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बेरोजगारी के भयावह आंकड़ों पर रांची के प्रमुख अखबारों का नजरिया

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FAISAL ANURAG

मीडिया की सूचना देने की स्वतंत्रता लोकतंत्र की ताकत है. मीडिया सूचना देने में जितना सजग और स्वतंत्र होगा लोकतंत्र में विमर्श उतना ही सार्थक होगा. मीडिया को देखने और समझने में यह नजरिया बेहद जरूरी है. नेशनल सेंपल सर्वेक्षण संगठन एनएसएसओ के दो प्रमुख लोगों के इस्तीफे और बिजनेस स्टेंर्ड की एक रिपोर्ट ने पूरी भारत सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया है. एनएसएसओ के दो प्रमुख अधिकारियों ने यह कहते हुए इस्तीफा दिया कि भारत सरकार बेरोजगारी के आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं कर रही है. अब तक नरेंद्र मोदी सहित सरकार के अनेक लोग कहते रहे हैं कि बेरोजगारी के बारे में आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. इन दो व्यक्तियों ने सरकार के इस दावे की पोल यह कह कर खोल दी है कि सरीकार उन आंकड़ों को छुपा रही है, जिसे एनएसएसआ ने तैयार किया है. इसी संदर्भ में बिजनेस स्टेंर्ड ने यह रिपोर्ट प्रकाशित कर तहलका मचा दिया कि देश में बेरोजगारी विस्फोटक स्थिति में आ है. 2017-18 में बेरोजगारी भयावाह आंकडों को छू रही है. यह आंकड़ा  पिछले 45 सालों में  सबसे बड़ा है. इससे बेरोजगारी दर 6 प्रकतिशत हो गयी है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यह आंकड़ा 1972-73 से अब तक इतना कभी नहीं रहा. 2011-12 में बेरोजगारी दर 2.2 प्रतिशत ही थी. इस रिपोर्ट के बाद सरकार के अब तक के रोजगार संबंधी दावे संदेह में हैं. सरकार गैर सरकारी क्षेत्र और व्यापार में रोजगार देने के दावे करती रही है. इस रिपोर्ट के अनुसार 2017- 18 के आंकड़े कुछ और ही कह रहे हैं. इस रिपोर्ट के बाद सरकार की अनेक संस्थाएं बचाव की मुद्रा में आ गयी हैं. सरकार का बचाव करने नीति आयोग मैदान में उतरा. आनन-फानन में उसने कहा कि बेरोगारी संबंधी आंकड़ों को अब तक फाइनल रूप दिया ही नहीं गया है.

यह खबर बहुत बड़ी है और इससे देश के विकास की गति का भी पता चलता है. इसे अखबारों में किस तरह लिया गया है इसे देखना दिलचस्प है. आज के अखबारों को देखते हुए यह आम धारणा बनती है की मीडिया ने बेरोजगारी संबंधी आंकड़ों के मामले में सरकार का बचाव किया है. और यह भी साफ दिखता है कि मीडिया बेरोजगारी के आंकड़ों के दर्द को कम कर सूचना प्रकाशित कर रहा है. मीडिया की यह भूमिका सिर्फ एक ही मामले में नहीं रही है. इसकी एक निरंतरता पिछले अनेक सालों से देखी जा सकती है और यह सूचना पाने के पाठकों के अधिकार का हनन जैसा है.

हिंदुस्तान के रांची संस्करण ने अंतरिम बजट के पूर्व बेरोजगारी के आंकड़ों पर विवाद शीर्षक से लीड खबर छापी है. अखबार लिखता है, अंतरिम बजट से एक दिन पूर्व गुरुवार को रोजगार के आंकड़ों  पर विवाद हो गया. सुबह एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि बेरोजगारी दर 45 साल में सबसे ज्यादा बढ़ गयी है. इस खबर में, इसके बाद यह अखबार विस्तार से नीति आयोग के प्रेस कांफ्रेंस की चर्चा करता है. इसके बाद अखबार लिखता है कि कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने मीडिया रिपोर्ट पर ट्वीट कर कहा है कि सरकार रोजगार देने में नाकाम रही है. अखबार ने इसका खंडन भी इसी रिपोर्ट में भाजपा के ट्वीट के उल्लेख से किया है.

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दैनिक भस्कर के रांची संस्करण ने पहले पन्ने पर 45 साल में नोटबंदी के बाद देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी शीर्षक से इस खबर को प्रमुखता दी है. इस अखबार ने खबर के स्लग में लिखा, एनएसएसओ की रिपोर्ट जारी होने के पहले अखबार ने छापी, सरकार पर रिपोर्ट दबाने का आरोप लगा सांख्यिकी आयोग के दो सदस्यों ने इस्तीफा दिया. एक उप शीर्षक में इस अखबार ने लिखा नीति आयोग ने खारिज किया कहा- यह ड्राफ्ट रिपोर्ट, फाइनल मार्च में. तीन बाक्स भी अखबबार ने बनाये हैं. पहले बाक्स का शीर्षक है, रिपोर्ट महत्वपूर्ण क्योंकि यह नोटबंदी के बाद का पहले आधिकारिक सर्वेक्षण. दूसरे बाक्स शहरों में हालात गंभीर ग्रामीण क्षेत्रों में 5.3 प्रतिशत, तो शहरी क्षेत्र में 7.8 प्रतिशत बेरोजगारी दर. दूसरे बाक्स में हिटलर बनाम मुसोलोनी उप शीर्षक से राजनीतिक प्रतिक्रिया है. दैनिक जागरण के रांची संस्करण पेज 13 पर दो कालम में राहुल ने बेरोजगारी दर में पीएम को घेरा के शीर्षक से खबर छपी है. इस अखबार ने खबर की उपेक्षा कर दी है.

रांची से प्रकाशित प्रभात खबर ने इस समाचार को पेज 15 पर छापा है. शीर्षक है 6.1 फीसदी के साथ 2.017-18 में 45 साल में सर्वाधिक बेरोजगारी. इस अखबार ने इस खबर के महत्व और फोकस को नजरअंदाज करने का प्रयास किया है.

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