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बाजी तो हार गये हैं रघुवर दास!

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Sudhir Pal

हो सकता है कि रघुवर दास जी अपनी सीट बचा लें. लेकिन राजनीतिक बिसात पर वे बाजी हार गये हैं.

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रघुवर दास के फिर मुख्यमंत्री बनने के सपने पर पलीता लग गया है. झारखंड में जोड़-घटाव कर सरकार तो बीजेपी की बन ही जायेगी लेकिन मुख्यमंत्री फिर रघुवर दास होंगे, इसकी गारंटी अब नहीं के बराबर है.

बीजेपी की ‘एन्टी ट्राइबल’ छवि गढ़ने में रघुवर दास की बड़ी भूमिका रही है और अब पार्टी को इस छवि को तोड़ने के लिए ट्राइबल मुख्यमंत्री के विकल्प पर काम करना मजबूरी है.

वोट का आंकड़ा जो भी हो सरयू राय की मुहिम ने रघुवर दास की उर्वर राजनीतिक जमीन को एक झटके में मटियामेट कर दिया.

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बेवकूफ सलाहकारों की सुन सरयू राय का टिकट कटवाने में रघुवर दास सफल रहे. राजनीति में सामान्यतः दुश्मनी निकालने के लिए लोग अपना घर नहीं जलाते हैं. सरयू राय को जमशेदपुर पश्चिम से लड़ने के लिए छोड़ दिया जाता तो चुनाव तक वे अपनी ही सीट बचाने में लगे रहते. न तो रघुवर दास की और न ही पार्टी की मिट्टी पलीद होती.

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सरयू राय जीत जाते तो रघुवर के खाते में एक सीट बढ़ जाती. हार जाते तो ऐसे ही राजनीतिक तौर सरयू राय हाशिये पर आ जाते.

रघुवर दास भष्ट्र हैं, टाटा से उपकृत हैं, हर मोर्चे पर विफल हैं, क्षेत्र में उनके परिवार का आतंक है, आदि मानने, बोलने की हिचक को सरयू राय ने खत्म कर दिया. पार्टी के भीतर और बाहर यह छवि स्थापित हुई कि रघुवर दास घमंडी और बदजुबान हैं.

अपनी ही सरकार की सारी उपलब्धियों को फर्जी साबित कर सरयू राय ने पार्टी और मुख्यमंत्री की भद पिटा दी. पांच साल मुख्यमंत्री रहने के बाद भी 86 बस्तियों के रेगुलेशन नहीं होने का माकूल जवाब देने की स्थिति में कोई नहीं रहा.

याद कीजिए बीजेपी के चुनाव अभियान की शुरुआत-‘झारखंड पुकारा, रघुवर दुबारा’ से हुई थी. प्रथम चरण के चुनाव से पहले ही नारा बदल गया. 65 पार पर कोई बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहा है.

(सुधीर पाल के फेसबुक वाल से)

डिसक्लेमरः इस लेख में व्यक्त किये गये विचार लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गयी किसी भी तरह की सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता और सच्चाई के प्रति newswing.com उत्तरदायी नहीं है. लेख में उल्लेखित कोई भी सूचना, तथ्य और व्यक्त किये गये विचार newswing.com के नहीं हैं. और newswing.com उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

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