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संदर्भ मंडल डैम : मत कह क्या-क्या हुआ यहां इस वैशाली के आंगन में

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Inder Singh Namdhari

05 जनवरी 2019 के दिन भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी डालटनगंज की धरती पर मंडल डैम का शिलान्यास करने के लिए पधार रहे हैं. मंडल डैम का नाम सुनते ही मुझे बिहार के एक प्रसिद्ध कवि कि उपरोक्त शीर्षक वाली पंक्ति याद आ जाती है, जिसमें उन्होंने वैशाली की राम कहानी का वर्णन करते हुए लिखा था की, ”मत कह क्या-क्या हुआ यहां इस वैशाली के आंगन में”? मेरी दृष्टि में वैशाली एवं मंडल डैम की राम कहानी लगभग एक जैसी ही है. पिछले कई सदियों के इतिहास में वैशाली में क्या-क्या हुआ उसका वर्णन करना कवि को जब असंभव लगा तो उनको लिखना पड़ा कि वे नहीं कह सकते कि वैशाली के आंगन में कौन-कौन सी घटनाएं घट चुकी है? कुछ इसी तर्ज पर मैं भी मंडल डैम की पूरी राम कहानी का वर्णन नहीं कर सकता.

इस डैम का निर्माण पिछली शताब्दी के सत्तर के दशक में शुरू हुआ और 40 वर्षों के बाद भी यह डैम अभी तक अधर में लटका हुआ है. इस लंबे अंतराल में मंडल के निर्माणाधीन टाइम ने बहुत उतार-चढ़ाव देखे है. इस डैम का निर्माण बहुत हसरत से उस समय शुरू हुआ था जब मैंने राजनीति में नया-नया पैर रखा था. पलामू की जनता को इस डैम से काफी उम्मीदें थी क्योंकि इस योजना से न केवल सिंचाई के लिए पानी मिलता अपितु 25 केवीए का एक जल विद्युत के प्रकल्प का भी निर्माण होता. उन दिनों एकीकृत पलामू में लगभग इसी माता की विद्युत शक्ति की आवश्यकता थी. वर्ष 1980 में मैं डालटनगंज विधानसभा का विधायक बन गया था, इसलिए मुझे भी उपरोक्त योजना में काफी कसरत करनी पड़ी, क्योंकि मंडल डैम में डूबने वाले अधिकतर गांव आज के गढ़वा जिले के भंडरिया प्रखंड के अंतर्गत आते थे. जिन रैयतों की जमीन को डूबना था उनके मुआवजे एवं नौकरी के लिए विधायक होने के नाते मुझे भी बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी. मुआवजे के कई मामले तो अभी भी अधर में लटके हुए हैं, जबकि अधिकतर भू स्वामी काल की गाल में जा चुके हैं.

एक दिन ऐसा आखिर आ ही गया जब डैम का निर्माण शुरू हो गया और पलामू में श्री तिवारी के तत्कालीन अधीक्षण अभियंता बनने के बाद डैम के कार्य में तेजी से प्रगति भी होने लगी. लेकिन उनके जाने के बाद जहां काम में शिथिलता आ गई. वहीं काम की गुणवत्ता को लेकर भी उंगलियां उठने लगीं. निर्माण के दौरान मैंने भी इस डैम का कई बार भ्रमण किया था. डैम की कमजोर नींव को मजबूत करने के लिए अधीक्षण अभियंता श्री राय चौधरी को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी. डैम निर्माण शुरू होने के कुछ ही समय के बाद एकीकृत पलामू जिले में उग्रवादियों का प्रकोप इतना बढ़ गया कि मंडल डैम के ईलाके में लोग जाने में भी डरने लगे. मुझे याद है कि एक बहुत ही कर्मठ एवं शालीन अधीक्षण अभियंता स्व० मिश्रा की उग्रवादियों द्वारा डैम पर ही निर्मम हत्या कर दी गयी थी. जिससे इस डैम में एक नयी बाधा उपस्थित हो गयी.

