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खरीफ के बाद परती भूमि पर दलहन की खेती को दें बढ़ावा : महेश पोद्दार

Ranchi : राज्यसभा सांसद महेश पोद्दार ने राज्य में खरीफ की खेती के बाद परती रह जानेवाली भूमि पर बड़े पैमाने पर दलहन की खेती को बढ़ावा देने का आग्रह किया है. पोद्दार ने कृषि मंत्री रणधीर सिंह को पत्र लिखकर यह आग्रह किया है. अपने पत्र में पोद्दार ने संसद के मानसून सत्र के दौरान एक प्रश्न के उत्तर में भारत सरकार द्वारा दी गयी जानकारी का हवाला दिया है.

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पत्र में पोद्दार ने क्या लिखा है

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पोद्दार ने लिखा है कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधीन महालानोबिस राष्ट्रीय फसल पूर्वानुमान केंद्र झारखंड में खरीफ क्षेत्र की मैपिंग कर रहा है. इसके लिए इसरो द्वारा विकसित कार्यप्रणाली का प्रयोग किया जा रहा है. मैपिंग के विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों को सम्बंधित स्थानों के मानचित्रों के साथ राज्य सरकार को उपलब्ध कराया जा रहा है. मैपिंग के इन निष्कर्षों का लाभ उठाकर किसान खरीफ सीजन के बाद परती भूमि पर अतिरिक्त फसल हासिल कर सकते हैं.

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खरीफ के बाद 65-70% भूमि रहती है परती

पोद्दार के मुताबिक खरीफ ऋतु के बाद खरीफ क्षेत्र की करीब 65 – 70 प्रतिशत भूमि को परती छोड़ दिया जाता है. ये इलाके ज्यादातर राज्य के दक्षिणी जिलों में स्थित हैं. खरीफ सीजन के बाद परती छोड़ दी जानेवाली भूमि के करीब 25 – 30 प्रतिशत भाग खरीफ के बाद की ऋतु के दौरान छोटी अवधि वाले दलहन की फसल के लिए उपयुक्त पाए गए हैं. ये इलाके झारखण्ड के रांची, गुमला, सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम, गिरिडीह, कोडरमा आदि जिलों में स्थित हैं.

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दलहन उत्पादन में राज्य को बनाया जा सकता है आत्मनिर्भर 

पोद्दार का मानना है कि यदि प्रशासनिक संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से पूरी योजना बनाकर इस्तेमाल किया जाय तो न सिर्फ खरीफ सीजन के बाद परती रह जानेवाली कुल भूमि के 50 प्रतिशत से ज्यादा भाग को उत्पादक बनाया जा सकता है बल्कि दलहन उत्पादन में राज्य को आत्मनिर्भर भी बनाया जा सकता है. राज्य सरकार का यह प्रयास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किये गए किसानों की आय दुगुनी करने के संकल्प को पूरा करने में भी सहायक हो सकता है. इसके लिए यह आवश्यक होगा कि राज्य सरकार किसानों को मैपिंग के परिणामों से अवगत कराये, मिट्टी की जांच के माध्यम से उपयुक्त जमीन चिन्हित करे, किसानों को उन्नत बीज उपलब्ध कराये, आंशिक तौर पर आवश्यक सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराये, उन्हें जैविक खाद के प्रयोग को प्रोत्साहित करे, उत्पादित फसल के लिए किसानों को वाजिब कीमत दिलाये और उन्हें बीमा सुरक्षा भी दे.

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25-30% हिस्सा कम अवधि के दलहन की खेती के लिए उपयुक्त

अभी प्रदेश में खरीफ सीजन के धान की फसल की बुआई अंतिम चरण में है. राज्य में प्रचलित कृषि चक्र के अनुसार नवंबर और उसके बाद से धान उत्पादक जमीन खाली हो जायेंगी. मैपिंग के आंकड़ों के मुताबिक इनमें से 65 – 70 प्रतिशत परती रह जायेंगी जबकि इनका 25 – 30 प्रतिशत हिस्सा कम अवधि के दलहन की खेती के लिए उपयुक्त है. बेहतर होगा कि सम्बंधित प्रशासनिक तंत्र अभी से ही खरीफ के बाद दलहन की खेती की तैयारी में लग जाए ताकि अपेक्षित परिणाम हासिल किये जा सकें.

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