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बिजली समस्या, डीवीसी का बकाया, सरकार-विपक्ष के बयान और मौजूदा स्थिति पर पढ़ें न्यूज विंग पड़ताल…

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Akshay/Chhaya

Ranchi: 29 जनवरी को हेमंत सरकार शपथ लेती है. 20 फरवरी 2020 को डीवीसी के कॉमर्शियल चीफ इंजीनियर की तरफ से जेबीवीएनएल के चीफ इंजीनियर को एक चिट्ठी लिखी जाती है.

चिट्ठी में लिखा होता है कि नवंबर 2019 तक का बिजली बकाया 4955 करोड़ रुपए हो गया है. अगर 15 दिनों के अंदर भुगतान नहीं होता है तो डीवीसी की तरफ से दी जा रही 600 मेगावाट बिजली को घटा कर 300 कर दी जाएगी.

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फिर भी जेबीवीएनएल की तरफ से भुगतान नहीं होता है तो रोजाना 10 फीसदी बिजली में कटौती की जाएगी. अपने नियम और शर्त के मुताबिक, डीवीसी ने भुगतान ना होने की सूरत में बिजली कटौती करनी शुरू कर दी. राज्य के सात जिलों में बिजली कटौती से हाहाकार मचा.

विधानसभा के चलते सत्र में सत्ता दल और विपक्ष दोनों की तरफ से डीवीसी से वार्ता कर बिजली कटौती को कम करने की बात कही जाने लगी. बीजेपी की तरफ से उनके प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने बयान जारी कर कहा कि उनकी सरकार ने डीवीसी को एक मुश्त 4500 करोड़ दिये थे.

इसमें हेमंत सोरेन के 14 महीने के कार्यकाल का बकाया भी शामिल था. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि बिजली कटौती की जिम्मेदार मौजूदा हेमंत सरकार है. इस मामले पर पढ़िये जेबीवीएनएल और डीवीसी के बीच बिजली कटौती और बकाये की पूरी कहानी….

2017 मार्च के बाद तत्कालीन सरकार की वजह से मचा हाहाकार

झारखंड को पिक आवर में 1600-1800 मेगावाट बिजली की जरूरत होती है. इसमें डीवीसी झारखंड को 600 मेगावाट की बिजली सप्लाई करता है. यह बिजली डीवीसी के कोडरमा प्लांट से दी जाती है.

एक औसत के मुताबिक, डीवीसी का जेबीवीएनएल पर हर महीने का बिल 250-300 करोड़ का होता है. पिछले बकाये को जोड़ते हुए मार्च 2017 तक का कुल बकाया करीब 8000 करोड़ हो गया था.

बकाया ज्यादा होने की वजह से केंद्र सरकार को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा. पंजाब नेशनल बैंक की मदद से वन टाइम सेटेलमेंट किया गया. जेबीवीएनएल की तरफ से 31 मार्च 2017 को डीवीसी को 4780 करोड़ रुपए की राशि दी गयी. इस भुगतान के बाद बकाया करीब-करीब शून्य हो गया.

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31 मार्च 2017 के बाद अगर जेबीवीएनएल चाहता तो हर महीने भुगतान कर डीवीसी पर कर्ज के बोझ को हल्का कर रख सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 31 मार्च 2017 के बाद रघुवर सरकार की तरफ से 250-300 करोड़ की बिजली बिल की एवज में सिर्फ 150-200 करोड़ भुगतान किया जाने लगा. किसी-किसी महीने ये भुगतान भी जेबीवीएनएल की तरफ से नहीं किया गया. जिससे बकाये की राशि में इजाफा होने लगा.

वहीं जून 2019 के बाद से डीवीसी को बिजली बिल के एवज में एक भी राशि नहीं दी गयी. जिससे डीवीसी का बिल नवंबर 2019 तक 4955 करोड़ पहुंच गया.

जिसके भुगतान के लिए डीवीसी ने 10 फरवरी 2020 को जेबीवीएनएल को लेटर लिखा. यहां यह जानना जरूरी है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास सीएम होने के साथ-साथ ऊर्जा विभाग के मंत्री भी थे और राहुल पुरवार जेबीवीएनएल के एमडी थे. 2014 से 2019 के बीच ऊर्जा विभाग के सचिवों का तबादला होता रहा. लेकिन राहुल पुरवार अपनी कुर्सी पर ही बने रहे.

18 नहीं अब होगी 12 घंटे की कटौती

पूरे मामले पर जेबीवीएनएल जीएम कर्मिशयल ऋषिनंदन ने कहा कि उदय योजना के तहत 5534 करेाड़ रूपये केंद्र सरकार ने दिये. जिससे डीवीसी को 4700 करोड़ रूपये बकाया दिया गया. हालांकि यह केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद हुआ, जिसके बाद डीवीसी का बकाया जीरो बैलेंस हो गया.

हर महीने डीवीसी से लगभग 300 से 250 करोड़ रूपये की बिजली खरीद की जाती है. पिछले एक साल में ये समस्या अधिक हुई, जब जनवरी 2019 से जेबीवीएनएल द्वारा डीवीसी से कंज्यूमर मोड के बदले डायरेक्ट बिजली खरीद की जाने लगी. पिछले साल तक डीवीसी से 3.68 प्रति यूनिट बिजली खरीदी जाती थी. इस साल से ये 5.69 रूपये प्रति यूनिट खरीदी जा रही है.

अब शुक्रवार को 400 करोड़ भुगतान के बाद डीवीसी अब बिजली कटौती में कमी करेगा. 18 की बजाय अब 12 घंटे बिजली कटौती होगी.

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बिजली कर्ज पर मौजूदा सरकार का कहना

केंद्र की उदय योजना के तहत 2017 को जेबीवीएनएल को 5534 करोड़ का अनुदान दिया गया. जेबीवीएनएल ने अनुदान राशि डीवीसी को दी. साथ ही जेबीवीएनएल को अगले तीन साल के लिये अपनी कमायी से ही खरीदी गयी बिजली का भुगतान करने की उम्मीद की गयी.

वर्तमान स्थिति ये है कि डीवीसी का करीब 4500 करोड़, टीवीएनएल का 4400 करोड़ और अन्य संस्थाओं को मिलाकर दस हजार करोड़ का बकाया है. वर्तमान सरकार की संभावनाएं है कि जेबीवीएनएल की योजनाओं से भविष्य में 7600 करोड़ और संचरण से भविष्य में 3700 करोड़ या उससे अधिक नुकसान हो सकता है. जेबीवीएनएल और संचरण के योजनाओं और बकाये का दायित्व जोड़ा जाये तो कुल 21 हजार करोड़ रूपये से भी अधिक होगा.

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