Opinion

रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य का जाना तय था!

Girish Malviya

आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कार्यकाल पूरा होने से 6 महीने पहले इस्तीफा दे दिया है. यह इस्तीफा बता रहा है कि आरबीआइ में अब तक स्थिति सामान्य नहीं हुई है.

दरअसल यह सारा मामला आरबीआइ की स्वायत्तता से जुड़ा हुआ है, पहले इसी मुद्दे पर उर्जित पटेल ने इस्तीफा दिया और अब विरल आचार्य भी निकल लिए हैं.

इस तथ्य को छुपाया जा रहा है, लेकिन हकीकत यही है कि मोदी सरकार की गलत आर्थिक नीतियों की वजह से आंतरिक वित्तीय खोखलापन बढ़ता ही जा रहा है.

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और इसी वजह से मोदी सरकार की नजर रिजर्व बैंक के आपातकालीन फंड पर है. इसके लिए उर्जित पटेल के जाने के बाद सरकार की तरफ से विशेष पैनल गठित की गयी थी, जिसने यह पाया कि आरबीआइ के पास ‘’जरूरत से अधिक पूंजी का भंडार’’ है.

माना जा रहा है कि इसी महीने में पैनल इस प्रस्ताव पर रिपोर्ट पेश कर सकती है जिसमें वह पहले शुरुआती तौर पर केंद्रीय बैंक सरकार को एक लाख करोड़ रुपये की पूंजी ट्रांसफर करेगी और बाद में यह रकम तीन लाख करोड़ रुपये तक भी हो सकती है.

विरल आचार्य ओर पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल मोदी सरकार के इस फंड डायवर्सन के प्लान से शुरू से सहमत नहीं थे. उनका मानना था कि सरकार के इस कदम से देश की अर्थव्यवस्था कमजोर होगी और वैश्विक निवेशकों का भरोसा भी अर्थव्यवस्था से कम होगा.

दरअसल विरल आचार्य पिछले साल ही आरबीआइ की स्वायत्तता के मामले में व्हिसल ब्लोअर की भूमिका में आ गए थे. जब उन्होंने अपनी एक स्पीच में रिजर्व बैंक के कामकाज में सरकार के दखल का मामला उठाया. डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य की उस स्पीच को लेकर गवर्नर उर्जित पटेल की भी सहमति थी.

विरल आचार्य ने अपने बयान में कहा था कि वह इस मुद्दे पर चर्चा गवर्नर उर्जित पटेल की ‘सलाह’ के बाद ही कर रहे हैं. विरल आचार्य ने उस भाषण में अर्जेंटीना का उदाहरण दिया था कि किस तरह से वहां की सरकार ने सेंट्रल बैंक के काम में दखल दिया जिससे अजेंटीना की अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा असर पड़ा.

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यह बात मोदी सरकार को नागवार गुजरी और अन्ततः आरबीआइ के गवर्नर उर्जित पटेल को जाना पड़ा उसके बाद यस मैन शक्तिकांत दास की नियुक्ति की गयी.

कहा तो यह भी जा रहा था कि उर्जित पटेल के साथ ही गवर्नर विरल आचार्य इस्तीफा दे सकते हैं, लेकिन यदि उस वक्त वह भी इस्तीफा दे देते तो दुनिया भर में भारत की आर्थिक स्थिति के प्रति और भी खराब संकेत जाते.

लेकिन विरल आचार्य को तो आखिरकार जाना ही था वह रीढ़ की हड्डी वाले व्यक्ति थे, जिन्हें मोदी सरकार में बिल्कुल पसंद नहीं किया जाता.

अंत मे आप विरल आचार्य के उस मशहूर भाषण की कुछ लाइनें पढ़ लीजिए- ”जो सरकारें केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती हैं, वहां के बाजार तत्काल या बाद में भारी संकट में फंस जाते हैं. अर्थव्यवस्था सुलगने लगती है और अहम संस्थाओं की भूमिका खोखली हो जाती है.”

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं और ये उनकी निजी राय है.)

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