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बीमार बेटी को डॉक्टर के यहां नहीं ले जाकर महिला मित्र से मिलने निकल गए थे राजेंद्र यादव

मन्नू भंडारी के जन्मदिन पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : रजनीगंधा मेरी पसंदीदा फिल्मों में शामिल रही है. बहुत वर्षों पहले जब दूरदर्शन पर जब ये फिल्म देखी थी तो नहीं पता था कि यह मन्नू भंडारी की कहानी यही सच है पर बनाई गई है. इधर कुछ साल पहले जब मन्नू भंडारी का आत्मकथा पढ़ी तब यह बात पता चली थी.

मन्नू भंडारी की कहानी यही सच है पर बनी थी रजनीगंधा फिल्म

जब फिल्म निर्देशक बासु चटर्जी ने मन्नू भंडारी से उनकी कहानी यही सच है पर फिल्म बनाने का प्रस्ताव दिया तो मन्नू जी को शंका थी कि नायिका के अंतर्द्वंद को फिल्म में सही ढंग से दिखाना संभव हो पाएगा लेकिन बासु दा ने अपने कौशल से यह बेहतरीन ढंग से फिल्माया था. फिल्म ने सिल्वर जुबली मनाई.

फिल्म तो बन गई लेकिन एक साल तक इस शानदार फिल्म को कोई डिस्ट्रीब्यूटर नहीं मिला था. आखिरकार राजश्री फिल्म के ताराचंद बड़जात्या ने इसे रिलीज किया. इस फिल्म को दर्शकों का भी प्यार मिला फिल्म ने सिल्वर जुबली मनाई.

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1975 में बेस्ट फिल्म का फिल्मफेयर अवार्ड मिला

रजनीगंधा’ सन 1974 में आई थी .दिल्ली में रहने वाली दीपा (विद्या सिन्हा ) संजय से प्रेम करती है और दोनों की शादी होने वाली है. संजय (अमोल पालेकर ) एक हंसमुख, मस्त, बेफिक्र टाइप का लड़का है जोकि बड़ा लापरवाह भी है. एक इंटरव्यू के सिलसिले में दीपा को मुंबई जाना पड़ता है जहाँ उसकी मुलाकात नवीन (दिनेश ठाकुर ) से होती है.

नवीन और दीपा कॉलेज के दिनों में एक दूसरे से प्रेम करते थे पर झगड़े और मनमुटाव की वजह से अलग हो जाते हैं. नवीन काफी बदल चुका है और स्वभाव में संजय से एकदम अलग जिम्मेदार, गंभीर है.

मुंबई में रहने के दौरान वह दीपा की काफी मदद करता है और उसका काफी ख्याल रखता है. इस सब से दीपा नवीन की ओर पुनः आकर्षित होने लगती है. रजनीगंधा को सन 1975 में बेस्ट फिल्म का फिल्मफेयर अवार्ड मिला था. इस फिल्म में योगेश के लिखे और मुकेश के गाए लाजवाब गीत हैं जैसे कई बार यूं ही देखा है और रजनीगंधा फूल तुम्हारे.

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राजेंद्र यादव- मन्नू भंडारी की प्रेम कहानी और अलगाव की दास्तान

कलकत्ता में रहने के दौरान ही साहित्यकार राजेंद्र यादव का परिचय मन्नू भंडारी से हुआ था. धीरे-धीरे ये मुलाकात प्रेम संबंध में तब्दील हुई और ये एक दूजे के हो गए. लेकिन एक पति-पत्नी के रूप में राजेंद्र और मन्नू में तालमेल नहीं बना.

मन्नू भंडारी ने अपने आत्मकथात्मक उपन्यास में इसके लिए राजेंद्र यादव को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने लिखा है कि राजेंद्र परिवार में रहने की सभी सुविधाएं तो चाहते रहे लेकिन जिम्मेदारियों उठाने से निरंतर भागते रहे.

मन्नू भंडारी ने कई उदाहरण भी दिए हैं एक में तो राजेंद्र के बीमार बेटी को डॉक्टर के यहां नहीं ले जाकर ये महिला मित्र से मिलने निकल गए थे. खैर इन दोनों की अनबन का नतीजा ये हुआ की दोनों अलग हो गए.

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क्या कहते हैं राजेंद्र मन्नू भंडारी से रिश्ते के बारे में

राजेंद्र यादव ने ओमा शर्मा को दिये एक इंटरव्यू में कहते हैं शायद मुझे लगता है कि हम लोग दोस्त बहुत अच्छे हो सकते हैं पति-पत्नी नहीं. मेरी जिंदगी का जो पैटर्न है वह मन्नू से बहुत अलग है. उसमें किसी और के लिए जगह ही नहीं बनती.

किसी दूसरे की मौजूदगी असुविधा पैदा करती है. जैसे मैं घर पर हूं तो भी मेरा मिनट दर मिनट कार्यक्रम तय रहता है. उठना- बैठना पढ़ना – लिखना फिर सोचना पढ़ना दफ्तर. किसी दूसरे के लिए बड़ा अमानुषिक हो जाता है कि आप साथ ही रह रहे हैं मगर एकदम फालतू से बनकर. उसके लिए दिनचर्या में स्पेस ही ना हो.

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