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जेपी आंदोलन से रघुवंश प्रसाद सिंह ने शुरू किया था राजनीति का सफर

Patna :  राजद के दिग्गज नेता और लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक जीवन के हमसफऱ रघुवंश प्रसाद सिंह का रविवार को नई दिल्ली स्थित एम्स में निधन हो गया. उनका निधन राजद के लिए एक ऐसा आघात है जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो सकेगी. जब भी राजद और लालू प्रसाद के साथ बिहार की राजनीति का जिक्र होगा वह रघुवंश प्रसाद सिंह के बिना अधूरी ही होगी. सादगी भरा जीवन जीने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह अपने जीवन के अंतिम क्षणों में राजद के साथ मोहभंग हो गया था. उन्होंने राजद से इस्तीफा दे दिया था हालांकि लालू प्रसाद यादव ने उनका इस्तीफा मजूर नहीं किया था. उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन जेपी आंदोलन से शुरू किया था. कभी प्रोफेसर रहे रघुवंश प्रसाद सिंह का कद एक वक्‍त में लालू यादव के बराबर था.

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वैशाली से पांच बार सांसद चुने गए

रघुवंश प्रसाद सिंह (74 वर्ष) ने अपना राजनीतिक सफर जेपी आंदोलन में शुरू किया था. 1977 में वह पहली बार विधायक बने. इसके बाद वे बिहार में कर्पूरी ठाकुर सरकार में मंत्री भी बने. वे बिहार के वैशाली लोकसभा क्षेत्र से पांच बार सांसद रह चुके थे. हालांकि इस बार वे इसी क्षेत्र से जेडीयू नेता से चुनाव हार गये थे.

 

मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री भी रहे

रघुवंश प्रसाद सिंह का जन्म 6 जून 1946 में हुआ था. वे भारत की 15 वीं लोकसभा के सदस्य थे. उन्होंने बिहार के वैशाली निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. राष्ट्रीय जनता दल राजनीतिक दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद भी रहे. वे 1977 से चार दशकों तक विधायिका के प्रतिनिधि के रूप में भारत के सबसे वरिष्ठ राजनेताओं में से एक रहे. उन्होंने बिहार विधनसभा में पांच बार बेलसंड निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी किया. उन्हें 1991 में बिहार विधान परिषद का सदस्य बनाया गया था, तब वह बिहार विधान परिषद के अध्यक्ष भी बने थे. तीन बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी रहे. रघुवंश प्रसाद सिंह मनमोहन सिंह की सरकार के यूपीए-एक में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री थे. उन्हें ही उन्हें नरेगा (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) की अवधारणा और कार्यान्वयन का श्रेय दिया जाता है.

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जेपी आंदोलन में भी की शिरकत

रघुवंश सिंह ने अपने बारे में एक साक्षात्कार में बताया था कि वो 11 बार जेल जा चुके हैं. 1974 यानी जेपी आंदोलन में रघुवंश प्रसाद सिंह ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था. उस वक्त दोबारा से उन्हें जेल में बंद कर दिया गया. उन दिनों केंद्र और बिहार में कांग्रेस पार्टी की का शासन था. अपातकाल के समय बिहार में जगन्नाथ मिश्र की सरकार ने जेल में बंद रघुवंश प्रसाद सिंह को प्रोफेसर के पद से बर्खास्त कर दिया था. सरकार के इस फैसले के बाद रघुवंश प्रसाद सिंह ने कभी मुड़कर पीछे नहीं देखा और फिर कर्पूरी ठाकुर और जय प्रकाश नारायण के रास्ते पर तेजी से चल पड़े.रघुवंश प्रसाद सिंह अपने दो भाइयों में बड़े हैं. उनके छोटे भाई रघुराज सिंह का पहले ही देहांत हो गया है. उनकी धर्मपत्नी जानकी देवी भी इस दुनिया में नहीं हैं. परिवार में रघुवंश बाबू के दो बेटे और एक बेटी है. बेटी सबसे बड़ी है. रघुवंश प्रसाद सिंह के परिवार से उनके अलावे कोई दूसरा सदस्य राजनीति में सक्रिय नहीं है. रघुवंश प्रसाद के दोनों बेटे इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके नौकरी कर रहे हैं. बड़े बेटे सत्यप्रकाश दिल्ली में इंजीनियर हैं.  जबकि उनका छोटा बेटा शशि शेखर हांगकांग में नौकरी कर रहे हैं. इनकी बेटी पत्रकार है और वो दिल्ली में ही टीवी चैनल में काम करती हैं.

 

राजनीतिक सफर

रघुवंश प्रसाद सिंह का राजनीतिक सफर भी बड़ा दिलचस्प रहा.  जीवनभर वे अपने सिद्धांतों और वसूलों के साथ खड़े रहें.  साल 1977 से 1979 तक बिहार सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे. इसके बाद उन्हें  लोकदल का अध्यपक्ष भी बनाया गया, फिर साल 1985 से 1990 के दौरान रघुवंश प्रसाद लोक लेखांकन समिति के अध्यिक्ष भी रहे. 1996 में लोकसभा के सदस्य के तौर पर उनका पहला कार्यकाल शुरू हुआ. साल 1996 के लोकसभा चुनाव में वो निर्वाचित हुए और वे बिहार के केंद्रीय पशुपालन और डेयरी उद्योग राज्यमंत्री बने. साल 1998 में वे दूसरी बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए. इशके बाद साल 1999 में तीसरी बार वो लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए. कुछ अरसे के गैप के बाद साल 2004 में चौथी बार उन्हें लोकसभा सदस्य के रूप में चुना गया. 23 मई 2004 से 2009 तक वे ग्रामीण विकास के केंद्रीय मंत्री रहे. इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने पांचवी बार जीत दर्ज की.

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