LITERATURE

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

मशहूर शायर अहमद फ़राज़ के जन्मदिन पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : गजल गायकी की दुनिया में मेहदी हसन सबसे चमकदार सितारों में शुमार हैं. उनकी सबसे मशहूर गजलों में रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ शामिल है. यह बेहतरीन गजल जिस शायर की कलम का कमाल है उनका नाम अहमद है फ़राज़.

यह गजल बहुत ही भावप्रवण है जब आप इसे सुनते हैं तो मेहदी हसन की पुरनूर आवाज और अहमद फराज के शब्दों की जादूगरी के मुरीद हुए बिना नहीं रह सकेंगे. इस पूरी गजल का आनंद लिजिये.

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत[ का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

पहले से मरासिम[2] न सही, फिर भी कभी तो
रस्मों-रहे[3] दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिरिया[4] से भी महरूम[5]
ऐ राहत-ए-जां मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम[ को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आखिरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ

अहमद फ़राज़ का जन्म 12 जनवरी, 1931 को हुआ था. उनका बचपन का नाम सैयद अहमद शाह था. उनको बीसवीं सदी के महान उर्दू कवियों में गिना जाता है. फ़राज़ उनका तखल्लुस था. उन्होंने पेशावर यूनिवर्सिटी से फ़ारसी और उर्दू की पढ़ाई की और बाद में वहीं लेक्चरर की नौकरी करने लगे.

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सरकार का किया विरोध, गिरफ्तार हुए, छह साल देश से बाहर रहना पड़ा

अहमद फराज लोकतांत्रिक मूल्यों के समर्थक थे. उन्हें पाकिस्तान की सैनिक हुकूमत ने सरकार के ख़िलाफ़ बोलने पर गिरफ़्तार किया. पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया उल हक के शासन के दौरान ये छह साल देश के बाहर रहे विदेशों में रहे. उन्होंने हमेशा ही बेइन्साफ़ी विरुद्ध आवाज़ उठाई .

ग़ज़ल और नज़्म संग्रह

अहमद फराज के ग़ज़ल और नज़्मों के कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं. इनमें दर्द आशोब, पस अन्दाज़-ए-मौसम, शहर-ए-सुख़न अरासता है (कुलीयात), चांद और मैं, नयाफ़त, शब-ए-ख़ूं, तन्हा तन्हा, बे आवाज़ गली कूचों में, जानां जानां, नाबीना शहर में आईना, सब आवाज़ें मेरी हैं, ये मेरी ग़ज़लें वे मेरी नज़्में, ख़ानाबदोश और ज़िंदगी ! ऐ ज़िंदगी !

हिलाल-ए-इम्तियाज़ पुरस्कार वापस किया

अहमद फ़राज़ ने रेडियो पाकिस्तान में भी नौकरी की. वे 1976 में पाकिस्तान एकेडमी ऑफ लेटर्स के डायरेक्टर जनरल और फिर उसी एकेडमी के चेयरमैन भी बने. 2004 में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें हिलाल-ए-इम्तियाज़ पुरस्कार दिया था. लेकिन 2006 में उन्होंने यह पुरस्कार इसलिए वापस कर दिया कि वे सरकार की नीति से सहमत और संतुष्ट नहीं थे.

अहमद फराज की शायरी का कमाल

उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ

ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़
ऐ मर्ग-ए-नागहाँ तेरा आना बहुत हुआ

हम ख़ुल्द से निकल तो गये हैं पर ऐ ख़ुदा
इतने से वाक़ये का फ़साना बहुत हुआ

अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी
उससे ज़रा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ

अब क्यों न ज़िन्दगी पे मुहब्बत को वार दें
इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ

अब तक तो दिल का दिल से तार्रुफ़ न हो सका
माना कि उससे मिलना मिलाना बहुत हुआ

क्या-क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल
ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ

कहता था नासेहों से मेरे मुँह न आईओ
फिर क्या था एक हू का बहाना बहुत हुआ

लो फिर तेरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र
अहद “फ़राज़” तुझसे कहा ना बहुत हुआ।

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम
ये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम

सहरा-ए-ज़िंदगी में कोई दूसरा न था
सुनते रहे हैं आप ही अपनी सदाएँ हम

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम

तू इतनी दिल-ज़दा तो न थी ऐ शब-ए-फ़िराक़
आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाएँ हम

वो लोग अब कहाँ हैं जो कहते थे कल ‘फ़राज़’
हे हे ख़ुदा-न-कर्दा तुझे भी रुलाएँ हम

उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना
ऐ मिरी जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे

हम को अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा
कोई तुझ सा हो तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे

दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है
जो किसी और का होने दे न अपना रक्खे

कम नहीं तम-ए-इबादत भी तो हिर्स-ए-ज़र से
फ़क़्र तो वो है कि जो दीन न दुनिया रक्खे

दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है
और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता

पागल हुए जाते हो ‘फ़राज़’ उस से मिले क्या
इतनी सी ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता

आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं
जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं।

इस से पहले कि बेवफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ

लोकप्रियता के शिखर पर

अहमद फ़राज़ तक आते-आते उर्दू ग़ज़ल ने बहुत से उतार-चढ़ाव देखे और जब फ़राज़ ने अपने कलाम के साथ सामने आए, तो लोगों को उनसे उम्मीदें बढ़ीं. ख़ुशी यह कि ‘फ़राज़’ ने मायूस नहीं किया. अपनी विशेष शैली और शब्दावली के साँचे में ढाल कर जो ग़ज़ल उन्होंने पेश की वह जनता की धड़कन बन गयी.

मुशायरों में अहमद फ़राज़ ने कम समय में वह ख्याति अर्जित कर ली जो बहुत कम शायरों को नसीब होती है. इक़बाल के बाद पूरी बीसवीं शताब्दी में केवल फ़ैज और फ़िराक का नाम आता है जिन्हें शोहरत की बुलन्दियाँ नसीब रहीं, बाकी कोई शायर अहमद फ़राज़ जैसी शोहरत हासिल करने में कामयाब नहीं हो पाया. उसकी शायरी जितनी ख़ूबसूरत है, उनके व्यक्तित्व भी उतना ही आकर्षक था. 25 अगस्त 2008 को फराज का निधन हुआ था.

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