Opinion

कोरोनाकाल में मजदूरों की घर वापसी और रोजगार के सवाल

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Faisal Anurag

राज्यों में वापसी के बाद जिस तरह श्रमिक अपनी तकलीफ, बेबसी और गुस्से का इजहार कर रहे हैं, वह किसी भी सरकार के लिए परेशानी है. इसके बावजूद देश का राजनीतिक सिस्टम इससे अपने को बेअसर दिखाने का प्रयास कर रहा है. बिहार वापस आये मजूदरों ने तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ अपने आक्रोश को जिस तरह स्वर दिया है, वह राजनीतिज्ञों के लिए बड़ी चेतावनी है.

क्वारंटाइन सेंटरों की कुव्यवस्था के खिलाफ बिहार और झारखंड में जहां मजूदरों ने आवाज उठायी है, वहीं उत्तर प्रदेश सरकार ने तो मजूदरों को बेबसी की अवस्था में ही छोड़ सा दिया है. हालांकि यूपी के मुख्यमंत्री ने गुस्साये मजदूरों को शांत करने के लिए कहा है कि उन्हें राज्य में ही हर तरह के रोजगार दिये जायेंगे. सबसे पहले श्रमिकों के हितों के कानूनों में बड़े बदलाव करनेवाले आदित्यनाथ अब कहने लगे हैं कि राज्य में जल्द ही मजदूरों के हित में एक कानून बनाया जायेगा. यूपी उन 8 राज्यों में पहला है जिसने काम के घंटे आठ से बढ़ा कर बारह करने का फैसला किया और श्रमिकों के कार्यस्थल संबंधी अनेक प्रावधानों को खत्म किया.

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श्रम कानूनों में बदलाव के बाद मजूदरों के भविष्य को लेकर अनेक सवाल पैदा हो गये हैं. बिहार के एक श्रमिक ने तो मुख्यमंत्री के सामने ही कह दिया कि नून-रोटी खायेंगे लेकिन अब बाहर नहीं जायेंगे. हिंदी प्रदेश देश के सबसे पिछड़े राज्यों में हैं. आर्थिक और सामाजिक प्रगति के तमाम मानकों पर वे देश के उन्नत राज्यों से बहुत पीछे हैं. हालांकि बिहार दावा करता आया है कि वह पिछले चार सालों से 12 प्रतिशत की दर से विकास कर रहा है लेकिन इन सालों में ही भारत की विकास दर में भारी गिरावट आयी है. पिछले दो सालों से तो देश एक आर्थिक सुस्ती का शिकार रहा है जो कोविड 19 के कारण एक महामंदी के जाल में फंस गया है. हालांकि सरकार दावा करती है कि वह जल्द ही सम्मानजनक ग्रोथ रेट हासिल कर लेगी लेकिन देश की आर्थिक-सामाजिक हकीकत इस पर सवाल खड़ा कर देती है.

देश के माजूदा संकट के बीच अनेक अर्थशास्त्रियों और समाज वैज्ञानिकों ने बार-बार सुझाव दिये हैं. लेकिन यह दुखद है कि न तो केंद्र सरकार और न ही किसी राज्य सरकार ने इन विशेषज्ञों से बात करने का इरादा जताया है.  केंद्र सरकार के विशषज्ञ तो लगतार इन सुझावों को या तो नजरअंदाज करते आये हैं या उसका माखौल बनाने का प्रयास किया है.

झारखंड और बिहार की चुनौतियां इनमें बेहद गंभीर हैं. दोनों ही राज्य दो सांस्कृतिक परिवेश के बावजूद कई साझे दर्द का शिकार हैं. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बार-बार मांग किये जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने राज्य की आर्थिक मांगों पर गंभीरता नहीं दिखायी है. गांवों में मनरेगा मजदूरी गारंटी योजना बन कर रह गया है. इससे निर्मित होनेवाले रोजगार की अपनी सीमा है. बावजूद गांवों के लिए इसकी अनिवार्यता है. जरूरत इस बात की है कि मनरेगा रोजगार गारंटी की वह योजना जमीन पर बने जो वास्तव में रोजगार का सम्मान देता है. ऐसे में यह बड़ी चुनौती है कि गांव लौटे मजूदरों को उनके शहरी परिवेश के श्रम की अनुकूलता के हालात पैदा किये जायें. यह एक बड़ी चुनौती है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.

