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राजेंद्र यादव के परिश्रम, पैशन और पेशेंस का कमाल हंस का फिर से प्रकाशन शुरू करना

  • जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : राजेंद्र यादव हिंदी के सबसे बेबाक और विवादास्पद लेखक रहे हैं. 28 अगस्त 1929 को आगरा में राजेंद्र का जन्म हुआ था. आगरा से एमए करने के बाद कलकत्ता चले गए. वहां कई बरस रहे. सरकारी नौकरी का मौका मिला था पर नौकरी करने का मन नहीं था. पूरी तरह से लेखन को ही करियर बनाया.

कलकत्ता में रहने के दौरान ही इनका परिचय मन्नू भंडारी से हुआ. धीरे-धीरे ये मुलाकात प्रेम संबंध में तब्दील हुई और ये एक दूजे के हो गए. लेकिन एक पति-पत्नी के रूप में राजेंद्र और मन्नू में तालमेल नहीं बना. मन्नू भंडारी ने अपने आत्मकथात्मक उपन्यास एक कहानी ये भी में इसके लिए राजेंद्र यादव को जिम्मेदार ठहराया है.

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मन्नू ने लिखा है कि राजेंद्र परिवार में रहने की सभी सुविधाएं तो चाहते रहे लेकिन जिम्मेदारियों उठाने से निरंतर भागते रहे. उन्होंने कई उदाहरण भी दिए हैं एक में तो राजेंद्र के बीमार बेटी को डॉक्टर के नहीं ले जाकर ये महिला मित्र से मिलने निकल गए थे. खैर इन दोनों की अनबन का नतीजा ये हुआ की दोनों अलग हो गए.
राजेंद्र यादव से लेखक ओमा शर्मा ने अगस्त 2000 में साक्षात्कार लिया था. इससे जानिए उनके बेबाक विचार

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साहित्य का मतलब यथास्थिति का कहीं ना कहीं प्रतिरोध करना

राजेंद्र कहते हैं कि ऐसा साहित्य जो प्रश्न नहीं उठाता, असहमति पैदा नहीं करता वह समाज में रचनात्मक बदलाव नहीं आने देगा. ऐसे साहित्य का उद्देश्य क्या हो सकता है. मेरे लिए साहित्य का मतलब है यथास्थिति का कहीं ना कहीं प्रतिरोध करना. हमारे यहां दुर्भाग्य से ऐसा होना गौतमबुद्ध की मृत्यु के बाद होना बंद हो गया.
ओमा ने पूछा कि ऐसे लेखक कौन से होंगे जिनको आप छूने की कोशिश करना चाहेंगे या जिनके लिखे को पढ़कर आपके अंदर काश मैं भी भाव आए.

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रेणु को लेकर एप्रिसिएशन

राजेंद्र कहते हैं कि बना बनाया उत्तर तो टॉलस्टॉय और चेखव ही हैं. बहुत ज्यादा एप्रिसिएशन मेरे मन में रेणु को लेकर है. मुझे राकेश की कुछ कहानियां बहुत अच्छी लगती हैं.

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कमलेश्वर में लफ्फाजी

कमलेश्वर में मुझे शुरू से ही एक लफ्फाजी लगती है जिसे मैंने लिखा भी है. उसमें मुझे एक चीज शुरू से ही लगती आई है और अब जाकर तो बिल्कुल साफ हो गई है कि विचारहीनता का जो गढ्ढा है उसे जब आप शब्दों के पत्थरों से पाटते हैं तो कुछ नहीं बनता. ज्यादा से ज्यादा कुछ खूबसूरत वाक्य और चुस्त फिकरे.. जहां कंटेंट कुछ नहीं होता. राजेंद्र सिंह बेदी से भी कृष्ण चंद्र के बारे में किसी ने कहा था कि चंदर साहब क्या खूबसूरत जुबान लिखते हैं? क्या जादू जगा देता है तो बेदी ने सादगी से कहा कि जादू ही जगाता रहेगा या कभी कहानी भी लिखेगा.

राजेंद्र कहते हैं श्रीलाल शुक्ल जैसा भी नहीं होना चाहता. उनकी भाषा अच्छी है वे यथार्थ बहुत ईमानदारी से पकड़ते हैं, मगर साहस की कमी है. मुझे वहां वैचारिकता का अभाव मिलता है. वे मेरी लाइकिंग नहीं हैं.

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शैलेश मटियानी जैसा गहराई और तन्मयता से लिखने की इच्छा

वे बेबाकी से कहते हैं कि प्रेमचंद अच्छे और जरूरी लगते हैं मगर ऐसे नहीं लगता कि ऐसा लिखने की मेरी इच्छा हो. कभी-कभी शैलेश मटियानी के बारे में जरूर लगता है कि काश इतनी गहराई और तन्मयता के साथ में लिख पाता. उस रूप में तो हिंदी में शैलेश मटियानी अकेले ही हैं दूसरा कोई नहीं.
जहां तक चेखव की बात है तो शुरू में उनसे प्रभावित था मगर बहुत जल्द ही उससे मुक्त हो गया. काफ्का से जरूर मैं बहुत दिनों तक आतंकित रहा, शायद आज भी हूं.

