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रांची में 1948 में पहली बार दशहरे पर हुआ था रावण दहन

Sandeep Nagpal

रांची में रावण दहन की शुरुआत 1948 में की गई. आज से 67 वर्ष पूर्व आयोजकों ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक छोटा सा आयोजन आज रांची के लोगों के बीच एक विशाल आयोजन का रूप ले लेगा. पश्चिमी पाकिस्तान नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर के कबायली इलाके बन्नु शहर से रिफ्यूजी बन कर रांची पधारे 10-12 परिवारों ने रावण दहन के रूप में अपना सबसे बड़ा पर्व दशहरा मनाया. एक कसक थी स्व. लाला खिलंदा राम भाटिया को जो बन्नुवाल रिफ्यूजियों के मुखिया थे. तब के डिग्री कालेज (बाद में रांची कॉलेज, मेन रोड डाक घर के सामने) के प्रांगण में 12 फीट के रावण का निर्माण स्व. लाला मनोहर लाल नागपाल, स्व. कृष्ण लाल नागपाल, स्व.अमिर चन्द सतीजा, स्व.टहल राम मिनोचा तथा शादीराम भाटिया एवम् स्व. किशन लाल शर्मा के हाथों किया गया.

दुर्गा पूजा की तरह मनाया जाता था दशहरा

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रांची में दशहरा दुर्गा पूजा की तरह मनाया जाता था.  पहली बार आस पास के लोगों ने रावण दहन देखा. रावण दहन के दिन गाजे बाजे पंजाबी तथा कबायली ढोल नगाड़े के बीच तीन-चार सौ लोगों के बीच शाम को रावण में अग्नि प्रज्जवलित की गई. यहां एक बात बताना आवश्यक होगा कि रांची और पंजाब के तमाम शहरों में रावण का मुखौटा गधे का होता था पर 1953 के बाद रावण के पुतले का मेन मुखौटा मानव मुख का बनने लगा.

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वर्ष 1949 तक रावण के पुतले का निर्माण डिग्री कॉलेज में हुआ

वर्ष 1949 तक रावण के पुतले का निर्माण मेन रोड स्थित डिग्री कालेज के बरामदे में हुआ. बन्नू वाले समाज ने तब निर्णय लिया कि रावण बनाने में जगह छोटी पड़ती है. पुतले की लम्बाई 12 से 20 फीट कर दी गई. उधर 1950 से 1955 तक रावण के पुतले का निर्माण रेलवे स्टेशन स्थित खजुरिया तलाब के पास रेस्ट कैमरा (रिफ्यूजी कैंप) में होने लगा. रावण के पुतले की लम्बाई अब 25 से 35 फीट पहुंच गई. निर्माण का सारा खर्च स्व. मनोहर लाल, स्व. टेहल राम मिनोचा तथा स्व. अमीर चंद सतीजा के द्वारा किया गया. इस बीच लाला खलिदा राम भाटिया का निधन हो गया था. मेरे पिताजी स्व. अशोक नागपाल का शौक था, तब उन्हें भी रावण के ढांचे पर लेई लगाकर पुराने अखबार साटने का काम सौंपा गया.

10-12 वर्षों अपने हाथों रावण का पुतला बनाते रहे अशोक नागपाल

यह बताना जरूरी है कि लगभग 10-12 वर्षों तक स्व. अशोक नागपाल खुद अपने हाथों से रावण के पुतले का निर्माण किया करते थे. 1950 से लेकर 1955 तक रावण के पुतले का दहन बारी पार्क (शिफटन पेविलियन टाउन हॉल) में होने लगा. ऐसा भीड़ बढ़ने के कारण किया गया. यहां भीड़ 25 से 40 हजार तक होती थी. रंगारंग नाच-गान तथा रावण के मुखौटे की पूजा कर रावण दहन होता था.

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पंजाबी हिन्दू बिरादरी ने संभाली थी रावण दहन की जिम्मेवारी

इधर, साल दर साल रावण दहन का खर्च बढ़ता गया तथा बन्नू समाज ने इस आयोजन की कमान पंजाबी हिन्दु बिरादरी को सौंप दी. रांची बढ़ती गई. दुर्गा पूजा की तरह रावण दहन का क्रेज भी बढ़ गया. पंजाबी हिन्दु बिरादरी के लाला देशराज, लाला कश्मीरी लाल, लाला के.एल.खन्ना, लाला धीमान, लाला राधाकृष्ण विरमानी, भगवान दास आनन्द, रामस्वरूप शर्मा, मेहता मदन लाल ने जब पंजाबी हिन्दु बिरादरी की कमान संभाली तो ये लोग रावण का निर्माण डोरंडा राम मंदिर में करवाने लगे तथा रावण दहन हेतु राजभवन के सामने वाले मैदान (नक्षत्र वन)  में लगातार 2 वर्षों तक किया.

 1960 में मोरहाबादी में शुरू हुआ रावण दहन

समय के साथ भीड़ बढ़ने के कारण आयोजकों ने रावण दहन का कार्यक्रम मोरहाबादी में करना उपयुक्त समझा जो 1960 से आजतक यही हो रहा है. पंजाबी हिन्दु बिरादरी के आयोजकों ने मेघनाथ तथा कुंभकर्ण के पुतले का भी निर्माण करवाया जो आज तक जारी है.

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