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विकास का सवाल भाजपा के राजनैतिक प्रचार से गायब

यह एक ऐसा चुनाव है, जिसमें सत्तापक्ष विकास रोजगार किसानी और अन्य जरूरी मुद्दों को परे धकेलने की सुनियोजित कोशिश कर रहा है.

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Faisal Anurag

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विकास से शुरू हुआ चुनावी सफर 2019 आते-आते राष्ट्रवाद और पाकिस्तान तक सीमित हो गया है. यह एक ऐसा चुनाव है, जिसमें सत्तापक्ष विकास रोजगार किसानी और अन्य जरूरी मुद्दों को परे धकेलने की सुनियोजित कोशिश कर रहा है.

भाजपा की पूरी कोशिश नायकत्व का एक ऐसा मिथक खड़ा करना है जिसका कोई जबाव विपक्ष देने में कामयाब नहीं हो. पिछले तीन सालों से जारी रणनीति का अंतिम रूप यह है कि आख्यान ऐसा गढ़ा जा रहा है, जिसमें व्यक्ति देश का पर्याय दिखे और राष्ट्रवाद का इकलौता प्रहरी.

पाकिस्तान के नाम पर दोहरे खेल को अंजाम देकर बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण बनाया जा रहा है, जिसमें सभी जरूरी आर्थिक और सामाजिक सवाल मामूली लगने लगे. भारत के चुनावी इतिहास में यह शायद पहली बार हो रहा है कि राजनीति में न्याय मूलक विकास का संदर्भ बहस से गौण किया जाए.

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2014 के आम चुनाव में विकास का मिथ खड़ा कर उसका इकलौता वाहक बनाकर भाजपा ने लोकसभा में पहली बार बहुमत हासिल किया था. 14 में बहस को विकास के इर्दगिर्द बनाते हुए बड़े  सपने लोगों के बीच पैदा किए गए थे. भाजपा ने गुजरात मॉडल की जमकर चर्चा कर यह दिखाने का प्रयास किया था कि यदि वह सत्ता में आएगी तो विकास से भारत को चकाचौंध कर देगी.

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पांच सालों के बाद के चुनाव में भाजपा के प्रचार अभियान में विकास के संदर्भ को पूरी तरह हाशिए पर खड़ा कर दिया गया है. भाजपा न तो नोटबंदी और ना ही जीएसटी के सवाल पर वोट मांग रही है और ना  ही बेरोजगारी के सवाल को उसने उठाया है.

उसके संकल्प में भी बेरोजगारी के सवाल को नजरअंदाज किया गया है. भाजपा जानती है कि देश के युवा और किसान के साथ वंचित समुदायों में 2014 की तरह का रूझान उसके पक्ष में नहीं है. इसको अपने पक्ष में लाने के लिए उसने राष्ट्रवाद के मुद्दे को आगे कर विपक्ष को राष्ट्रवाद का विलोम बताना शुरू कर दिया है.

भारत विभाजन के इतिहास के गर्द में चले गए सवाल को उठाकर भाजपा पीछे धकेल देने का प्रयास कर रही है. भाजपा के रणनीतिकार जानते हैं कि वे नोटबंदी और रोजगार के सवाल पर बैकफुट पर हैं.

प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव अभियान में सर्वाधिक बातें केवल राष्ट्रवाद पर ही की जा रही हैं. पाकिस्तान इसमें दूसरे स्थान पर है. मोदी के रणनीतिकारों को पता है कि पाकिस्तान का सवाल उन्हें गुजरात के चुनावों में कामयाबी देता रहा है. इमरान खान ने एक बयान जारी कर आशा जतायी है कि भारत में मोदी की सरकार दोबारा बनेगी.

इमरान खान ने कहा है कि भाजपा दक्षिणपंथी पार्टी  है, जिसे भारत के हिंदुओं का पक्षधर माना जाता है, वहीं कश्मीर के माले का समाधान करने में कारगर हो सकती है. साथ ही वह पाकिस्तान भारत के बीच शांतिवार्ता में कारगर भूमिका निभा सकती है.

इमरान खान की मंशा से लेकर भाजपा के रहते कश्मीर के सवाल पर जो हल होगा, उसका भारत के  बहुसंख्यक विरोध नहीं करेंगे. इमरान खान के इस वक्तव्य के निहितार्थों को गहरायी से समझने की जरूरत है.

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इमरान खान अपने को मोहम्मद अली जिन्ना का उत्तारिधाकरी साबित करने की होड़ में है. मोदी के भारत के विभाजन के सवाल को 2019 के आमचुनाव का केंद्रीय सवाल बना रहे हैं. सवाल पूछा जा रहा है कि आखिर भारत और पाकिस्तान दोनों का नेतृत्व प्रकारांतर से एक ही तरह की बात क्यों कर रहा है.

पिछले कुछ समय से दुनिया के अनेक देशों में दक्षिणपंथी ताकतों का तेजी से उभार हुआ है. हालात की गंभीरता यहां तक पहुंचने लगी है कि राष्ट्रवाद के उभार से यूरोपियन यूनियन एक बड़े संकट की ओर बह रहा है. ब्रेक्जिट के बाद यह सबसे बड़ी चुनौती यूरोपियन यूनियन के सामने पेश है.

अगले कुछ दिनों में ही यूरोपियन यूनियन के चुनाव होने जा रहे हैं और दक्षिणपंथी राजनीतिक ताकतों के उभार से यूरोपियन यूनियन के विचार पर खतरा मंडराने लगा है. दक्षिण पंथ की यह चुनौती यूरोपियन यूनियन के कम से कम 10 देशों से मिलने की संभावना राजनीतिक प्रेक्षक देख रहे हैं.

फ्रांस,जर्मनी, बेल्जियम, नार्वे, इटली जैसे देशों में दक्षिणपंथी ताकतों के उभार से यूरोप का प्रबुद्ध लोकतांत्रिक समाज बेहद चिंतित है. तुर्की और ब्राजील दक्षिणपंथी उभार के संकट को पहले से ही झेल रहा है. प्रेक्षक मान रहे हैं कि जैसे-जैसे आर्थिक पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के कारण बेरोजगारी और  असमानकता बढ़ती जा रही है, उसका प्रभाव राजनीति में राष्ट्रवाद के नाम पर नवनाजी उभार में हो रहा है.

भारत और ब्राजील में दक्षिपणपंथ के उभार को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है. दक्षिणपंथ  कभी भी वास्तविक सामाजिक आर्थिक सवाल पर चुनाव नहीं लड़ना चाहता. वह मिथकों का स्वप्नलोक खड़ा करता है, जिसके लिए उसे राष्ट्रवाद मजबूत आधारतत्व प्रतीत होता है.

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