Opinion

अमेरिका में जारी नस्ली हिंसा को भारतीय संदर्भ में इस तरह देखे जाने की जरूरत है

Faisal Anurag

नस्ली हिंसा के खिलाफ अमेरिकी नागरिकों के प्रतिवाद ने 52 सालों बाद एकजुटता का जो प्रदर्शन किया है उससे ट्रंप शासन बौखला गया है. उसने राज्यों को निर्देश के लहजे में कहा है कि आंदोलन करने वाले आतंकवादी हैं. उन्हें कुचल दिया जाए. नहीं तो वे सेना को भेज कर कुचल देंगे. जिस देश के पुलिस अधिकारी घुटनों पर बैठ कर माफी मांग रहे हैं, उसी देश का राष्ट्रपति बौखलाहट में अपने फासिस्ट चरित्र को दिखा रहा है.

सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप की प्रतिक्रियाओं पर ह्यूस्टन के पुलिस चीफ अर्ट एसिवेडीयो ने कहा है कि ट्रंप यदि  सकारात्मक नहीं हो सकते हैं तो उन्हें कम से कम अपना मुंह बंद रखना चाहिए. ट्रंप अमेरिका के उन राज्यों के गर्वनरों के खिलाफ आग उगलते रहे हैं जो उनके विरोधी डेमोक्रटिक पार्टी के हैं.

ट्रंप ने इस पूरे क्रम में जिस तरह अपने ट्वीट से आग में घी डाला है उसकी अमेरिका में भारी आलोचना हो रही है. हिंसा के लिए जवाबदेह भी ट्रंप को ही बताया जा रहा है. जिन्होंने जार्ज फलायड को हत्या के बाद ठग बताया. और एक तरह से उस गोरे पुलिस अधिकारी का बचाव किया जिसने अपने घुटनों से गला दबा कर जार्ज की हत्या कर दी.

उस गोरे अधिकारी की पत्नी ने ही इस घटना के बाद तलाक दे दिया. देश के अधिकांश व्हाइट ब्लैक के साथ मिल कर प्रदर्शन में शामिल हो रहे हैं. 2 सालों के बाद इस तरह के हिंसक प्रदर्शन अमेरिका में हो रहे हैं  और इससे छोटे बड़े 140 शहर प्रभावित हैं. न्यूयार्क सहित अनेक बड़े शहरों में कफर्यू लगा दिया गया है. राष्ट्रपति को भी बंकर में शरण लेनी पडी.

मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या के बाद इसी तरह का आक्रोश अमेरिका देख चुका है.

अमेरिकी समाज में रंगभेद की जड़ें गहरी हैं. 1964 में उसे कानूनी तौर पर खत्म किया गया. लेकिन ट्रंप के आगमन के बाद व्हाउट सुपरमेसी के दौर की वापसी की जमीन तैयार की गयी. चार साल पहले ट्रंप की चुनावी जीत में भी इस रंगभेद की बड़ी भूमिका थी. अमेरिका में ट्रंप के समय जिस तरह व्हाउट सुपरमेसी की चर्चा हुई, वैसा पिछले सौ सालों में नहीं हुआ.

पूरे अमेरिकी  और अफ्रीकी महादेश को रंगभेद के खिलाफ जीत हासिल करने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा है. अब्राहम लिंकन ने गुलामी की जड़ें खत्म की थीं. और रंगभेद पर भी प्रकारंतर से प्रहार किया था. लेकिन उसे समाज से पूरी तरह खत्म होने की जंग अब भी जारी है.

ट्रंप ने ट्वीट कर जिस तरह का नफरत जार्ज फलायड घटनाक्रम में व्यक्त किया है इसका जवाब घुटनों पर बैठ कर गोरों ने ही दिया है. हालांकि अमेरिकी दुनिया इस समय बेहद खतरनाक सामाजिक अंतरविरोधों से गुजर रही है. कोविड 19 ने जिस तरह का माहौल बनाया है, उससे अमेरिका की इकोनॉमी खतरनाक स्थिति में है. नवबंर में राष्ट्रपति का चुनाव भी है.

