनों पार्टियों की स्वाभाविक मजबूरी है

Ranchi: 2019 में हुए झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा और आजसू ने दोस्ती तोड़ने का जो खामियाजा भुगता था, अब उसकी भरपाई और रिश्ते की गांठ फिर से जोड़कर आगे बढ़ने की कवायद चल रही है. बेरमो और दुमका में 3 नवंबर को उपचुनाव हैं. भाजपा औऱ आजसू पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव से सबक सीखा है. अब दोनों एक दूसरे के कांधे पर हाथ डाले चुनावी मैदान में उतरे हैं.

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रिश्तों की तल्खी भूलकर नई शुरुआत करना दोनों पार्टियों की स्वाभाविक मजबूरी है. आजसू के नेतृत्व को इस बात का भरपूर एहसास है कि भाजपा की मदद के बगैर उसके प्रभाव क्षेत्र का विस्तार संभव नहीं. पिछले चुनाव में आजसू ने तीन-चार सीटों को छोड़कर जहां भी प्रत्याशी उतारे, वहां वह वोटकटवा की ही भूमिका में रही.

आजसू के खाते में भी दो-तीन सीटों का इजाफा संभव था, पर भाजपा ने उसके प्रभाव वाली जिन सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारकर उसका खेल बिगाड़ दिया. जाहिर तौर पर, नुकसान दोनों का हुआ. अब कमल औऱ केला दोनों एक साथ हैं. दोनों की कहानी कुल मिलाकर यही है ‘तुम्हरे बिन हमरा कौनो नाहीं’.

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लोकसभा चुनाव में साथ साथ, विधानसभा में अलग राह

2019 में लोकसभा औऱ झाऱखंड विधानसभा चुनाव हुए. लोकसभा चुनाव में पहली बार आजसू पार्टी ने एनडीए के फोल्डर में आकर चुनाव लड़ा. भाजपा ने अपनी पारंपरिक सीट गिरिडीह आजसू पार्टी को दी. वहां से पार्टी नेता चंद्र प्रकाश चौधरी जीते भी.

पहली बार आजसू पार्टी ने लोकसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी. पर अक्टूबर नवंबर आते आते दोनों ने अपने अपने तेवर में अलग होकर विधानसभा चुनाव लड़ा. खामियाजा दोनों को उठाना पड़ा. तकरीबन 50 लाख वोट भाजपा को मिले जबकि 7 लाख आजसू पार्टी को. संग रहने पर यह आंकड़ा 57 लाख होता जो सत्ता में आयी महागठबंधन सरकार के 52 लाख से अधिक होता.

रिजल्ट के बाद गलबहियां

पिछले तीन विधानसभा चुनावों को देखें. 2005 में आजसू पार्टी अकेले 40 सीटों पर लड़ी, 2 सीटें मिलीं. भाजपा ने 63 कैंडिडेट उतारे, 30 जीते. 2009 के चुनाव में भाजपा को 67 सीटों में से 18 पर जीत मिली. आजसू पार्टी 54 सीटों पर उतरी. 5 सीट निकाला. 2014 में भाजपा 72 सीटों पर लड़ी और 37 सीटें निकाली. आजसू पार्टी 8 सीटों पर लड़ी और 5 सीटें जीती.

हालांकि 2014 में पहली बार दोनों पार्टियों ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था. इसके पहले दोनों अलग ही चुनाव लड़ते थे. हालांकि चुनाव बाद दोनों एक दूजे के हमराही बन जाते रहे हैं. इत्तेफाक से आजसू पार्टी हर चुनाव में इतनी सीटें निकाल लेती रही है कि हर बार सत्ता में आने को भाजपा को इनकी जरूरत पड़ती है. सरकार बनाने में आजसू पार्टी भाजपा के लिए हमेशा किंगमेकर के तौर पर नजर आती है.

छूटते सभी बारी-बारी

चुनाव घड़ी में आजसू पार्टी के साथ नामी गिरामी चेहरे जुड़ते रहे हैं. 2019 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी उसके साथ पूर्व मंत्री राधाकृष्ण किशोर, राज्यसभा सांसद औऱ पूर्व कांग्रेसी प्रदीप बालमुचू, पूर्व विधायक अकील अख्तर औऱ ऐसे ही कई लोग थे.

इनमें से राधाकृष्ण किशोर राजद में अपना नया ठिकाना ढूंढ़ चुके हैं. प्रदीप बालमुचू भी अब तब में हैं. पूर्व में नवीन जायसवाल, विकास सिंह मुंडा जैसे युवा लीडर और विधायक भी पार्टी में आये थे पर टिके नहीं. ऐसे में आजसू पार्टी भी अपनी राजनीतिक पूंजी और वजूद को बनाये रखने को भाजपा के साथ जुड़ती रही है.

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नैचुरल एलायंस : दीपक प्रकाश

सांसद औऱ प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दीपक प्रकाश के मुताबिक भाजपा और आजसू पार्टी एक दूसरे के लिये स्वाभाविक दल रहे हैं. दोनों ने झारखंड अलग राज्य बनाने के लिये मेहनत की है. इस साल हुए राज्यसभा चुनाव में आजसू पार्टी ने भाजपा का साथ दिया. दोनों जब जब मिलकर लड़ते हैं, चुनाव परिणाम मनमाफिक होता है. बेरमो औऱ दुमका उपचुनाव में भी यह साबित होगा.

पार्टी प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव कहते हैं कि आजसू पार्टी आंदोलनकारी पार्टी रही है. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में झारखंड जैसा अलग राज्य सामने आया. ऐसे में दोनों स्वाभाविक रूप से एक दूसरे को पसंद करते रहे हैं. चुनावों से पहले राजनीतिक प्रतिबद्धताओं और परिस्थितियों के कारण कई तरह की चुनौतियां रहती हैं पर वास्तव में दोनों दल झारखंडी हितों के लिये लगातार साथ बनते रहे हैं.

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झारखंडी हितों के लिए सहभागिता

आजसू पार्टी के प्रवक्ता देवशरण भगत कहते हैं कि झारखंडी हित में आजसू पार्टी हमेशा आगे रही है. साथ ही झारखंड को राजनीतिक स्थायित्व के जरिये इस राज्य के विषयों पर काम करना भी. वर्तमान राज्य सरकार ने जनता से वादाखिलाफी की है. ऐसे में उनकी पार्टी एनडीए फोल्डर में जाकर साथ साथ चुनाव लड़ रही है.

राजनीतिक विश्लेषक अयोध्यानाथ मिश्रा के अनुसार आजसू पार्टी का नेतृत्व गंभीर और जवाबदेह नेता के पास है. ऐसे में समान उद्देश्य औऱ लोकहित में भाजपा के साथ उसका आना कोई ताज्जुब नहीं. दोनों झारखंडी विषयों के मामले में समान हद तक विचारधारा रखते हैं.

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