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मन्नू भंडारी से रिश्ते के बारे में

राजेंद्र कहते हैं शायद मुझे लगता है कि हम लोग दोस्त बहुत अच्छे हो सकते हैं पति-पत्नी नहीं. मेरी जिंदगी का जो पैटर्न है वह मन्नू से बहुत अलग है. उसमें किसी और के लिए जगह ही नहीं बनती. किसी दूसरे की मौजूदगी असुविधा पैदा करती है. जैसे मैं घर पर हूं तो भी मेरा मिनट दर मिनट कार्यक्रम तय रहता है. उठना- बैठना पढ़ना – लिखना फिर सोचना पढ़ना दफ्तर. किसी दूसरे के लिए बड़ा अमानुषिक हो जाता है कि आप साथ ही रह रहे हैं मगर एकदम फालतू से बनकर. उसके लिए दिनचर्या में स्पेस ही ना हो.

लाजवाब उपन्यास सारा आकाश

राजेंद्र यादव का उपन्यास सारा आकाश साहित्य प्रेमियों को जरूर पढ़ना चाहिए. इस पर निर्देशक बासु चटर्जी ने फिल्म भी बनाई थी. मैंने मन्नू भंडारी और राजेंद्र यादव का लिखा हुआ उपन्यास एक इंच मुस्कान भी पढ़ा है जो रोचक है लेकिन इसमें राजेंद्र वाला हिस्सा ज्यादा दुरूह और बोझिल लगा था. मन्नू ने जो हिस्सा लिखा वो अच्छा लगा था.
इनकी कुछ कहानियां भी अच्छी हैं. अपने अपने ताजमहल याद आ रही है. राजेंद्र, मोहन_राकेश और कमलेश्वर की तिकड़ी ने ही नयी कहानी का परचम लहराया था.

हंस को पुनर्जीवित किया

मेरे हिसाब से राजेंद्र यादव का सबसे बड़ा योगदान साहित्यिक पत्रिका हंस को पुनर्जीवित करने का दुश्कर काम करना है. खासकर तब जब इनके पास पर्याप्त पूंजी भी नहीं थी. किसी तरह कर्ज लेकर उसे एक मुकाम तक पहुंचाना राजेंद्र यादव के परिश्रम, पैशन और पेशेंस का कमाल है. इसके लिए हम हिंदी भाषी लोगों को इनका शुक्रगुजार होना चाहिए.हां एक बात और राजेंद्र जबरदस्त पढ़ाकू भी थे खासकर विदेश के बड़े लेखकों को उन्होंने पढ़ा था.

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कहानी-संग्रह

देवताओं की मूर्तियाँ 1952,
खेल-खिलौनेः 1953
जहाँ लक्ष्मी कैद हैः 1957
अभिमन्यु की आत्महत्याः 1959
छोटे-छोटे ताजमहलः 1961
किनारे से किनारे तकः 1962
टूटनाः 1966,
चौखटे तोड़ते त्रिकोणः 1987,
ये जो आतिश गालिब (प्रेम कहानियाँ): 2008
यहाँ तकः पड़ाव-1, पड़ाव-2(1989)
वहाँ तक पहुँचने की दौड़, हासिल

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उपन्यास

सारा आकाशः 1959 (‘प्रेत बोलते हैं’ के नाम से 1951 में)
उखड़े हुए लोगः 1956
कुलटाः 1958
शह और मातः 1959
अनदेखे अनजान पुलः 1963
एक इंच मुस्कान (मन्नू भंडारी के साथ) 1963,
मन्त्रविद्धा: 1967
एक था शैलेन्द्र: 2007
कविता-संग्रह
आवाज तेरी हैः 1960

नाटक

चैखव के तीन नाटक (सीगल, तीन बहनें, चेरी का बगीचा)।

अनुवाद

उपन्यास : टक्कर (चैखव), हमारे युग का एक नायक (लर्मन्तोव) प्रथम-प्रेम (तुर्गनेव), वसन्त-प्लावन (तुर्गनेव), एक मछुआ : एक मोती (स्टाइनबैक), अजनबी (कामू)- ये सारे उपन्यास ‘कथा शिखर’ के नाम से दो खण्डों में- 1994, नरक ले जाने वाली लिफ्ट: 2002, स्वस्थ आदमी के बीमार विचार: 2012।

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समीक्षा-निबन्ध

कहानीः स्वरूप और संवेदनाः 1968, प्रेमचन्द की विरासतः 1978, अठारह उपन्यासः 1981 औरों के बहानेः 1981, काँटे की बात (बारह खण्ड)1994, कहानी अनुभव और अभिव्यक्तिः 1996, उपन्यासः स्वरूप और संवेदनाः 1998, आदमी की निगाह में औरतः 2001, वे देवता नहीं हैं: 2001, मुड़-मुड़के देखता हूँ: 2002, अब वे वहाँ नहीं रहते: 2007, मेरे साक्षात्कारः 1994, काश, मैं राष्ट्रद्रोही होता : 2008, जवाब दो विक्रमादित्य (साक्षात्कार): 2007।

सम्पादन

एक दुनिया समानान्तरः 1967,
प्रेमचन्द द्वारा स्थापित कथा-मासिक ‘हंस’ का अगस्त,1986 से
कथा-दशकः हिन्दी कहानियाँ (1981 -90),
आत्मतर्पणः 1994, अभी दिल्ली दूर हैः 1995, काली सुर्खियाँ (अश्वेत कहानी-संग्रह): 1995, कथा यात्रा: 1967, अतीत होती सदी और त्रासदी का भविष्य: 2000 औरत : उत्तरकथा 2001, देहरी भई बिदेस, कथा जगत की बाग़ी मुस्लिम औरतें, हंस के शुरुआती चार साल 2008 (कहानियाँ), वह सुबह कभी तो आयेगी (साम्प्रदायिकता पर लेख): 2008

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