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तबादले पर अफसरों का सवाल उठाना, विधायिका के दखल से तो नहीं बिगड़ रहा कार्यपालिका का संतुलन !

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Akshay Kumar Jha

सीआईडी में तैनात डीएसपी मदन मोहन प्रसाद सिन्हा को सिर्फ दो महीने में ही उसी शहर में वापस भेज दिया जाना जहां वह इंस्पेक्टर के रुप में पदस्थापित थे. एक महीने पहले ही खूंटी में तैनात डीएसपी किशोर कुमार रजक का तबादला हो जाता है. फुटबॉल की तरह चार साल में पांच जगहों पर अरविंद लाल का तबादला हो जाता है. ऐसे कई नाम सरकार के बीते कार्यकाल में देखने को मिल जाएंगे, जिससे सीधे तौर पर तबादले के मामले में रघुवर सरकार पर ऊंगली उठी है.

सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें से कई मामलों को खुद अधिकारियों ने उठाया है. डीएसपी किशोर कुमार रजक का फेसबुक पर अपनी पीड़ा बताना और बाद में उसे फेसबुक वॉल से हटा लेना, यह साफ करता है कि तबादले के पीछे कार्यपालिका का तंत्र काम कर रहा है या विधायिका का दखल जरुरत से ज्यादा बढ़ गया है. डीएसपी मोहन प्रसाद सिन्हा को दोबारा बोकारो ट्रैफिक डीएसपी बनाकर भेजने की शिकायत चुनाव आयोग से भी की गयी है. शिकायत में साफ तौर से यह आरोप लगाया है कि स्थानीय विधायक की वजह से उन्हें दोबारा बोकारो बुलाया गया है.

बोकारो और धनबाद जिला को ही देख लीजिए

बोकारो उन शहरों में से है जहां झारखंड प्रशासनिक सेवा के हर अधिकारी पोस्टिंग चाहते हैं. वजह वहां की शिक्षा व्यवस्था और बीएसएल का शानदार आवास है. सदात अनवर चास के एसडीएम रह चुके हैं. साथ ही उनकी राजनीति से नजदीकी भी किसी से छिपी नहीं है. वो इससे पहले धनबाद में डीएसओ थे. उनका तबादला बोकारो डीआरडीए निदेशक के पद पर हो गया. शशिप्रकाश झा भी धनबाद में पदस्थापित थे, उन्हें भी पास का जिला बोकारो भेज दिया गया. हद तो मदन मोहन प्रसाद सिन्हा के मामले में हो गयी. वो कई दिनों तक सेक्टर वन थाना के प्रभारी रहे. प्रमोशन हुआ तो सीआईडी में आए. लेकिन दो महीने के अंदर वापस से बोकारो आ गए. इसे अगर कार्यपालिका में विधायिका का दखल नहीं कहेंगे तो और क्या है ?

जोश, ऊर्जा, ईमानदारी, मेहनत, मेरिट सब बकवास

एक प्रशासनिक अधिकारी को फेसबुक जैसे सोशल जगह पर अगर ऐसा लिखना पड़ता है, तो निश्चित तौर से उसके मन में काफी पीड़ा होगी और हो भी क्यों ना. दो ही महीने में एसआईआरबी-2 खूंटी से तबादला होना किसी भी अधिकारी के लिये एक सदमे की तरह है.

वहीं अरविंद लाल को जुलाई 2015 में राज्य निर्वाचन आयोग का अवर सचिव बनाया. जून 2016 में पाकुड़ का एसडीओ, जून 2017 में घाटशिला का एसडीओ और कुछ ही महीने बाद अगस्त 2018 में वेटिंग फॉर पोस्टिंग, नवंबर 2018 में योजना एवं वित्त विभाग का अवर सचिव और फरवरी 2019 में दुमका का जिला भू-अर्जन पदाधिकारी बना दिया जाना. साफतौर से किसी भी अधिकारी के मोरॉल पर चोट पहुंचाता है.

लातेहार से लेकर धनबाद तक एक ही जाति विशेष के पुलिस कप्तान

ऐसा हो भी सकता है कि तबादले के पीछे किसी की कोई मंशा नहीं हो. एक प्रणाली के तहत तबादले की कार्यवाही हुई हो. लेकिन बीते सरकार के कार्यकाल में ऐसा भी देखा गया है कि झारखंड में कोल बेल्ट में लातेहार से लेकर धनबाद तक एक ही जाति विशेष के पुलिस कप्तान तैनात थे. यह जाति विशेष वो जाति है जो राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारी की जाति है. इस बात का दबी जुबान से काफी विरोध हुआ. लेकिन खुल कर कोई कुछ नहीं कह सका. हालात गवाह है कि कोयलांचल में कोयले का खेल ऐसा हुआ जो शायद ही किसी सरकार में हुआ हो. रंगदारी और गुंडागर्दी जो बढ़ी वो अलग.

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