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चुनावी बॉन्ड की घोषणा के बाद क्षेत्रीय पार्टियों ने कहा- भाजपा नहीं चाहती क्षेत्रीय पार्टियां बढ़ें

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Ranchi : पारदर्शिता और साफ-सुथरी राजनीति का हवाला देकर देश में चुनावी बॉन्ड की घोषणा की गयी. लेकिन, चुनावी बॉन्ड पर अब खुद राजनीतिक पार्टियां ही सवाल खड़ा कर रही हैं, क्योंकि राष्ट्रीय पार्टियों में बीजेपी को छोड़कर किसी भी अन्य पार्टी को बॉन्ड से कुछ खास मिला नहीं. क्षेत्रीय पार्टियों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है. राज्य की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों की बात की जाये, तो झामुमो को 52 लाख 33 हजार 247 रुपये और झाविमो को 73 लाख 79 हजार 284 रुपये चंदा में मिले. इस राशि में पार्टी कार्यकर्ताओं का भी योगदान है. जबकि, भारतीय जनता पार्टी को बॉन्ड और पार्टी कार्यकर्ताओं से मिली राशि को मिलाकर 10 अरब 27 करोड़ 33 लाख 96 हजार 540 रुपये मिले. वहीं, कांग्रेस को आठ करेाड़ 15 लाख 12 हजार 963 रुपये मिले.

राज्य में अक्टूबर से मिल रहा बॉन्ड

झारखंड में अक्टूबर माह से चुनावी बॉन्ड राजधानी रांची के कचहरी चौक स्थित एसबीआई में मिल रहा है. बैंक से यह पूछने पर कि अब तक कितने बॉन्ड बिके, बैंक ने वित्त मंत्रालय का हवाला देते हुए कहा कि यह पूर्ण गोपनीय है. क्योंकि, कितने बॉन्ड मिल रहे हैं, कौन ले रहा है, इसकी जानकारी किसी को नहीं देने का आदेश  है. जबकि, चुनावी बॉन्ड की घोषणा ही चुनावी और राजनीतिक पार्टियों के चंदे में पारदर्शिता के लिए की गयी थी. ऐसे में चुनावी चंदे में पारदर्शिता की बात धुंधली लगती है.

निर्देशित माह में 10 दिन ही मिलते हैं बॉन्ड

केंद्र सरकार की ओर से अक्टूबर में जारी गजट में पूर्व में मिल रहे 11 बैंकों के साथ अन्य 18 बैंकों को भी बॉन्ड देने के लिए रजिस्ट्रर्ड किया गया. इससे देश भर में कुल 29 एसबीआई शाखाएं हैं, जहां बॉन्ड मिल रहे हैं. साथ ही गजट में कहा गया है कि बॉन्ड सिर्फ जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर के पहले 10 दिन मिलेंगे. वहीं, लोकसभा चुनाव के दौरान अन्य तीस दिन की अवधि सरकार बढ़ा सकती है, यह कहा गया है. हैदराबाद की डाटा एनालिसिस करनेवाली संस्था फैक्टली ने जारी की गयी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि बॉन्ड मार्च, मई में भी बिके हैं.

क्षेत्रीय पार्टियों पर रोक लगाने की है नीति

झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने चुनावी बॉन्ड के क्षेत्रीय पार्टियों पर हो रहे असर पर कहा कि सरकार की नीति ही गलत है. भाजपा चाहती है कि सिर्फ राष्ट्रीय पार्टियों को चंदा का लाभ हो. इसलिए चुनावी बॉन्ड की नीति लागू की गयी. उन्होंने कहा कि पारदर्शिता की बात की गयी थी, लेकिन चुनावी बॉन्ड के आने से कहीं भी पारदर्शिता नहीं दिखती.

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