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पुष्पगीत…याद आता रहेगा…अपनी उसी ताकत, मुस्कान और शरारतों के साथ

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Zeb Akhtar

इंदौर से एक पत्रकार मित्र का फोन आया कि पुष्पगीत नहीं रहा. सुनते ही जैसे काठ-सा मार गया हो. बहुत देर तक यकीन ही नहीं हो सका. वजह ये थी कि पुष्पगीत को जब भी देखा था, हंसते हुए ही देखा था. जब भी मिला था एक नटखट और बच्चों जैसी शरारत के साथ ही मिला था. मगर यकीन तो करना ही था. फेसबुक पर गया तो संवेदनाओं और यादों के अनगिनत पोस्ट मिले. तस्दीक हो गयी. पता चला दो दिन पहले ही वो वेल्लोर से लौटा था. कैंसर तो पहले से था ही, मगर वो अपने हौसले से कठोर कैंसर को मात दे चुका था. लेकिन इस बार, यानी दूसरी बार, गॉलब्लाडर में कैंसर ने उस पर हमला कर दिया था. पहली बार ब्लड कैंसर को मात देने वाला पुष्पगीत इस बार जिंदगी की जंग हार गया. और आज सुबह उसने उसी रिम्स में आखिरी सांस ली, जिसकी रिपोर्टिंग उसने डेढ़ दशक तक की थी. जीवन का ये फलसफा भी अजीब था कि उसने उसी वार्ड में आखिरी सांस ली, जहां वो रिपोर्टिंग के लिए जाया करता था. और कई बार रिपोर्टिंग से आगे बढ़कर मरीजों की सुविधा और अधिकारों के लिए रिम्स के निदेशक से भी टकराने से नहीं हिचकता था.

इधर वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग, जिन्होंने भी न हारनेवाले जिद्दी स्वभाव के साथ, कैंसर को मात दी है, वे हमेशा पुष्पगीत का हमेशा जिक्र करते थे. इस मायने में कि उन्हें (फैसल जी को) पुष्पगीत से बात करके ताकत मिलती है. कैंसर को हराने और लड़ने की ऊर्जा मिलती है. पुष्पगीत के साहस के वो कायल रहे हैं. दोनों मिलकर कैंसर के मरीजों के लिए कुछ करने की भी योजना बना रहे थे. इसी बीच इस खबर ने जैसे हम सब को तोड़ दिया है.

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मुझे जब भी मेडिकल संबंधी सलाह या डॉक्टर की जरूरत पड़ती थी, पुष्पगीत को ही फोन करता था. वो न सिर्फ सलाह देता, बल्कि डॉक्टर से बात करके पूरा शिड्यूल ही फिक्स कर देता था. और ये तब होता था जब मिले हुए महीनों और कभी-कभी साल भी गुजर जाते थे. प्रभात खबर से लेकर दैनिक भास्कर तक उसका साथ रहा. उसी चुलबुलेपन और मस्तीभरे अंदाज में. बुरे दिनों में… अच्छे दिनों में…हम जब भी मिले, मिलने के जैसा मिले. वो वही बोलता था, जो कर सकता था. वहीं दिखता था, जैसा उसे दिखना चाहिये. किसी कवर या आवरण के साथ के साथ नहीं. जैसी कि हमारी बिरादरी है. इस मायने में देखें तो पुष्पगीत धारा के विरुद्ध का खेवैया था. जिसकी नैया में हम जैसे कई मरीज सवार होते थे.

बहरहाल, कोशिश भी करूं तो उन मुलाकातों को भूलना जैसे अपने-आपसे धोखा देना होगा. अलविदा दोस्त…तुम बहुत याद आओगो…तुम्हें फिर से सलाम…आखिरी सलाम… पूरे न्यूज विंग परिवार की ओर से.

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