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जिले के 210 गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों से सालाना एक करोड़ रुपये की वसूली

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Bikash Pandey

Dhanbad :  बीते करीब दस साल से यह दस्तूर चल रहा है. जिले के गैर मान्यता प्राप्त स्कूलाें में पढ़ रहे हजारों बच्चों के भविष्य की अनदेखी कर जिम्मेवार राज्य सरकार के शिक्षा विभाग के अधिकारी अवैध वसूली कर रहे है. जिले के गैर मान्यता प्राप्त 210 स्कूलों का मामला उस समय से चल रहा है जब प्रदीप चौबे धनबाद के डीएसई थे. राज्य शिक्षा विभाग के पदाधिकारियों की पहल पर प्राइवेट स्कूल़ों को मान्यता के प्रश्न पर नोटिस किया गया था.

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पंजीयन दूसरे मान्यता प्राप्त स्कूलों से भरवाते हैं

शिक्षा विभाग को पता चला कि जिले में  210 गैर मान्यता प्राप्त स्कूल हैं. ऐसे 210 स्कूल हैं जिसकी सीबीएसई और आईसीएसई से मान्यता बताकर बड़ी-बड़ी बिल्डिंग बनाकर हजारों विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को गुमराह कर रहा है. ऐसे स्कूल जिले के कई गली, मुहल्लों में मिल जाएंगे. चूंकि अभिभावकों और छात्रों को पता नहीं होता इसलिये वे इन स्कूल संचालकों के जाल में फंस जाते हैं. ये स्कूल इन लोगों से मोटी फीस भी वसूलते हैं. जबकि इन स्कूलों के पास न तो झारखंड सरकार से एनओसी मिली हुई है और न ही सीबीएसई-आइसीएसई से मान्यता. इन स्कूलों में सीबीएसई के ही पाठ्यपुस्तक और सेलबस के आधार पर पढ़ाई होती है. हद तो तब हो जाती है जब ये स्कूल बच्चों को तो साल भर अपने स्कूलों में ही पढ़ाते है लेकिन जब मैट्रिक-इंटर जैसी परीक्षा का समय आता है तब ये परीक्षा फ़ार्म और छात्रों का पंजीयन दूसरे मान्यता प्राप्त स्कूलों से करवाते हैं. साथ ही छात्रों से दुगुनी फीस भी वसूलते हैं. जबकि दसवीं कक्षा तक पढ़ाने और सीबीएसई पाठ्यक्रम चलाने के लिए भी सीबीएसई से अनुमति की दरकार है.

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सरकार ने अभी तक ऐसे स्कूलों को एनओसी तक नहीं दिया

जिले में 210 ऐसे गैर मान्यता प्राप्त स्कूल हैं, जिनका डीएसई कार्यालय में एनओसी के लिए आवेदन पड़ा है. कहिए तो यह आवेदन देना ही ऐसे गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों को चलाने का आधार है. ऐसे स्कूलों को बंद करने के लिए कोई अतिरिक्त आदेश की जरूरत नहीं. राज्य शिक्षा विभाग और जिले के सक्षम आधिकारी समुचित कार्रवाई कर सकते हैं. बिना मान्यता के स्कूल चलाने की इजाजत देने पर संचालक अभिभावकों को बता रहे हैं कि उनका स्कूल सीबीएसई या आइसीएसई पाठयक्रम संचालित कर रहा है, जबकि झारखंड सरकार ने अभी तक ऐसे स्कूलों को एनओसी तक नहीं दिया है. फिर भी जिले के गैर मान्यता प्राप्त निजी स्कूल इनकी धड़ल्ले से अनदेखी कर रहे हैं.

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अधिकारियों की मिलीभगत और मेहरबानी से चल रहे स्कूल

अधिकारियों की इन स्कूल संचालकों पर मेहरबानी इतनी है कि 5 वर्ष पहले ही इन स्कूलों के बंद करने के आदेश के बावजूद भी अब तक ये स्कूल चल रहे हैं. बदले में समय-समय पर अधिकारियों को 10 हजार से लाखों तक का नजराना मिलता है. जब कभी इसमें देरी होती है तो अधिकारी इन स्कूलों पर कार्रवाई की कवायद तेज करके डराने में लग जाते हैं. किन्तु जैसे ही निर्धारित सेवा उपलब्ध हो जाती है, सभी अधिकारी इस पर चुप्पी साध लेते हैं. ऐसा हो भी क्यों न, सेवा ऊपर तक पहुंचती है. उसके बाद चाहे बोर्ड स्तर की बात हो या शिक्षा अधिकारियों की कार्रवाई की बात सभी को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है.

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क्या कहता है नियम

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत एक अप्रैल 2010 से पहले के संचालित सभी गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों के लिए एनओसी और संबंधित बोर्ड से संबद्धता अनिवार्य है. एक अप्रैल 2010 के बाद स्कूल पहले विभाग से एनओसी लेंगे, उसके बाद स्कूल का संचालन करेंगे. एक अप्रैल 2010 से 31 मार्च 2015 तक एनओसी लेने के लिए समय दिया गया था, इसके बाद बिना मान्यता वाले स्कूलों को बंद करने का निर्देश दिया गया.-स्कूलों का यू-डायस कोड होना चाहिए. बीएड शिक्षक होने चाहिए, खेल का मैदान होना चाहिए.

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वेबसाइट नहीं, धोखाधड़ी साइट

90 फीसदी स्कूलों ने वेबसाइट बनाकर खुद को सीबीएसई एफिलिएटेड बताया है. प्री-नर्सरी, प्राइमरी और जूनियर कक्षाओं को एफिलिएटेड दिखाने वाले स्कूल खुलेआम गुमराह कर रहे हैं. ऐसा तब है जबकि सीबीएसई प्री-प्राइमरी और प्राइमरी कक्षाओं की मान्यता देता ही नहीं है.

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ये सभी हैं गैर मान्यता प्राप्त निजी स्कूल

जिले में 210 गैर मान्यता प्राप्त निजी स्कूल हैं. इनमें से टैगोर एकेडमी पंडित क्लिनिक रोड, विद्या भारती पब्लिक स्कूल भेलाटांड़, मानस इंटरनेशनल स्कूल हाउसिंग कालोनी, झारखंड पब्लिक स्कूल धैया, मॉडर्न पब्लिक मिशन ऑफ नॉलेज चिरागोड़ा, अपर्णा पब्लिक स्कूल भुईफोड़, मोंटफोर्ट एकेडमी राजगंज, लुसियस स्कूल पंडित क्लिनिक रोड आदि प्रमुख हैं.

मामले में प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए धनबाद के शिक्षा विभाग के अधिकारी उपलब्ध नहीं हो पाये. उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार है. इस बीच समाजसेवी सुनिल सिंह ने कहा है कि गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों के संचालन में बुनियादी तौर पर ही गड़बड़ी है. इसकी ट्रस्ट्री और संचालन समिति में भी गड़बड़ी है. किसी भी नियम, कानून का पालन नहीं किया जा रहा है.

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