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राज्यसभा चुनाव 2022 : राजनीतिक पंडितों की भविष्यवाणी पर भारी पड़ी सरयू की तैयारी, महुआ के आगे कांग्रेस बेचारी

Anand Kumar
झारखंड में 10 जून को राज्यसभा की दो सीटों के लिए होनेवाले मतदान के लिए सत्तारूढ़ यूपीए और विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों की घोषणा हो चुकी है. इन चुनावों के लिए भाजपा और सत्तारूढ़ यूपीए की ओर से उम्मीदवारों को लेकर ज्यादातर राजनीतिक पंडितों की भविष्यवाणी गलत साबित हुई और प्रत्याशियों के नाम पर अधिकांश लोगों को हैरानी हुई. ज्यादातर अनुमानों में भाजपा की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास को उम्मीदवार बनाये जाने की बात कही जा रही थी, लेकिन टिकट लेने में सफल रहे प्रदेश भाजपा के महामंत्री आदित्य साहू. इधर सत्तारूढ़ यूपीए की ओर से कांग्रेस कोटे को सीट दिये जाने की जबर्दस्त चर्चा थी.

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सोनिया गांधी से मुलाकात कर दिल्ली से लौटने के बाद तो दावे किये जाने लगे थे कि यह सीट कांग्रेस के खाते में गयी है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर के ट्विटर हैंडल से “आ रही है कांग्रेस” का पोस्ट होने के बाद तो पक्का ही मान लिया गया था कि अब राज्यसभा कांग्रेस का कोई उम्मीदवार ही जायेगा. हालांकि इसके पहले झामुमो खेमे से कुछ नामों की चर्चा की जा रही थी, जिसमें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन, झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य के नाम सबसे आगे थे, लेकिन आखिर में बाजी महुआ माजी के हाथ लगी, जो पिछले विधानसभा चुनाव में रांची सीट से बहुत कम अंतर से हार गयी थीं.

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महुआ माजी कई पुरस्कारों से सम्मानित जानीमानी साहित्यकार हैं और झारखंड महिला आयोग की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं. महुआ के नाम की घोषणा से कांग्रेस को गहरा झटका लगा है, जो इस रोटेशन के आधार पर इस बार राज्यसभा टिकट की दावेदारी कर रही थी कि पिछली बार गुरुजी यानी शिबू सोरेन राज्यसभा गये थे, तो इस बार उसे मौका मिलना चाहिए. लेकिन हेमंत सोरेन कांग्रेस आलाकमान से अपनी बात मनवाने में सफल रहे. अब प्रदेश के कांग्रेसी इस पर कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, यह देखनेवाली बात होगी.


दूसरी तरफ भाजपा ने रघुवर दास जैसे हैवीवेट उम्मीदवार पर आदित्य साहू को तरजीह दी. एक भाजपा सांसद ने सोमवार को बातचीत में कहा कि शनिवार रात तक दिल्ली में रघुवर दास का ही नाम चल रहा था. अगर यह सच है, तो इस चर्चा में दम है कि आजसू ने रघुवर के अरमानों पर पलीता लगा दिया. झारखंड विधानसभा के पिछले सत्र में पांच नेताओं ने झारखंड लोकतांत्रिक मोर्चा बनाया था. इनमें आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो, आजसू के ही दूसरे विधायक लंबोदर महतो, पूर्व मंत्री और जमशेदपुर पूर्वी के निर्दलीय विधायक सरयू राय, बरकट्ठा के निर्दलीय विधायक अमित यादव और हुसैनाबाद से एनसीपी विधायक और पूर्व मंत्री कमलेश सिंह शामिल थे. इस मोर्चा के गठन का उद्देश्य तो सदन के अंदर जनहित के मुद्दों को उठाने के लिए किया गया बताया गया था, लेकिन इसमें शामिल सभी विधायक अपने-अपने कारणों से रघुवर दास से खफा हैं. सरयू राय और अमित यादव पहले भाजपा में थे. वे अपना टिकट काटे जाने का जिम्मेदार रघुवर दास को मानते हैं. दूसरी तरफ आजसू रघुवर दास से पिछले चुनावों में सीटों के बंटवारे में उनके अड़ियल रवैये से नाराज है. ऐसे में सरयू राय की पहल पर बने झारखंड लोकतांत्रिक मोर्चा के गठन के दिन से ही कयास लगाये जा रहे थे कि यह रघुवर दास को राज्यसभा जाने से रोकने की तैयारी है.


यही कारण है कि रघुवर दास ने पिछले 10 दिनों में आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो से दो बार मुलाकात की. यही नहीं, सुदेश ने प्रत्याशी की घोषणा के पहले दिल्ली में भाजपा के बड़े नेताओं से मुलाकात भी की थी. समझा जाता है कि सुदेश महतो के रघुवर दास के नाम पर राजी नहीं होने के बाद आदित्य साहू को प्रत्याशी बनाने का फैसला किया गया, जो रघुवर दास की तरह ही वैश्य समुदाय से आते हैं और वे झारखंड के मूलवासी भी हैं. हालांकि रघुवर खेमा अब यह प्रचारित कर रहा है कि उन्होंने खुद ही टिकट लेने से इनकार कर दिया था.

बता दें कि झारखंड में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए उम्मीदवार को पहली वरीयता के 27.33 मतों की जरूरत पड़ेगी. विधायक बंधु तिर्की की सदस्यता समाप्त होने के बाद झारखंड विधानसभा में फिलहाल 80 विधायक हैं. इनमें झामुमो के सदस्यों की संख्या सर्वाधिक 30 है. वहीं, मुख्य विपक्षी दल भाजपा के पास 26, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पास 16, आजसू के 2, भाकपा माले का एक, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की एक, राष्ट्रीय जनता दल के पास एक एक तथा निर्दलीय दो. झाविमो के टिकट पर जीत कर आये तीन विधायकों में बाबूलाल मरांडी भाजपा विधायक दल के नेता हैं. उन्हें चुनाव आयोग ने पिछले चुनाव में भाजपा के सदस्य के रूप में वोट डालने की अनुमति दी थी. दूसरे विधायक प्रदीप यादव वर्तमान में कांग्रेस के साथ हैं, मगर विधानसभा में उन्हें मान्यता नहीं मिली है. तीसरे बंधु तिर्की की सदस्यता खत्म हो चुकी है. ऐसे में हो सकता है कि सत्ताधारी यूपीए दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन सुदेश महतो की इस घोषणा के बाद कि आजसू भाजपा प्रत्याशी को समर्थन देगी, भाजपा की एक सीट सुरक्षित हो गयी है. वहीं झामुमो अपने दम पर अपना उम्मीदवार जिताने में सक्षम है. ऐसे में अगर सत्तारूढ़ गठबंधन दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फैसला करता है, तो दूसरे यानी कांग्रेस उम्मीदवार का वही हश्र होगा, जो पिछली बार कांग्रेस उम्मीदवार शाहजादा अनवर का हुआ था. कुल मिलाकर सत्तारूढ़ गठबंधन में कांग्रेस एक बार फिर बेचारी सी दिख रही है.

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