और कोविड  प्रबंधन में ट्रंप पूरे अमेरिका में आलोचना के केंद्र हैं. तबाही के लिए उन्हें ही जिम्मेदार बताया जा रहा है. यहां तक कि सरकार के अनेक अधिकारी भी अपने रोष को प्रकट कर चुके हैं. ऐसी स्थिति में जिस तरह नस्ली सुपरमेसी के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे हैं, इससे ट्र्ंप की राजनीतिक ताकत कमजेार ही हुई है.

अमेरिका में अविश्वास की स्थिति इतनी भयावह है कि कई शहरों में अमेरिकी झंडे को भी आग के हवाले किया गया है. जबकि विदित है कि अमेरिकी नागरिक अपने झंडे का सम्मान करते हैं. ट्रंप के शासन के प्रति नाराजगी इस रूप में भी प्रकट हुई है.

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अमेरिकी नागरिकों का एक तबका तो पहले भी सरकार की नीतियों के खिलाफ उतर कर विरोध करता रहा है. लेकिन इसका प्रतिवाद कई नए सामाजिक राजनीतिक बदलावों का भी संकेत दे रहा है. ब्लैक प्रतिरोध का अमेरिकी नागरिकों का प्रतिरोध बन जाना एक बड़ी, परिघटना है. और उसके वैश्विक असर के संकेत तो पहले ही दिन मिले. जब यूरोप के भी कई शहरों में इस हत्याकांड के खिलाफ कोविड 19 के प्रतिबंधों के बीच ही बड़े-बड़े प्रतिरोध कार्यक्रम आयोजित किये गये.

इसका प्रभाव भारतीय सोशल मीडिया पर भी दिख रहा है. जहां जाति उत्पीड़न और जाति को नस्लवाद बताया जा रहा है. भारतीय नागरिकों के एक तबके के उस नजरिये की भी आलोचना की जा रही है, जो अपने देश के श्रम समूहों के प्रति नफरत के बयान देता है. फेसबुक के एक पोस्ट में रूचिर गुप्ता ने लिखा है : थोड़ा ही सही अमेरिका में तो लोगों को एहसास हो रहा है कि एक दक्षिणपंथी सरकार के पैदा किये हालात ने फ़िज़ां में कितनी नफरत घोल दी है.

हिंदुस्तान अभी इस एहसास से दूर किचन में नई रेसिपी तैयार करने में व्यस्त है.

अभी दम केवल मजदूरों का दम घुट रहा है, अभी लिंचिंग केवल दलितों और अल्पसंख्यकों की हो रही है. अभी केवल वो जेलों में ठूसें जा रहे हैं जो असहमत हैं, अभी आपको लोकतंत्र का गला घोंटे जाने की साजिशों का एहसास नहीं हो रहा है. अभी ना तो ये चीखें आपके कानों तक पहुंच रही हैं ना इनका गुस्सा आपको ये बता रहा है कि आपकी हालत अमेरिका से ज़्यादा बदतर है. आपकी गर्दन भी घोंटी जा रही है.

लेकिन ताली, थाली और मोमबत्तियों ने अभी आपकी चेतना का गला घोंट रखा है. अभी आपने भी अपनी तर्कशक्ति को, अपनी इंसानी संवेदनाओं को, अपने सवालों को एक ऐसी चेतना-शून्य जकड़न के हवाले कर रखा है, जिससे आज़ादी आसान नहीं है.

अभी आपको एहसास नहीं है कि उस अमेरिकी पुलिस अफसर के बूटों की धमक आपकी गलियों तक सुनाई दे रही है. अभी आप दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की गौरव गाथाओं को ही पढ़ रहे हैं. अभी आपने अपने लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमलों से आंखें मूंद रखी हैं. अभी आपको अपने देश की न्याय व्यवस्था की दिशा का अंदाज़ नही है.

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