न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

झारखंड, बिहार में दलबदल की घटनाओं पर उठ रहे सवाल नहीं हो सकते दरकिनार

2019 के चुनावों में एक ओर दलबदलुओं के कारण लगभग सभी दल परेशान हैं

102

Faisal Anurag

दलबदलुओं के कारण भारत का लोकतंत्र बदरंग होता जा रहा है. लोभ और खरीद फरोख्त की प्रवृति तेजी से बढ़ती जा रही है. 2019 के चुनावों में एक ओर दलबदलुओं के कारण लगभग सभी दल परेशान हैं तो ग्लैमर की दुनिया के लोगों का इस्तेमाल धड़ल्ले से होने वाले इस्तेमाल के कारण पार्टियों की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता भी तार-तार होने लगी है.

इसे भी पढ़ें – गिरिनाथ का बीजेपी में जाने की वजह कहीं गोपीनाथ महिला इंटर कॉलेज और महिला महाविद्यालय की जांच तो नहीं…

hosp3

2019 के चुनावों में भी नेताओं को लालच देने के लिए हर हथकंडे का इस्तेमाल हो रहा है. यह भी साफ दिख रहा है कि पार्टियों के भीतर लोकतंत्र लगभग खत्म होने की कगार पर है.

लगभग सभी दलों में देखा जा रहा है कि जब कोई नेता पार्टी की नीतियों या कार्यशैली पर कोई सवाल उठाता है, तो उसके राजनीतिक जीवन पर ग्रहण लगा दिया जाता है. 2014 के चुनाव में 157 व्यक्ति दल बदलने के बाद भी चुने गए थे.

झारखंड और बिहार में दलबदल की घटनाओं को लेकर अनेक तरह के सवाल उठ रहे हैं. इन सवालों को दरकिनार नहीं किया जा सकता. नेरेटिव यह बन रहा है कि राजनीति एक ऐसा प्रोफेशन बनता जा रहा है, जिसमें जनता के सवालों के बीच रहने की जगह केवल चुनावी जीत ही अहम हो गया है.

इसे भी पढ़ें – दुनिया भर में नए कोयला आधारित संयंत्रोंं के घटने का क्रम जारी, लेकिन भारत में अब भी मिल रही नए…

इसके लिए हर तरह के वसूल को दरकिनार कर सिद्धांतविहीनता के दौर को स्थापित करने का प्रयास खुलेआम किया जा रहा है.

यह प्रवृति उन दलों में भी गहरा रही है, जो कैडर आधारित माने जाते हैं. इसका परिणाम यह हो रहा है कि साठ के दशक में जो आया राम गया राम की प्रवृति पैदा हुई थी, वह अब आम हो गयी है.

भारत के चुनावी इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जिसमें दलबदलुओं को आम वोटरों के गुस्से का शिकार होना पडता था. ऐसे दर्जनों चुनावी इतिहास से ढूंढे जा सकते हैं, जिसमें अनेक दलबदलू नेताओं को राजनीतिक वनवास में जनता ने ही भेज दिया.

लेकिन पिछले दशकों में देखा गया है कि दलबदल के खिलाफ पहले की तरह गुस्सा नहीं दिखता है. जाति और धर्म को आधार बनाकर अपना जनाधार बनाने वाले नेताओं के समर्थक समूहों को इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखता है.

इसे भी पढ़ें – झारखंड में बुझता लालटेन, राजद के गिरिनाथ सिंह ने भी थामा बीजेपी का हाथ, कहा : चतरा के लिए इंटरस्टेड…

भारत में जो दलबदल कानून बना है वह केवल संसद और विधायिका तक ही सीमित है. राजनीतिक दलों पर कोई ऐसी बाध्यता कानूनी तौर पर नहीं है कि दलबदल कर शामिल हुए किसी व्यक्ति को  चुनाव प्रक्रिया के बीच टिकट नहीं दिया जाए.

हालांकि भारत में चुनावी सुधारों के लिए कार्य कर रहे संगठनों और व्यक्तियों ने बार-बार यह सुझाव दिया है कि दलबदल को लेकर सख्त नजरिया अपनाया जाए. इन संगठनों ने चुनाव आयोग और सरकारों और दलों को भी अनेक बार सुझाव दिए है कि यदि भारत की राजनीति को विचारधारा और चुनावी घोषणा पत्र के नजरिए से नैतिक बनाना है तो दलबदलने वालों को पार्टी में शामिल होने के कम से कम एक साल बाद ही चुनाव के मैदान में उतारा जाए.

लेकिन भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस सहित किसी भी पार्टी ने इस सुझाव पर कभी विचार करना भी जरूरी नहीं समझा है और ना ही चुनाव आयोग ने इस सवाल पर संजीदगी दिखायी है.

दलबदलने वाला नेता पार्टी को भले ही चुनाव में जीत दिला दे, लेकिन इससे लोकतंत्र की गरिमा को  गहरा ठेस तो लगता ही है. राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता और उसके प्रति पार्टियों की गंभीरता भी कम होती है.

इसका परिणाम अंततः यह होता है कि युवाओं और वोटरों में एक तरह की हताशा पैदा  होती है. जिन अनेक कारणों से नोटा के प्रति लोगों का रूझान दिखता है, उसमें दलबदल की भी एक बड़ी भूमिका है. यह रूझान कमोवेश लोकतंत्र, राजनीतिक विचार और राजनीतिक दलों का परोक्ष रूप से निषेध ही प्रकट करता है.

यदि व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो चुनाव के घोषणा पत्रों और चुनावी वायदों के प्रति बढ़ती अगंभीरता इन्हीं कारणों से परवान हो रही है. चुनाव आयोग ने एक छोटा कदम उठाते हुए चुनाव घोषणा पत्र जारी करने की अंतिम सीमा तय कर दी है.

चुनाव सुधारों की बात करने वाले समूहों का तर्क है कि चुनाव की घोषणा और आचार संहिता लागू होने के तीन दिनों के भीतर ही चुनाव घोषणा पत्र को जारी करना चाहिए और चुनाव आयोग को यह भी देखना चाहिए कि दो चुनावों के बीच इस घोषणा पत्र पर अमल कितना हुआ है.

इन संगठनों ने यह भी कहा है कि चुनाव घोषणा पत्र को एक जबावदेही कानून के भीतर लाना चाहिए, जिसका उल्लंघन करने वाले दलों को दंडित भी किया जा सके.

इसे भी पढ़ें – गर्मी में बिजली के लिये मचेगा हाहाकार, सेंट्रल और निजी कंपनियों के रहमोकरम पर झारखंड की बिजली

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

You might also like
%d bloggers like this: