Opinion

राजस्थान का सियासी ड्रामा : राजनीतिक नैतिकता और भरोसा किस चिड़िया का नाम है?

विज्ञापन
Advertisement

Faisal Anurag

पोलिटकल रिवेंज यानी राजनीतिक बदला. यही है हार के बाद भी सत्ता तक पहुंचने की वह राजनीतिक शैली जिसे पिछले छह सालों में पुख्ता किया गया है. दहशत पैदा करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल और पार्टियों के अंदर के असंतोष को हवा देने के लिए तमाम वे तरीके, जिसे कभी राजनीति में मूल्य, नैतिकता और जनादेश के नाम से जाना जाता रहा है.

राजनीति में कारपोरेट धन के बढ़ते प्रभाव और निर्णायक जैसी होती भूमिका के बाद तो यह कहना भी मुश्किल हो गया है कि आखिर राजनीतिक नैतिकता और भरोसा किस  चिड़िया का नाम है. दुनिया में कम ही ऐसे लोकतंत्र हैं जहां रातों-रात न केवल प्रतिबद्धताएं बदल जाती हैं बल्कि भाषा और विचार भी. इस नए राजनीतिक निजाम का मुकाबला न तो पहले की तरह किया जा सकता है. और न ही उस राजनीतिक कल्चर और कौशल से जिसे अलाकमान कल्चर कहा जाता है.

advt

इसे भी पढ़ेंः JSLPS के PMU के लिए सरयू राय ने की फिर से टेंडर जारी करने की मांग, कहा- विदेशी कंपनियों के काम की हो समीक्षा

पार्टियों में असंतोष कोई बड़ी बात नहीं रही है. जिस भी राजनीतिक दल के भीतर लोकतंत्र जितना मजबूत होगा असंतोष और मतभेद की गुंजाइश उतनी ही ज्यादा होगी. केवल लोकतंत्र के नाम पर नियंत्रित नेतृत्व ही इस तरह के व्यवहार को अवसर नहीं देता है. राजनीतिक मर्यादा की मांग करने के लिए जरूरी है कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं के आदर करने की प्रवृति भी हो. राजस्थान का सियासी ड्रामा बताता है कि जिस तरह बिहार का जनादेश बदला गया उसे राजस्थान में मध्य प्रदेश के तरीके से ही अंजाम दिया जा सकता है.

अभी तक के संकेत तो यही बता रहे हैं कि इस बार राजस्थान का संकट गहरा है. भाजपा के नेता खुल करने बोलने लगे हैं और आईटी रेड पड़ने लगे हैं. पहले की राजनीति में एक टर्म होता था टाइमिंग. लेकिन अब उसका भी कोई  मतलब नहीं है. सचिन पायलट गुड़गांव में बैठे रहे और केंद्र की एजेंसी गहलोत के नजदिकियों के ठीकानों पर छापा मारी करती रही.

गुड़गांव या गुरूग्राम प्रतीक बन चुके हैं. न केवल अपने औद्योगिक और आईटी व मल्टीनेशन कारपोरेट हब के लिए बल्कि राज्यों की सरकारों के गिराने के खेल के लिए भी. हल ही में इसी ग्रुरूग्राम से महाराष्ट्र में रातों-रात फड़नवीस सरकार बनाने का खेल हआ. हालांकि उसकी आयु ज्यादा नहीं हो सकी. और कर्नाटक व मध्यप्रदेश का भी खेल हुआ जहां सरकारें गिरा दी गयीं. सचिन पायलट का अपने नजदिकियों के साथ गुरूग्राम में ही ठहराना एकबार फिर प्रतीक की महत्ता को उजागर कर रहा है. दलबदल या सरकार बदल का यह एक ऐसा तीर्थ बन कर उभरा है कि किसी भी राजनीतिक दल को दहशत में डाल दे.