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इस बीच देश के कई अर्थशास्त्री और अपने क्षेत्र के जानकार  अर्थशास्त्री प्रणब बर्धन, दीपक नैयर, ज्यां द्रेज़, अभिजीत सेन, जयती घोष, राजमोहन गांधी, रामचंद्र गुहा, हर्ष मंदर, निखिल डे, एडमिरल (रिटायर्ड) रामदास ने योगेंद्र यादव के साथ मिल कर एक सात सूत्री दस्तावेज जारी किया है. सात सूत्री यह दस्तावेज कोरोना वायरस संकट के बीच बने आर्थिक हालात से निपटने के संदर्भ में सुझाव देता है. जारी दस्तावेज की कापी के अनुसार सात सूत्र हैं –

  1. जो भी मज़दूर घर लौटना चाहते हैं, दस दिनों के भीतर उन्हें इज्जत के साथ उनके घर पहुंचाया जाये. इसके लिए उनसे कोई पैसा नहीं लिया जाये. केंद्र सरकार को इसकी पूरी तरह से ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए. केंद्र ट्रेन और बस सेवाओं का इंतज़ाम करे. राज्य सरकारों को अपने यहां इन मज़दूरों को घर पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिए.
  2. सभी को टेस्ट से लेकर वेंटिलेटर तक एक समान स्वास्थ्य सुविधाएं फ्री में मिले. जिन लोगों में संक्रमण के लक्षण हों, उनकी मुफ़्त जांच की व्यवस्था करायी जाये. आइसीयू बेड्स, वेंटिलेटर्स और क्वारंटाइन सुविधावाले अस्पतालों की व्यवस्था हो. फ्रंटलाइन वर्कर्स और उनके परिवारवालों की आर्थिक और स्वास्थ्य सुरक्षा का एक साल के लिए इंतज़ाम किया जाये.
  3. जिस किसी का नाम राशन कार्ड में हो, उसे हर महीने दस किलो अनाज, डेढ़ किलो दाल, 800 मिलीलीटर कुकिंग ऑयल और आधा किलो चीनी दी जाये. अतिरिक्त नाम और इमरजेंसी राशन कार्ड मांग किये जाने पर पहचान पत्र और एड्रेस प्रूफ़ के आधार पर जारी किया जाये.
  4. मनरेगा के तहत हरेक शख़्स को इस साल कम से कम 200 दिनों के काम की गारंटी दी जाये. शहरी इलाक़ों में 400 रुपये रोज़ की दिहाड़ी पर कम से कम 100 दिनों के रोज़गार का इंतज़ाम हो. लॉकडाउन की वजह से जिनकी रोज़ी-रोटी छिनी है, मनरेगा के तहत उन्हें कम से कम 30 दिनों का मुआवजा दिया जाये.
  5. ईपीएफ़ में रजिस्टर्ड कर्मचारी जिनकी नौकरी जा चुकी है, उन्हें मुआवज़ा दिया जाये. ख़राब आर्थिक स्थिति का सामना कर रही कंपनियों को ब्याज मुक्त कर्ज दिया जाये ताकि वे अपने कर्मचारियों को कुछ वेतन दे सकें. एमएसएमई सेक्टर की कंपनियों का ईपीएफ़ योगदान सरकार अगले छह महीने तक करे. किसानों को उनका ख़राब हो गयी फसल और न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर बिक रहे उत्पाद का मुआवज़ा दिया जाये.
  6. किसानों और छोटे कारोबारियों के लिए और होम लोन पर अगले तीन महीने के लिए ब्याज पर राहत दी जाये. मुद्रा शिशु और किशोर योजना के तहत दिये गये क़र्जों में अगले छह महीने के लिए वसूली और ब्याज के लिए दबाव न बनाया जाये. किसान क्रेडिट कार्ड पर अगले छह महीने के लिए ब्याज और वसूली से राहत दी जाये.
  7. राहत पैकेज के लिए संसाधनों के इंतज़ाम में टैक्स लगाने के अलावा दूसरे रास्ते भी खोजे जायें. केंद्र सरकार राज्य सरकारों के साथ मिल कर अतिरिक्त राजस्व के कम से कम 50 फ़ीसदी हिस्से की ज़िम्मेदारी उठाये. सभी तरह के ग़ैर ज़रूरी खर्चों और सब्सिडी पर पूरी तरह से रोक लगायी जाये.

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