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रांची जलापूर्ति योजना : 397 करोड़ खर्च हुए, फिर भी योजना के लाभ से महरूम हैं रांचीवासी

महालेखाकार की रिपोर्ट में हुआ खुलासा, संवेदक की लापरवाही से लटका मामला

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Ranchi : नगर विकास विभाग की रांची शहरी जलापूर्ति योजना अधर में लटकती दिख रही है. योजना में करोड़ों रुपये खर्च कर दिये गये, लेकिन योजना से जुड़े ठेकेदारों की लापरवाही के कारण कार्य अब तक पूरा नहीं किया जा सका है. महालेखाकार (लेखापरीक्षक) की रिपोर्ट को देखा जाये, तो जलापूर्ति योजना का कार्य अक्टूबर 2014 तक दो ठेकेदारों को दिया गया, लेकिन उनकी लापरवाही के कारण योजना पूरी नहीं हो सकी. कैग की यह रिपोर्ट वित्तीय वर्ष 2015-2016 पर है. रिपोर्ट के मुताबिक जलापूर्ति परियोजना के लिए मार्च 2010 को 234.71 करोड़ की लागत से पेयजल विभाग ने एक संवेदक के साथ एग्रीमेंट किया था. संवेदक को करीब 106.63 करोड़ रुपये का भुगतान भी कर दिया गया. बाद में उक्त काम की धीमी प्रगति को देख अक्टूबर 2014 में नये संवेदक के साथ करीब 294.44 करोड़ में विभाग ने योजना पर समझौता किया. फिर भी कार्य पूरा नहीं किया जा सका. तब विभाग के संयुक्त सचिव ने भी योजना की धीमी गति पर नाराजगी जताते हुए कार्रवाई करने का भी भरोसा दिया था. पहले संवेदक की लापरवाही पर तत्कालीन राज्यपाल सैयद अहमद ने भी योजना की गति पर आपत्ति जतायी थी. इसी लापरवाही के कारण पेयजल आपूर्ति से जुड़ी सरकार की घोषणा और वादे जमीन पर नहीं उतरे औप राज्य की बड़ी आबादी को अपनी पेयजल की जरूरत पूरी करने के लिए बोरिंग और परंपरागत जलस्रोतों पर ही आश्रित होना पड़ रहा है.

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करोड़ खर्च बाद भी योजना नहीं हो सकी हैं पूरी

पेयजल विभाग द्वारा जेएनएनआरयूएम योजना के तहत रांची में जलापूर्ति योजना को पूरा किया जाना था. योजना को पूरा करने के लिए करीब 243.71 करोड़ की लागत से मार्च 2010 में आईवीआरसीएल कंपनी के साथ विभाग ने एक समझौता किया. योजना को अगस्त 2012 तक पूरा किया जाना था. योजना पर 106.63 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी काम की प्रगति धीमी ही रही. इसपर जुलाई 2013 में कंपनी के साथ संविदा समाप्त कर दी गयी. पुनः अक्टूबर 2014 में 290.44 करोड़ रुपये के अनुबंध से नयी कंपनी के साथ एक समझौता किया गया. समझौता के तहत कार्य दो साल के अंदर किया जाना था. इसके बावजूद फरवरी 2017 तक कार्य पूरा नहीं किया जा सका.

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तत्कालीन राज्यपाल ने मांगा था स्पष्टीकरण, अब संयुक्त सचिव ने दिलाया भरोसा

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राज्य में सितंबर 2011 से मई 2015 तक राज्यपाल रहे सैयद अहमद ने भी रांची जलापूर्ति योजना की धीमी गति पर नाराजगी जतायी थी. उन्होंने पहले संवदेक आईवीआरसीएल कंपनी की कार्यशैली पर सवाल खड़ा कर तत्कालीन पेयजल विभाग के प्रमुख एस नारायण से स्पष्टीकरण मांगा था. इस पर अभियंता ने स्वयं कहा था कि संवेदक ने कई बार एक्शन प्लान बनाकर दिया, लेकिन उसके अनुरूप काम नहीं किया. उन्होंने उस समय मामले पर कार्रवाई करने का भरोसा दिलाया था. अब कैग की रिपोर्ट में दूसरे संवदेक द्वारा कार्य नहीं किये जाने पर नगर विकास विभाग के संयुक्त सचिव ने भी कार्रवाई करने का भरोसा दिलाया है.

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बतायी गयी अनियमितताओं की वजह

ऐसा नहीं है कि कैग की रिपोर्ट में केवल करोड़ों की राशि खर्च करने की ही चर्चा की गयी है, बल्कि इसमें यह भी बताया गया कि कैसे विभाग की लापरवाही के कारण योजना आज तक अधर में लटकी हुई है, जो इस प्रकार हैं-

  • पहले के संवेदक ने दिसंबर 2012 से मई 2013 तक की अवधि में करीब 4.71 करोड़ रुपये की लागत से खरीदे गये विद्युत यंत्र (22 ट्रांसफॉर्मर, 3 क्रेन, 11 सॉफ्ट स्टार्टर) बेकार हो गये. बाद के संवेदक ने भी उपरोक्त यंत्रों में से करीब 29.87 लाख रुपये से खरीदे गये पांच स्टार्टर को दोषपूर्ण पाये जाने की बात कही थी.
  • केंद्रीय सतर्कता आयोग के निर्देशानुसार योजना के चालू रहने के दौरान ही योजना राशि के अग्रिम भुगतान पर ब्याज देने की बात कही गयी थी. कारण यह था कि संवेदक को उक्त राशि का अनुचित लाभ नहीं मिल सके. इसके उलट पेयजल विभाग द्वारा संवेदक को 29.04 करोड़ रुपये का अनियमित भुगतान कर दिया गया.
  • जलापूर्ति कार्य को लेकर राजधानी स्थित ललगुटवा के पास एक अंडर ग्राउंड रिजरवॉयर (यूजीआर) निर्माण किया जाना था. यूजीआर पर करीब 28.66 लाख रुपये खर्च कर दिये गये. बाद में स्थानीय रैयत द्वारा निर्माण स्थल का स्वयं की भूमि होने के दावा किया गया. ऐसे में जब जिला भूमि अधिग्रहण अधिकारी द्वारा रैयत की मांग पर करीब 27.34 करोड़ क्षतिपूर्ति राशि देने का निर्देश दिया गया, तो विभाग ने कहा कि योजना को सिमलिया स्थानातंरित करने का प्लान नहीं है. हालांकि, बाद में यूजीआर निर्माण कार्य योजना को विभाग द्वारा त्याग दिया गया. इस तरह यूजीआर निर्माण कार्य में लगे उक्त 28.66 लाख रुपये पूरी तरह से बर्बाद हो गये.

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