इसे भी पढ़ेंः पलामू: जमीन खुदाई में मिले चांदी के सिक्के, बंटवारे की तस्वीर हुई वायरल, पुलिस ने किया जब्त

महत्व का तथ्य यह है कि जब कभी क्राइसिस का समय होता है कांग्रेस नेतृत्व शुतुरगुर्ग क्यों बन जा रहा है? पार्टी में अंदर के असंतोष के निदान के कोई उपाय करने के बजाय दंभी क्यों नजर आने लगता है. पार्टी पर हावी कुछ नेताओं की जमीनी पकड़ नहीं है. लेकिन जमीनी पकड़ वाले नेताओं के भीतर किसी तरह का क्षोभ उभरने ही क्यों दिया जाता है. असम के हेमंत विश्व सरमा के साथ यही हुआ. वह अपना दर्द सुनाने दिल्ली से आए लेकिन उन्हें सुनने के बजाय ऐसा माहौल बना मानो उनका अस्तित्व ही नहीं है.

आज पूरे पूर्वोत्तर के राज्यों में इसकी कीमत कांग्रेस चुका रही है. सरमा बीजेपी में जाने के बाद पूर्वोत्तर राज्यों में डिसिजन मेकर नेता के रूप में उभरे हैं. सिंधिया तो जमीनी नेता नहीं रहे हैं. बावजूद उनका असर रहा है. फिर भी उन्हें बीजेपी के ट्रैप से बचाने का प्रयास नहीं देखा गया. सचिन ने तो पिछले छह सालों में जमीन पर अपनी मेहनत से पहचान बनायी है.

हालांकि गहलोत भी जमीनी नेता हैं. लेकिन दोनों के बढ़ते मतभेद और टकराव को नेतृत्व ने तटस्थ नजरिए से ही क्यों देखा. भाजपा तो शुरू से ही राजस्थान की सरकार पर निगाह लगाए हुए है. सचिन को उनके ट्रैप में जाने से रोकने के बजाय उनके खिलाफ अपमानजनक हालात पैदा किए गए. नो रिटर्न के हालात में कई नेता पहले भी कांग्रेस से बाहर जा चुके हैं. प्रेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस अब भी उसी मुगालते जैसा व्यवहार करती है जो मजबूत आलाकमान के दौर में हुआ है. कांग्रेस को अब भी आकलन करने की जरूरत है कि नेहरू के जमाने से कांग्रेस क्षेत्रीय नेताओं के समन्वय के कारण ही मजबूत रही है. इंदिरा गांधी ने अपने शासनकाल में इसे कमजोर करने का प्रयास किया. जो अब बेहद कमजोर हालत में है.

कांग्रेस को इस तथ्य को भी याद करने की जरूरत है कि सोनिया गांधी के आने के बाद ही ममता बनर्जी और शरद पवार पार्टी से अलग हुए. जो बड़ी क्षेत्रीय ताकत हैं. इनके कारण बंगाल और महारष्ट्र में कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा है. मूपनार या अर्जुन सिंह पार्टी से अलग हो भले ही अपनी ताकत नहीं दिखा पाए हों लकिन उनकी क्षेत्रीय पहचान ही बाद में कांग्रेस के लिए फायदा पहुंचाने वाली साबित हुई हैं. इस समय तो दिल्ली में ऐसे शासक हैं जिनकी ताकत और तरीके को बिल्कुल अलग तरीके से देखा जा सकता है. केवल इंटलेक्चुअली या पुराने तरीके से इनका मुकाबला नहीं किया जा सकता है.

कांग्रेस को अपने क्षेत्रीय नेताओं के महत्व को दिल्ली में बैठे जमीन विहीन नेताओं के सुझावों के कारण नजरअंदाज करना घातक ही साबित होगा. आंकड़ों के सहारे हो सकता है राजस्थान में सरकार को कुछ मोहलत मिल जाए. लेकिन पायलट की नाराजगी को कम कर नहीं देखना चाहिए. वे बीजेपी में जाएं या नहीं लेकिन सरकार की स्थिरता के लिए तबतक खतरनाक हैं जब तक दिल्ली में भाजपा के रणनीतिकार सक्रिय हैं.

इसे भी पढ़ेंः डीईओ के आदेश पर ही प्राचार्यों ने दिया वेतन, अब उन्हीं से मांगा जा रहा जवाब

advt
Advertisement

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Related Articles

Back to top button
Close
%d bloggers like this: