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अपने हौसले से ग्रामीण महिलाओं को सबल बना रही रंगोवती

महिलाओं को साक्षर के साथ बना रही आत्मनिर्भर

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Chhaya

Ranchi: लज्जा, दहलीज, कर्तव्य आदि शब्दों के भार से दबी महिला के लिए मुश्किल होता है घर के बाहर निकल समाज में खुद की पहचान बनाना. विशेषकर ग्रामीण महिलाओं के लिए तो ये और भी मुश्किल है, कि वो घर-परिवार की जिम्मेवारी से खुद को बाहर निकालें. क्योंकि ना तो इनको अपने अधिकारों की जानकारी होती है और न ही अमूमन ये शिक्षित होती हैं. ऐसी ही ग्रामीण महिलाओं को शिक्षित करने का बीड़ा महेशपुर गांव निवासी 45 वर्षीय रंगोवती देवी ने उठाया है. राजधानी से सटे राहे प्रखंड अंतर्गत जनवादी महिला समिति के नाम से ये समूह चलातीं है. जिसके जरिये ये राहे प्रखंड अंतर्गत आने वाले गांवों की महिलाओं को शिक्षित कर रही है. ये न सिर्फ इन ग्रामीण महिलाओं को शिक्षित करती हैं, बल्कि ये महिलाओं को जीवन जीने के तरीके भी बताती हैं.

18 गांव की महिलाएं हैं जुड़ी

उन्होंने बताया कि समिति की शुरूआत 1998 में राहे प्रखंड अंतर्गत महेशपुर गांव से की. तब ये सिर्फ अपने गांव की अनपढ़ महिलाओं को ही शिक्षित करती थी. धीरे-धीरे इनकी चर्चा आस-पास के गांवों में होने लगी, जिससे और महिलाएं भी इनसे जुड़ने लगी और समिति से महिलाएं जुड़ती गयी. उन्होंने बताया कि अब 18 गांव की करीब हजारों महिलाएं इनसे जुड़ी हैं. जिनमें कुछ युवतियां भी है, जो अपने दैनिक कार्य निबटा कर समिति में एकजुट होती है.

साक्षर के साथ बनाया आत्मनिर्भर

खुद दसवीं पास रंगोवती ने महिलाओं को न सिर्फ साक्षर बनाया, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भरता के गुण भी सिखायें. इन्होंने बताया कि सिर्फ किताबी ज्ञान से महिलाएं शिक्षित और सबल नहीं हो सकती, इसके लिये व्यवहारिक ज्ञान भी जरूरी है. ऐसे में महिलाओं को थाना, पंचायत आदि में आवेदन देने के साथ विषम परिस्थितियों का डट कर सामना करने, किसी के सामने भी खुलकर बात करने, सवाल-जवाब करने की भी जानकारी ये देती हैं. जिससे कई महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार आया है.

बात करने में हिचकती थी महिलाएं

अपने शुरूआती दिनों के बारे में बताते हुए रंगोवती ने बताया कि जब इन्होंने समिति की शुरूआत की, तब महिलाएं इनके पास आती थी, लेकिन बात करने से हिचकती थी. एक महिला, दूसरी के समाने ही अपना नाम तक लेने से डरती थी. ऐसे में कुछ दिनों तक महिलाओं को समझाने के बाद इनमें बदलाव आया और धीरे-धीरे करके पढ़ने भी लगी.

महिला मुद्दों में सक्रिय

न सिर्फ महिलाओं को साक्षर और आत्मनिर्भर बल्कि ये अधिकारों के प्रति भी महिलाओं को जागरूक करती हैं. उन्होंने बताया कि किसी भी गांव में रेप, घरेलू हिंसा या अन्य कोई महिला से संबधित मामले होने पर थाना से पहले महिलाएं रंगोवती के पास पहुंचती हैं. इतना ही नहीं, स्थानीय प्रशासन की गलती होने पर महिलाएं उनसे निबटने से भी पीछे नहीं रहती.

कई गांवों में दिखता है प्रभाव

रंगोवती के 20-22 सालों का प्रभाव प्रखंड के विभिन्न गांवों में देखा जा सकता है. जिसमें सबसे अधिक प्रभाव आदिवासी बहुलता वाले गांव नुरू में देखा जाता है. उन्होंने बताया कि नुरू की महिलाएं सबसे अधिक जागरूक है. इसके साथ ही ईचाहातू, बुरूडीह, सिरिडीह में इनका प्रभाव देखा जाता है.

समिति का मतलब आर्थिक मदद नहीं

रंगोवती ने बताया कि अन्य महिला समिति पैसे से संबधित काम ही करती है. इन समूहों में महिलाओं की भागीदारी अधिक होती है, लेकिन इनमें महिलाओं के हित की बात नहीं की जाती. ऐसे में जरूरत थी कि महिलाओं के लिये कुछ अलग किया जाये. उन्होंने बताया कि शादी के बाद कई बार ऐसा लगा कि महिलाओं के लिये कुछ अलग करना चाहिये, ऐसे में महिलाओं को शिक्षित करने से अच्छी कोई और तरकीब नहीं सूझी.

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