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एनजीओ रोज, इसडो और सहयोग विलेज से बालगृहों का संचालन वापस लेने की अनुशंसा

Ranchi : रांची की मिशनरीज ऑफ चैरिटी के निर्मल हृदय से बच्चा बेचे जाने के मामले को सीएम रघुवर दास ने गंभीरता से लिया है. इस सिलसिले में सीएम ने समाज कल्याण विभाग और बाल अधिकार संरक्षण आयोग के साथ बैठक भी की थी. बैठक में सीएम ने बाल अधिकार संरक्षण आयोग को राज्य में चल रहे बाल गृह और आश्रय होम्स का जायजा लेने का निर्देश दिया है. सीएम के आदेश के बाद बाल संरक्षण आयोग द्वारा पांच टीम बनाकर राज्य में चल रहे बालगृह, दत्तक ग्रहण संस्थानों, बालिका गृह का अवलोकन कर सीएम को रिपोर्ट सौंपा जा चुका है.

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क्या है रिपोर्ट में

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जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य में चल रहे बालगृह में नियमों को ताक पर रखकर एनजीओ सरकार से अनुदान की राशि प्राप्त कर रहे हैं. आधारभूत संरचना के लिए संस्थाओं को राज्य सरकार ने अनुदान दिया, लेकिन इस अनुदान राशि का दुरुपयोग हुआ है. रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार को जांच समिति गठित कर पिछले दो वर्षों से आधारभूत संरचना के लिए दी गयी राशि की जांच करनी चहिए. वहीं, सुरक्षा की दृष्टि से भी सभी बाल गृह की आधारभूत संरचना किशोर न्याय अधिनियम के अनुसार नहीं पाये गये, जिसे ठीक करने की आवश्यकता है. साथ ही, संस्थाओं द्वारा बालगृह के संचलन में किशोर न्याय अधिनियम का पलान नहीं किया जा रहा है. आयोग के जांच दल ने पाया कि सरकार द्वारा भी बच्चों के खान-पान की राशि का समय पर भुगतान नहीं हो रहा है, जिससे बालगृह में रह रहे बच्चों को सही से भोजन भी नहीं मिल रहा है.

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इन NGOs से बालगृह को वापस लेने की हुई अनुशंसा

जांच समिति द्वारा लातेहार के एनजीओ रोज, पलामू के इसडो और गढ़वा व सिमडेगा में बालगृह का संचालन कर रहे एनजीओ सहयोग विलेज से इनके द्वारा संचालित ऐसे आश्रमों को तत्काल वापस लेने की अनुशंसा की गयी है. इन संस्थाओं द्वारा नियमों को ताक पर रखकर काम किया जा रहा है. बालगृह चलानेवाले एनजीओ पारा लीगल वॉलंटियर का पैसा खुद ही गटक जा रहे हैं. जबकि, पारा लीगल वॉलंटियर रखना जरूरी है. बालगृह में रहनेवाले बच्चों को जमीन पर दर्री बिछाकर सुलाया जा रहा है.

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सृजन फाउंडेशन और प्रौद्योगिकी विकास संस्था को सुधरने के लिए एक माह का मिला समय

सरकार से अनुदान प्राप्त कर बालगृहों का संचालन करनेवाले सृजन फाउंडेशन और प्रौद्योगिकी विकास संस्था को सुधार करने की चेतवानी देते हुए एक माह का समय दिया गया है. इन एनजीओ द्वारा चलाये जा रहे बालगृह में भी नियमों को ताक पर रखकर काम किया जा रहा है. इसमें आधारभूत संरचना किशोर न्याय अधिनियम के अनुसार नहीं है. वहीं, बच्चों के मनोरंजन का कोई साधन बालगृह में नहीं है. सुरक्षा व्यवस्था को भी ताक पर रखकर गृह का संचालन किया जा रहा है. बालगृह में गंदगी का अंबार लगा हुआ है, जो वहां रहनेवाले बच्चों के स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है. बालगृह में पानी एवं रोशनी हेतु बिजली की उचित व्यवस्था नहीं है. इसके अलावा बालगृह में मौजूद बच्चों की समय-समय पर चिकित्सा जांच हेतु पैरा लीगल वॉलंटियर को नियुक्त करने का प्रावधान है, मगर इस पद पर किसी पारा लीगल वॉलंटियर की नियुक्ति नहीं की गयी है. बच्चों को कपड़े, जूते एवं आवश्यक सामग्री समय-समय पर बच्चों को दी जानी है, मगर बच्चों को यह सामग्री देने के लिए कोई स्टाफ बालगृह में नहीं मिला. बालगृह में कार्यरत कर्मचारियों की पुलिसिया जांच नहीं करायी गयी. वहीं, बालगृह में कार्यरत कर्मचारियों के चयन में भी नियम का उल्लंघन किया गया है. बाल अधिकार संरक्षण आयोग के जांच दल ने हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, गिरिडीह, देवघर, लातेहार, गढ़वा और पलामू में मौजूद बालगृहों की जांच की थी. इनमें से कुछ को सुधार के लिए एक से दो माह का समय दिया गया है, जबकि कई बालगृह को निरस्त कर किसी सक्षम एजेंसी को तुरंत देने को कहा गया है.

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