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बालू घाटों की नीलामी पर उठा सवाल : उपायुक्त जेएसएमडीसी के कर्मचारी नहीं, बोली में शामिल होना अवैध

राज्यपाल के प्रतिनिधि की हैसियत से डीसी एक साथ पट्टेदार और पट्टाधारी की तरह काम नहीं कर सकते, यह रूल्स ऑफ एक्जीक्यूटिव बिजनेस का उल्लंघन

Jamshedpur : झारखंड में एक अप्रैल से नयी पॉलिसी के तहत बालू उठाव और साथ ही साथ इसकी खरीद-बिक्री की नीति पर सवाल उठ रहे हैं. गौरतलब है कि बालू की नीलामी तीन श्रेणियों में होनी है, जिसे 31 मार्च तक कर लिया जाना है. पिछले 9 मार्च को मुख्य सचिव सुखदेव सिंह और खनन सचिव पूजा सिंघल ने वीडियो कांफ्रेसिंग कर राज्य के सभी जिलों के उपायुक्तों, एसएसपी व जिला खनन पदाधिकारी को नयी नीति की जानकारी दी. बता दें कि खान निदेशक द्वारा उपायुक्तों को जारी आदेश के अनुसार 10 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले बालू घाटों और 10 हेक्टेयर से 50 हेक्टेयर तक के बालू घाटों की नीलामी के लिए संबंधित उपायुक्त जेएसएमडीसी के पैनलबद्ध आवेदकों के बीच वित्तीय बोली का संचालन करेंगे. झारखंड खनिज विकास निगम (जेएसएमडीसी) इसकी सूची दो-तीन दिनों के अंदर उपलब्ध करायेगा. 50 हेक्टेयर व उससे से ज्यादा बड़े बालू घाटों की नीलामी राज्य खनिज निगम ऑनलाइन तरीके से करेगा.

रूल्स ऑफ एक्जीक्यूटिव बिजनेस का उल्लंघन होगा

इस नीति पर सवाल उठानेवालों का कहना है कि उपायुक्त जेएसएमडीसी के कर्मचारी नहीं होते हैं. इसलिए उनके द्वारा बोली के माध्यम से जेएसएमडीसी के एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (इओआई) को अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता है. दूसरा तर्क यह दिया जा रहा है कि  उपायुक्त झारखंड माइनर मिनपल कंसेशन रूल, 2004 के तहत राज्य की ओर से पट्टेदार (लेसर) और राज्यपाल के प्रतिनिधि हैं. इस हैसियत से वह एक साथ पट्टेदार (लेसर) और पट्टाधारक (लेसी) की तरह काम नहीं कर सकते. ऐसा करना कंपनी अधिनियम के साथ-साथ झारखंड के रूल्स ऑफ एक्जीक्यूटिव बिजनेस का घोर उल्लंघन है.

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हाईकोर्ट के अधिवक्ता ने मुख्य सचिव को लिखा पत्र

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झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव कुमार ने मुख्य सचिव को एक पत्र लिखकर उनका ध्यान इन बिंदुओं की तरफ आकृष्ट कराया है. राजीव कुमार ने मुख्य सचिव से आग्रह किया है कि वे जेएसएमडीसी के एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट मामले की व्यक्तिगत रूप से जांच करें और इसमें सुधार का फैसला जल्द से जल्द लें, ताकि खान सचिव और जेएसएमडीसी के प्रबंध निदेशक के बीच हितों का टकराव न हो. वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी कहा है कि कार्यपालिका के सर्वोच्च स्तर से पर्यावरण की कीमत पर संस्थागत भ्रष्टाचार की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. उन्होंने सुधार नहीं होने पर इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ने की बात भी कही है.

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