उनकी हत्या की छानबीन का जिम्मा सीबीआइ को दे दिया गया. लेकिन सीबीआइ के अफसरों द्वारा कई बार घटना स्थल का निरीक्षण करने के बाद भी हत्या करने वाले दोषियों को पकड़ा नहीं जा सका. स्व० मिश्रा के बेटा एवं पुत्रवधू दोनों ही यूपी में आइपीएस अफसर थे तो भी स्व० मिश्रा की मौत के जिम्मेदार लोग पकड़े नहीं जा सके. इस दु:खद घटना के कई वर्षों बाद तक डैम का काम लगभग बंद रहा. उग्रवाद प्रभावित मंडल में असामाजिक तत्वों ने डैम के पीलरों से लोहे के छड़ तक निकाल डाले. काम पुन: शुरू होने पर वन विभाग ने अडचन लगा दी कि जब तक डूब क्षेत्र में पड़ने वाली वन विभाग की जमीन के बदले दो गुनी जमीन वन रोपन के लिए विभाग को उपलब्ध नहीं करा दी जाती तब तक काम शुरू नहीं होगा. इसी उधेड़बुन में मंडल का काम त्रिशंकु की तरह अधर में लटकता रहा.

लेकिन उसका कोई व्यावहारिक हल नहीं निकल सका. संयोग से वर्ष 2009 में मैं भी चतरा का सांसद बन गया और मुझ पर डैम में आई कठिनाइयों को दूर करने की नैतिक जिम्मेवारी आ गई, क्योंकि मंडल डैम लातेहार जिला के बरवाडी प्रखंड में पड़ता है जो चतरा संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है. यह ज्ञातब्य है कि मंडल डैम के बन जाने से अधिकतर सिंचित होने वाली जमीन तो बिहार के अंदर ही पड़ेगी और औरंगाबाद जिला को सबसे ज्यादा फायदा होगा. चतरा का सांसद होने के नाते मैं और औरंगाबाद के सांसद सुशील कुमार सिंह दोनों ने मिलकर तत्कालीन केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री श्रीमती जयंती नटराजन से कई बार मुलाकात की और इस महत्वपूर्ण डैम में आई अड़चन को दूर करने का आग्रह किया. लेकिन उसका कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला, क्योंकि जयंती नटराजन के लिए एक कहावत मशहूर थी कि उनके विभाग में कोई भी काम “जयंती टैक्स” के बिना नहीं होता था.

इस दु:खद पृष्ठभूमि में मुझे उस समय बड़ी प्रसन्नता हुई थी जब यह पता चला की चतरा एवं औरंगाबाद के सांसदों क्रमशः सुनील कुमार सिंह एवं सुशील कुमार सिंह ने तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री श्री प्रकाश जावेडकर से मिलकर वन विभाग की अड़चन को दूर करने का सार्थक प्रयास किया है. लेकिन समस्या के निदान का कोई ठोस हल सामने नहीं आया. मुझे खुशी है कि माननीय प्रधानमंत्री जी 05 जनवरी 2019 को इस चिरप्रतीक्षित प्रकल्प को पूरा करने के लिए पुनः शिलान्यास करने के लिए आ रहे हैं. वास्तव में यदि माननीय प्रधानमंत्री जी ने थोड़ा और ध्यान दिया होता तो आगामी 5 जनवरी के दिन को शिलान्यास के बदले उद्घाटन का दिन भी बनाया जा सकता था. मैं इस तथ्य को इसलिए उजागर कर रहा हूं क्योंकि वर्ष 2019 के संसदीय चुनाव अब दस्तक दे रहे हैं और दो-तीन महीनों के अंदर आदर्श आचार संहिता लागू हो जाएगी. मैं नहीं समझता की तब तक उपरोक्त योजना की निविदा भी आमंत्रित हो पाएगी.

इस आलोक में यदि यह कहा जाए की 05 जनवरी 2019 को डालटनगंज में प्रधानमंत्री जी का तामझाम से होने वाला कार्यक्रम मात्र चुनावी स्टंट है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. जिस ढंग से चियांकी के मैदान में जोर-शोर से तैयारियां की जा रही है और पलामू जिले के सभी स्कूलों की सभी बसें जिला प्रशासन द्वारा अधिग्रहित कर ली गई है. उससे तो यही झलकता है कि 05 जनवरी 2019 को डालटनगंज में मात्र चुनावी शंखनाद होकर रह जाएगा. लेकिन मंडल डैम के भविष्य पर अभी भी प्रश्नचिन्ह यथावत लगा रहेगा, क्योंकि वर्ष 2019 के संसदीय चुनावों के परिणाम अभी तक भविष्य के गर्भ में छिपे हुए हैं.

 (लेखक झारखंड विधानसभा के पहले स्‍पीकर रह चुके हैं)

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