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सरकार और आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल के बीच 36 का आंकड़ा!

केंद्र सरकार तथा भारतीय रिजर्व बैंक के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. सूत्रों के अनुसार इस साल की शुरुआत में विभिन्न मुद्दों पर जो मतभेद शुरू हुए, वह बढ़ते चले जा रहे हैं.

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NewDelhi : केंद्र सरकार तथा भारतीय रिजर्व बैंक के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. सूत्रों के अनुसार इस साल की शुरुआत में विभिन्न मुद्दों पर जो मतभेद शुरू हुए, वह बढ़ते चले जा रहे हैं. खबरों के अनुसार रिजर्व बैंक के डेप्युटी गवर्नर विरल आचार्य द्वारा शुक्रवार को बैंक के कामकाज में केंद्र सरकार के हस्तक्षेप तथा उसकी स्वायत्तता के खतरे की ओर इशारा किये जाने ने आग में घी डालने का काम किया. यहां तक कि राजग सरकार के ही कुछ लोग कहने लगे हैं कि उर्जित पटेल से बेहतर तो रघुराम राजन ही थे.  जानकारों के अनुसार रिजर्व बैंक तथा केंद्र सरकार के बीच उपजे तनाव के कारण आनेवाले समय में गवर्नर उर्जित पटेल को सेवा विस्तार मिलने पर प्रश्न चिन्ह लग गया है.  बता दें कि अगले साल सितंबर में पटेलका  तीन सालों का कार्यकाल समाप्त होने वाला है लेकिन उन्हें सेवा विस्तार मिलना मुश्किल लग रहा है. द टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार राजग सरकार में शामिल एक शीर्ष नेता ने कुछ माह पहले कहा था कि रघुराम राजन के बाद पटेल को भी बाय-बाय कहना अच्छा नहीं लगेगा. इस क्रम में उर्जित पटेल की बातों से इत्तेफाक रखने वाले लोगों का कहना है कि आरबीआई गवर्नर को यह अच्छी तरह पता है कि उन्हें सेवा विस्तार मिलने वाला नहीं, इसलिए उन्हें भी केंद्र की कोई परवाह नहीं है.

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नीरव मोदी घोटाले ने आग में घी डालने का काम किया.   

सूत्रों के अनुसार  इस वर्ष 2018 में कम से कम दर्जन भर मुद्दों पर दोनों का विपरीत स्टैंड रहा. शुरुआती दौर में  सरकार की नाराजगी की वजह यह रही कि आरबीआई ने न सिर्फ मुख्य ब्याज दरों में कटौती करने से इनकार कर दिया, बल्कि उसे और बढ़ा दिया.  इसके बाद 12 फरवरी को आरबीआई ने नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स, एनपीए और लोन रीस्ट्रक्चरिंग के नये नियम को लेकर सर्कुलर जारी किया.  केंद्रीय बैंक के यह कदम सरकार को रास नहीं आया. नीरव मोदी घोटाले ने आग में घी डालने का काम किया.  बता दें कि केंद्र सरकार इस बात को लेकर आरबीआई पर बरस पड़ी कि आबीआई ने इसकी ढंग से निगरानी नहीं की.   लेकिन पटेल के सुर बगावती हो गये, उन्होंने केंद्र से बैंकों पर नियंत्रण के लिए और अधिक शक्तियां प्रदान करने की मांग की.  जानकारी के अनुसार आईएलएंडएफएस समूह की कंपनियों के डिफॉल्ट होने के बाद एनबीएफसी क्षेत्र में नकदी की भारी कमी दूर करने के लिए सरकार आरबीआई पर लगातार दबाव बना रही है, लेकिन इस मामले में केंद्रीय बैंक सुन नहीं रही है.

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सरकार में शामिल लोगों का कहना है कि इस तनाव को सरकार बनाम केंद्रीय बैंक के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए.  उनका कहना है कि गवर्नर को बोर्ड के साथ-साथ सबको साथ लेकर चलना होगा.  उन्होंने इस बात से इनकार किया कि सरकार आरबीआई के कामकाज में हस्तक्षेप कर रही है, लेकिन इस बात पर भी जोर दिया कि संस्थान की स्वायत्तता का इस्तेमाल उच्च विकास दर हासिल करने के लिए किया जाना चाहिए. 

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