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रफाल डील : क्लीन चिट मिस फायर, SC को गुमराह किसने किया

खडगे ने कहा है कि उनके संज्ञान में ऐसी कोई रिपोर्ट कमिटी के समक्ष नहीं रखी गयी है. यहां तक कि संसद में भी  सीएजी की रिपोर्ट पेश नहीं की गयी है

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Faisal Anurag
पब्लिक एकाउंट कमेटी की रफाल संबंधी जिस रिपोर्ट को आधार बना कर सुप्रीम कोर्ट ने डील की जांच के लिए दी गयी याचिकाओं को खारिज किया, उस रिपोर्ट के अस्तित्व का विवाद गहरा हो गया है. पीएसी के चेयरमेन मल्लिकार्जुन खडगे और कमिटी के अनेक सदस्यों ने उस रिपोर्ट के अस्तित्व को ही खारिज कर दिया है. खडगे ने कहा है कि उनके संज्ञान में ऐसी कोई रिपोर्ट कमिटी के समक्ष नहीं रखी गयी है. यहां तक कि संसद में भी  सीएजी की रिपोर्ट पेश नहीं की गयी  है और पब्लिक डोमेन में वह रिपोर्ट है ही नहीं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीएजी की रिपोर्ट पब्लिक डोमेन में है और न ही वह पीएसी की प्रक्रिया से हो कर गुजरी है. आखिर सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किसने किया है. जैसा कि कानूनविद कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के  फैसले की बुनियाद यही रिपोर्ट है. अब सवाल उठाया जा रहा है कि क्या जानबूझ कर सुप्रीम कोर्ट के सामने फर्जी दस्तावेज पेश किया गया है. मीडिया लगातार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दे कर प्रचार कर रहा है, वह और उसके बडे तबके लिख और कह रहे हैं कि रफाल में सरकार को क्लीन चिट मिल गयी है. कोलकाता से प्रकाशित द टेलिग्राफ ने लीड समाचार बनाते हुए प्रश्नविराम चिन्ह लगाया है और लिखा है नेशन फलाइज इन टू रफाल रिड्ल एज वरडिक्ट इटस मिसटिरियस कैग रिपोर्ट एंड पीएसी एक्जामिनेशन. इसके साथ ही उसकी सब हेडिंग है क्लीन चिट  मिस फायर. देश के किसी अन्य अखबार में इस तरह की हेडिंग नहीं है. हालांकि कैग की रिपोर्ट को संदेह के घेरे में कई अखबारों ने रखा है.

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अदालत के फैैसले में कहीं भी क्लीन चिट नहीं

एक चेनल ने कहा है कि अदालत के फेसले में कहीं भी क्लीन चिट नहीं लिखा है. वित मंत्री अरुण जेटली ने भी स्वीकार किया है कि इस मामले में कोर्ट की सीमित सीमा है. आर्टिकल 25 के तहत सुप्रीम कोर्ट इस मामले में ज्यादा दखल देने की स्थिति में नहीं है  और कोर्ट ने भी इस तथ्य को अपने फैसले में स्वीकार किया है. राजनीतिक तौर पर इस फैसले को भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस अपने अपने तरीके से पेश कर रही है. भाजपा अध्यक्ष ने जहां झूठ के उजागर होने पर राहुल गांधी से माफी मांगने की मांग की है, वहीं राहुल गांधी ने  प्रेस कांफेस कर चौकीदार को चोर बताया है और पूरे डील की जांच संयुक्त संसदीय दल से कराने की अपनी मांग को दुहराते हुए कहा है कि देरसबेर इस सौदे की जांच होगी और वे प्रमाणित करेंगे की नरेंद्र मोदी ने अनिल अंबानी का पक्ष लिया है और उनके पाकेट में तीस हजार करोड का लाभ पहुंचाया है

कैग रिपोर्ट को लेकर सवाल

. कांग्रेस के लोकसभा के नेता और पीएसी के अध्यक्ष खडगे ने भी कैग रिपोर्ट को लेकर दुबारा सवाल उठाया है और पूछा है कि उस रिपोर्ट की सच्चाई क्या है. पिछले दिनों रिटायर्ड हुए 60 से ज्यादा अधिकारियों ने सीएजी को पत्र लिख कर इस मामले की जांच की मांग की है. यह भी कहा जा रहा है कि सीएजी की कोई रिपोर्ट तैयार ही नहीं है. टेलिग्राफ की भी खबर है कि अधिकरियों ने कहा है कि सीएजी की रिपोर्ट तेयार नहीं है. अदालतों को गुमराह करने का यह मामला अत्यंत गंभीर है क्यों कि सीएजी रिपोर्ट की अपनी प्रक्रिया है और उसके लिए संवेधनिक प्रावधान है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष फिर गलत तथ्य क्यों पेश किया है इससे पूरे रफाल डील में संदेह और गहरा हो गया है.

आखिर देश से क्या छुपाने की कोशिश की जा रही है

आखिर देश से क्या छुपाने की कोशिश की जा रही है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि  ऑफसेट पार्टनर चुनने में भारत सरकार की रोई भूमिका नहीं है लेकिन  डील के समय फ्रांस के प्रेसिडेंट ओलांद कह चुके हैं कि अंबानी की कंपनी के चयन के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने प्रस़्ताव रखा था और फ्रांस के पास कोई इस संदर्भ में कोई विकल्प छोडा ही नहीं गया था. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि अंबानी की कंपंनी से 2012 से ही बात चल रहीं थी लेकिन जिस कंपनी का चयन आफसेट के रूप में किया गया वह डील से मात्र 12 दिनो पहले ही अस्तित्व में आयी है. इस संदर्भ में भी क्या केद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के गलत जानकारी दे कर गुमराह किया है

सरकार की तरफ से अनेक मंत्रियों ने प्रेस कांफ्रेस कर कांग्रेस ओर विपक्ष पर हमला किया है लेकिन इन सवालों पर कोई रोशनी नहीं डाली है. इंतजार किया जा रहा है कि जो सवाल फैसले को ले कर उठे हैं उस पर रोशनी डाली जाये और तथ्यों को उजागर किया जाये. यदि पब्लिक डोमेन में कैग की रिपोर्ट है तो उसे फिर पीएसी से क्यों छुपाया गया है. क्योकि कानून पीएसी की  समीक्षा की प्रक्रिया है ओर सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि कैग की रफाल रिपोर्ट पीएसी की समीक्षा की प्रक्रिया से गुजर चुकी है. पूरी संसदीय प्रक्रिया के लिए यह गंभीर संकट का सवाल है और अदालतों की स्वयत्तता का सवाल भी इससे जुडा हुआ है.

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