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झारखंडी संस्कृति को बचाने की कोशिश में रामसेवक, टसीचारी और घोराठी जैसी शहनाई बनाने में माहिर

आदिवासी अनुष्ठानों में इन शहनाईयों का होता है उपयोग, उरांव जनजाति के बीच है अधिक प्रचलित

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Ranchi: आदिवासी लोक संगीतों में शहनाई की अपनी अलग पहचान है. भले ही आज के रॉक और रैप के बीच शहनाई की पहचान धूमिल हो रही हो. लेकिन कुछ लोग आज भी इसे बचाने के लिए कार्यरत है.

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पेशे से किसान रामसेवक शहनाई बनाने में माहिर

लापुंग प्रखंड के सकरपुर गांव निवासी रामसेवक लोहरा भी कुछ ऐसा ही कर रहे है. पेशे से तो ये किसान हैं. लेकिन अपने खाली समय में ये टसीचारी और घोराठी जैसे शहनाई बनाते हैं. पुश्तैनी काम होने के कारण भी रामसेवक शहनाई बनाना कभी छोड़ना नहीं चाहते.

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इन शहनाईयों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि पहले लोग इन वाद्य यंत्रों से ही शाम का समय बिताते थे. लेकिन जैसे-जैसे जीवन में आधुनिकता आती गई. लोग इन यंत्रों से दूर होते गए.

उन्होंने बताया कि झारखंड में दो तरह की शहनाई पहले काफी प्रचलित थी. जिनका नाम टसीचारी और घोराठी है. जो अब सिर्फ म्यूजियम में पायी जाती है.

आधुनिक गीतों में घोराठी का होता है इस्तेमाल

रामसेवक ने बताया कि ये शहनाई आकार में थोड़ी छोटी होती है. जबकि शास्त्रीय संगीतों में इस्तेमाल होने वाली शहनाई थोड़ी बड़ी और मेटल की बनी होती है. बात अगर झारखंड के पारंपरिक शहनाई की करें तो ये बांस, पीतल और लकड़ी का इस्तेमाल करके बनायी जाती है.

घोराठी के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इससे निकलने वाली आवाज काफी मोटी होती है. जिसका इस्तेमाल आजकल आधुनिक गीतों में होता है.

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वहीं टसीचारी का इस्तेमाल पारंपरिक क्षेत्रीय गीतों तक ही सीमित है. क्योंकि इससे निकलने वाली आवाज काफी पतली होती है.

अनुष्ठानों में मानते हैं शुद्ध

पूजा-पाठ या शादी-विवाह जैसे अनुष्ठानों में शहनाई बजाने को आदिवासी समाज काफी पवित्र मानता है. इन अनुष्ठानों में इनको बजाने से घर परिवार की शुद्धी होती है.

इसकी जानकारी देते हुए रामसेवक ने बताया कि न सिर्फ घर-परिवार बल्कि ऐसी मान्यताएं है कि पूर्वजों की आत्मा को भी शांति मिलती है. उन्होंने बताया कि सरहुल समेत अन्य अनुष्ठानों में इसका अधिक इस्तेमाल किया जाता है.

वहीं उन्होंने कहा कि सुदूर गांवों में अब भी लोग छोटे-छोटे उत्सवों में भी शहनाई बजाते हैं.

प्रचार-प्रसार में है कमी

लुप्त होती शहनाई परंपरा पर उन्होंने कहा कि सरकार म्यूजियम में तो इनको रखना चाहती है, लेकिन इसके प्रचार-प्रसार पर ध्यान नहीं देती. जबकि इन्हें बनाने वाले अब किन विषम परिस्थितियों में रहते हैं, इस ओर भी सरकार ध्यान नहीं देती.

उन्होंने कहा कि शहनाई की तो पूछ अब रही नहीं, ऐसे में खेती बारी से ही गुजारा होता है. बहुत मुश्किल से शहनाई की लागत ही मिल पाती है. ऐसे में इसके भरोसे रहना ठीक नहीं है.

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