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आरबीआई विवाद : मोदी सरकार नेहरू के पत्र से विपक्ष के हमलों की धार कुंद करेगी

नेहरू ने जनवरी 1957 में लिखा, आरबीआई का काम सरकार को सलाह देना है, लेकिन उसे सरकार की लाइन पर ही रहना है.

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NewDelhi : मोदी सरकार पर आरबीआई के अधिकारों में दखल देने और उस पर कब्जा करने का आरोप लगातार विपक्ष खास कर कांग्रेस द्वारा लगाया जा रहा है. आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफा देने की आशंकाओं, केंद्रीय बैंक और सरकार के बीच तनातनी की खबरों के बीच विपक्षी पार्टी कांग्रेस लगातार हमलावर होती जा रही है. खबरों के अनुसार आरबीआई को लेकर किये जा रहे विपक्ष के हमलों की धार कुंद करने के लिए सरकार देश के पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू के एक पत्र का इस्तेमाल कर सकती है. हाल ही में यह खबर चर्चा में थी कि केंद्र ने आरबीआई को निर्देश देने के लिए आरबीआई ऐक्ट के उस सेक्शन 7 का इस्तेमाल किया, जिसका आजादी के बाद से आज तक कभी भी किसी सरकार ने इस्तेमाल नहीं किया.  द टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार  नेहरू और सर बेनेगल रामराव के बीच हुए पत्राचार को इस हमले का आधार बनाया जा सकता है.

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 रामाराव ने जनवरी 1957 में नेहरू से मतभेद के बाद आरबीआई गवर्नर के पद से इस्तीफा दिया था

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रामाराव ने नेहरू से मतभेद के बाद आरबीआई गवर्नर के पद से इस्तीफा दे दिया था.  राव आरबीआई के चौथे गवर्नर थे, जिन्होंने साढ़े सात साल के कार्यकाल के बाद जनवरी 1957 में इस्तीफा दे दिया था.  खबरों के अनुसार विवाद बजट के एक प्रस्ताव को लेकर था.  उस विवाद में नेहरू ने वित्त मंत्री टीटी कृष्णनमाचारी का पक्ष लिया था और साफ किया था कि आरबीआई सरकार की ही विभिन्न गतिविधियों का हिस्सा है.  द टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार नेहरू ने जनवरी 1957 में लिखा, आरबीआई का काम सरकार को सलाह देना है, लेकिन उसे सरकार की लाइन पर ही रहना है.  नेहरू ने यह भी सुझाव दिया था कि अगर राव चाहे तो इस्तीफा दे सकते हैं.  इसके कुछ दिन बाद राव ने इस्तीफा दे दिया था.

राव ने तत्कालीन वित्त मंत्री के बर्ताव को रुखा बताया था.  जबकि वित्त मंत्री ने आरबीआई को वित्त मंत्रालय का  एक हिस्सा बताया था. जवाहर लाल नेहरू का मानना था कि अगर आरबीआई  किसी और नीति का पालन करता है तो बेहद बकवास बात होगी,  क्योंकि वह सरकार के लक्ष्यों या तरीकों से सहमत नहीं नजर आयेगी.

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