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पं. जसराज ने बुरे बर्ताव से नाराज हो तबला बजाना छोड़ा, प्रण लिया जब तक विशारद नहीं कर लेते बाल नहीं कटवाएंगे

पहली पुण्यतिथि पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : पंडित जसराज (Pandit_Jasraj ) भारतीय शास्त्रीय संगीत के विश्वविख्यात गायक रहे हैं. भारतीय शास्त्रीय संगीत को न केवल मनोरंजन का, अपितु ईश्वर से जुड़ने का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया है. पंडित जसराज आधुनिक भारत के शास्त्रीय संगीत के सबसे चमकते सितारों में शुमार रहे हैं. 90 साल की उम्र में 17 अगस्त 2020 को कार्डिएक अरेस्ट की वजह से इनका अमेरिका के न्यूजर्सी में निधन हो गया था. पद्म विभूषण पंडित जसराज पिछले कुछ समय से अपने परिवार के साथ अमेरिका में ही थे.

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पारिवारिक विरासत में मिला संगीत

पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी 1930 को हरियाणा के हिसार में हुआ था. इनका जन्म ऐसे परिवार में हुआ जिसकी पिछली चार पीढ़ियां हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को समर्पित रहीं थीं. इन्होंने इस परंपरा को बखूबी आगे बढ़ाया और अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित की. उनके पिताजी पंडित मोतीराम मेवाती घराने के विशिष्ट संगीतज्ञ थे.

पं. जसराज को संगीत की प्राथमिक शिक्षा पिता से ही मिली परन्तु जब वे मात्र 3 वर्ष के थे, उनके सर से पिता का साया उठ गया. दुर्भाग्य से पंडित मोतीराम का देहांत उसी दिन हुआ जिस दिन उन्हें हैदराबाद और बेरार के आखिरी निज़ाम उस्मान अली खाँ बहादुर के दरबार में राज संगीतज्ञ घोषित किया जाना था. उनके बाद परिवार के लालन-पालन का भार संभाला उनके बड़े बेटे पं. मणिराम पर आ गया. इन्हीं की छत्रछाया में पं. जसराज ने संगीत शिक्षा को आगे बढ़ाया तथा तबला वादन भी सीखा

मणिराम अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे. परंतु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी क्षुद्र माना जाता था. 14 वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के बुरे बर्ताव से नाराज होकर होकर जसराज ने तबला बजना छोड़ दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में विशारद प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे. इसके बाद उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवंत सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत विशारद प्राप्त किया. इनके परिवार में उनकी पत्नी मधु जसराज, पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा जसराज हैं.

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आवाज़ की विशेषता

पं. जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है. उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की ‘ख़याल’ शैली की विशिष्टता को झलकाता है. उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में ‘हवेली संगीत’ पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की है. भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है.

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जसरंगी जुगलबंदी की रचना की

पंडित जसराज ने एक अनोखी जुगलबंदी की रचना की. इसमें महिला और पुरुष गायक अलग-अलग रागों में एक साथ गाते हैं. इस जुगलबंदी को जसरंगी नाम दिया गया.

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मधुराष्टकम् उन्हें प्रिय था

मधुराष्टकम् श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित भगवान कृष्ण की बहुत ही मधुर स्तुति है. पंडित जसराज ने इस स्तुति को अपने स्वर से घर-घर तक पहुंचा दिया. पंडित जी अपने हर एक कार्यक्रम में मधुराष्टकम् जरूर गाते थे. इस स्तुति के शब्द हैं -अधरं मधुरं वदनं मधुरं, नयनं मधुरं हसितं मधुरं. हृदयं मधुरं गमनं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरं.

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जसराज के नाम पर रखा गया था Asteroid का नाम
सितंबर 2019 में पंडित जसराज को अमेरिका ने एक अनूठा सम्मान दिया और 14 साल पहले खोजे गए एक ग्रह का नाम उनके नाम पर रखा गया. ग्रह की खोज नासा और इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन के वैज्ञानिकों ने मिलकर की थी. इस ग्रह का नंबर पंडित जसराज की जन्म तिथि से उलट था. उनकी जन्मतिथि 28/01/1930 है और ग्रह का नंबर 300128 था. नासा का कहना था कि पंडित जसराज ग्रह हमारे सौरमण्डल में गुरु और मंगल के बीच रहते हुए सूर्य की परिक्रमा कर रहा है.

 

अंटार्कटिका सहित सातों महाद्वीप में कार्यक्रम पेश करने वाले पहले भारतीय

पंडित जसराज ने 2012 में एक अनूठी उपलब्धि हासिल की थी. 82 साल की उम्र में उन्होंने अंटार्कटिका के दक्षिणी ध्रुव पर अपनी प्रस्तुति दी. इसके साथ ही वे सातों महाद्वीप में कार्यक्रम पेश करने वाले पहले भारतीय बन गए. पद्म विभूषण से सम्मानित मेवाती घराना के पंडित जसराज ने 8 जनवरी 2012 को अंटार्कटिका तट पर ‘सी स्प्रिट’ नामक क्रूज पर गायन कार्यक्रम पेश किया. जसराज ने इससे पहले 2010 में पत्नी मधुरा के साथ उत्तरी ध्रुव का दौरा किया था.

पुरस्कार व सम्मान

भारत सरकार ने शास्त्रीय संगीत में इनके उत्कृष्ट योगदान के लिए पहले पद्म श्री तथा उसके बाद पद्म भूषण तथा पद्म विभूषण से सम्मानित किया था.

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