West Bengal

पुरुलिया : लॉकडाउन की मार से परेशान भेड़ पालक दाने-दाने को मोहताज

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Purulia : एक ओर जहां लॉकडाउन में लोग रोजी-रोटी को मोहताज हो गये हैं, वहीं दूसरी ओर सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय कर आने वाले भेड़ पालक अपने बच्चों और परिवार से मिलने की अनिश्चितता के भय से रातभर शकून की नींद भी नहीं सो पा रहे हैं.

बिहार के औरंगाबाद निवासी रामाशीष पाल कहते हैं कि हमलोग हर वर्ष यही काम करते थे और हर वर्ष अपने जब गांव जाते थे तो परिवार ही नहीं पूरा गांव हमलोगों के स्वागत में उमड़ आते थे. लेकिन इस बार लॉकडाउन के कारण ऐसा कुछ नहीं रहा.

लॉकडाउन में घर में कुछ देने के स्थान पर हमें 14 दिनों के लिए क्वारेंटाइन पर भेज दिया जायेगा और उसके बाद भी जब हम घर जायेंगे तो खाली हाथ और उपेक्षित ही जांयेंगे क्योंकि हमें कुछ मिला ही नहीं बल्कि सभी जगह कोरोना के नाम पर दुत्कारा और भगाया गया.

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लॉकडाउन ने सब चौपट किया

इधर बक्सर के शिवनंदन पाल ने बताया कि वह अपने परिवार घर छोड़ कर हर बार देशाटन के लिए निकल पड़ते हैं और इसी में अपना रोजगार करके घर लौटते थे जिससे अपनी बूढ़ी मां व पत्नी की मांगें पूरी करते हुए अपने बेटे और बेटियों की पढ़ाई-लिखाई आदि का खर्च पूरा करते थे.

लेकिन इस लॉकडाउन ने पूरे व्यापार को ही चौपट कर दिया है. मैं जिस मदन भाई के साथ रोजगार करता था उनसे बात करने पर उन्होंने बताया कि वह तो स्वयं बेरोजगार हो गये हैं. वह किसी को रोजगार कैसे दे सकते थे.

रामाशीष पाल और अमरेन्द्र पाल ने बताया कि हर साल लगभग हजार कम्बल और आसन बना लेते थे जिससे हमारे परिवार का पालन पोषण हो जाता था पर लॉकडाउन में स्थिति काफी खराब हो गयी है.

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उन्होंने बताया कि लॉकडाउन के कारण स्थिति काफी दयनीय हो गया है. यह बताया कि भेड़ों की रुई कैची से काट कर घर में कम्बल और आसन की बुनाई की जाती है. उन लोगों के पास दूसरा कोई विकल्प बचा ही नहीं है.

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परिवार के सामने जाने में सकुचा रहे

पुरुलिया जिला के नितुरिया क्षेत्र में सैकड़ों भेड़ो को ले जा रहे अमरेन्द्र पाल ने बताया कि हमलोग प्रति वर्ष यहां आते है और झारखंड के चन्दन क्यारी तक जाते हैं. अपने भेड़ों के साथ वहां के सारे भेड़ो का रोंवा जमा कर अपने साथ औरंगाबाद तक लाते थे. वहां परिवार के साथ मिल, कम्बल और आसन इत्यादि बनाते हैं.

यह काम हमलोग वर्ष में कम से कम 3 बार करते थे और इससे हमारा जीवन भली-भांति चलता था. लेकिन इस बार कोरोना ने ऐसी महामारी की कि हम अपने परिवार के सामने अपना मुंह लेकर जाने में भी सकुचा रहे हैं. हमारे पास परिवार को देने के लिए कुछ भी नहीं है. इस बार पूरा देश ही कोरोना के कारण कंगाल हो गया है.

आगे उन्होने कहा कि इस विपत्ति के काल में हमें यह उम्मीद थी कि केन्द्र सरकार या राज्य सरकार मदद करती पर ऐसा नहीं किया गया हैं.

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