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घोषणा कर पुलिसवालों को भरोसा दिलाया, खुद ही भूल गए रघुवर दास, परिवार अब लगा रहा दफ्तरों के चक्कर

Akshay Kumar Jha

Ranchi: 14 मई 2016 को राज्य भर में स्थानीय नीति को लेकर जेएमएम आंदोलन कर रहा था. बोकारो जिले के नावाडीह थाना इलाके में जेएमएम के लोग सड़क पर थे. उनका नेतृत्व डुमरी विधायक जगरनाथ महतो कर रहे थे. जेएमएम के कार्यकर्ताओं ने पूरे थाना क्षेत्र की दुकानों को बंद करवा दिया था. पुलिस सड़क और तमाम जगहों पर मुस्तैद थी. नावाडीह थाना प्रभारी रामचंद्र राम अपने थाना इलाके के चप्पे-चप्पे की खबर रख रहे थे. अपने थाना क्षेत्र में वो विधि व्यवस्था को बहाल करने की हर संभव कोशिश कर रहे थे. इसी बीच जेएमएम के कार्यकर्ता सड़क पर ट्रक के टायरों में आग लगाने लगे. एक साथ कई टायर धू-धू कर जलने लगे. धुंए में आस-पास का इलाका डूब गया. पुलिसवालों से कुछ जेएमएम कार्यकर्ताओं की थोड़ी धक्का-मुक्की भी हुई. थाना प्रभारी रामचंद्र राम को धुंए से तकलीफ होने लगी. धक्का-मुक्की और धुंए की वजह से वो सड़क पर गिर पड़े. बाद में जब आंदोलन शांत हुआ तो थाना प्रभारी को अस्पताल लाया गया. वहां से उन्हें बीजीएच ले जाया गया. 15 मई को डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

सीएम ने किया वादा पर पूरा नहीं किया

इस घटना के बाद मुख्यमंत्री रघुवर दास ने रामचंद्र राम के परिवारवालों को उन्हें मिलनेवाली मुआवजे की राशि दस लाख रुपए तत्काल दिला दी. परिवारवालों को भरोसा दिलाया कि नक्सली घटना में मौत के बाद जिस तरह का मुआवजा पुलिसवालों को मिलता है, उसी तर्ज पर सारी सुविधाएं लॉ एंड ऑर्डर संभालते हुए किसी पुलिसवाले के मौत पर मिलेगी. इसके साथ ही सीएम ने मीडिया के सामने भी इस बात की घोषणा की. कहा कि सरकार ने फैसला लिया है कि विधि व्यवस्था के दौरान अगर किसी अधिकारी या कर्मचारी की मौत होती है, तो उसे नक्सली हिंसा में मौत के बाद मिलनेवाले सरकारी मुआवजा के समान ही राशि व अन्य लाभ दिये जाएंगे. सीएम ने पुलिस अधिकारी, जवान, होमगार्ड, सरकारी अधिकारी और कर्मचारी को सरकार की तरफ से विशेष मदद देने की घोषणा की थी. नावाडीह के थाना प्रभारी की मौत के बाद सीएम ने यह आदेश दिया था. अपने आदेश के मुताबिक विधि व्यवस्था में हुई मौत के आश्रित को सरकारी नौकरी, अनुग्रह अनुदान, बीमा, शिक्षण और आवासीय के अलावा अन्य सुविधाएं दी जानी थीं.

वित्त और कार्मिक विभाग के बीच झूलते फाइल का दम टूटा

न्यूज विंग ने जब सीएम की घोषणा की पड़ताल की तो पता चला कि सीएम के आदेश के बाद फाइल ने टेबल-टू-टेबल सफर करना शुरू कर दिया था. लेकिन वित्त और कार्मिक विभाग की तरफ से इस प्रपोजल को रोक दिया गया. जानकार बताते हैं कि सीएम ने घोषणा तो कर दी, लेकिन इस योजना पर दोबारा ध्यान ही नहीं दिया. अगर सीएम चाहते तो उनकी घोषणा कैबिनेट से पास हो कर पुलिसवालों के परिवारों को सुविधा मिलने लगती. लेकिन सीएम ने ऐसा नहीं किया. राज्य का पुलिस महकमा अब इस मामले में अपने-आप को ठगा हुआ महसूस कर रहा है.

सरकार ने दबा रखी है मुआवजे की राशि, शहीद के घरवालों को पता तक नहीं

सातवें वेतनमान के लागू होने से पहले विधि व्यवस्था संभालने में अगर पुलिसवालों की मौत होती थी, तो उसे मुआवजे के तौर पर तत्काल दस लाख दिए जाने का प्रावधान था और नक्सली हिंसा में शहीद होने पर 11 लाख देने का प्रावधान था. सातवें वेतनमान के बाद अब विधि व्यवस्था संभालने के दौरान अगर मौत होती है तो उन्हें 25 लाख और नक्सली हिंसावालों को 35 लाख मिलने का प्रावधान है. एक जनवरी 2016 से सातवां वेतनमान लागू है. आठ अप्रैल 2017 को सिमडेगा बानो में देर रात 12 बजे पीएलएफआइ नक्सलियों और पुलिस के बीच मुठभेड़ में बानो थाना इंचार्ज विद्यापति सिंह और एक सिपाही तुराम बिरूली शहीद हो गए. मौके पर करीब 8 नक्सली थे. सिंह ने उन्हें सरेंडर करने को कहा. नक्सलियों ने हाथ खड़े कर सरेंडर करने का नाटक किया. इसके बाद नक्सलियों ने अचानक पुलिस पर हमला कर दिया. गोली थाना इंचार्ज विद्यापति सिंह (36) और सिपाही तुराम बिरूली (30) को लगी, जिससे उनकी मौत हो गई. इसके बाद सभी नक्सली फरार हो गए. इन दोनों परिवार वालों को तत्काल प्रभाव से 10-10 लाख रुपए दे दिए गए. इसके अलावा इन्हें अनुग्रह अनुदान के तौर पर उनकी बाकी बची सैलेरी जो उन्हें ड्यूटी करने पर मिलती दे दी गयी. लेकिन तत्काल प्रभाव से मिलने वाली 35 लाख रुपए की बचे 25 लाख रुपए नहीं दिए गए. जानकार बताते हैं कि वो दोनों पुलिस में नए थे. शायद ही उन्होंने घर में इस मुआवजे राशि की बात बतायी हो. लेकिन ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकार का इस ओर कोई दायित्व नहीं है कि वो पुलिस के आश्रितों को उनके हक का पैसा दे दे.

पुलिस को सरकार अपना बंधुआ मजदूर समझती हैः राकेश पांडे

न्यूज विंग से बात करते हुए पुलिस मेंस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष राकेश पांडे ने कहा कि पुलिस को सरकार अपना कर्मी समझती ही नहीं है. पुलिस को एक बंधुआ मजदूर समझा जाता है. पहली बार ऐसा नहीं हुआ है कि सीएम पुलिसवालों के लिए घोषणा कर भूल गए हों. पुलिसवाले अपनी जान जोखिम में डाल कर काम करते हैं और सीएम जो वादा पुलिसवालों से करते हैं वो भी पूरा नहीं करते हैं.

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